भीगी शाम, भीड़ का तूफान : 4PM कन्सर्ट में स्वानंद की आवाज पर झूमा लखनऊ

अंसल स्थित दयाल बाग लॉन में स्वानंद किरकिरे को सुनने के लिए सैकड़ों लोगों का जुटना और खराब मौसम के बावजूद अंत तक जमे रहना यह इस बात का सबूत है कि कला अगर सच्ची हो तो हालात मायने नहीं रखते।
- 4PM के संपादक संजय शर्मा का इनिशिएटिव
- संगीत प्रेमियों ने बोला थैंक्यू…
- म्यूजिक लवर्स की जुनून ने दी मौसम को मात
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ । लखनऊ जहां हर शाम में अदब घुला होता है और हर महफिल में दिल धड़कता है। लेकिन शनिवार की गुजरी वह शाम कुछ अलग थी। आसमान में कड़कती बिजली, हवा में नमी और जमीन पर बैठी सैकड़ों आंखों में एक ही इंतजार, एक आवाज जो शब्दों को सिर्फ गाती नहीं जीती है। अंसल गोल्फ सिटी स्थिति दयाल बाग लॉन की हरियाली किसी फिल्मी सेट से कम नहीं लग रही थी। बूंदाबांदी की महीन परत हर चेहरे को छू रही थी और उसी के बीच मंच पर उतरे स्वानंद किरकिरे। कोई शोर नहीं कोई बनावट नहीं बस एक सादा मुस्कान और फिर आवाज। ओ री चिरैया.. जैसे ही हवा में घुला भीड़ खामोश हो गई। ऐसा सन्नाटा, जिसमें हर इंसान अपने भीतर उतर रहा था। फिर पियू बोले.. आया और महफिल में बैठे लोग मुस्कुराने लगे। गिव मी सम सनशाइन.. ने जैसे हर दिल की अनकही बात कह दी। बारिश रुक-रुक कर गिर रही थी बिजली आसमान में चमक रही थी और ऐसा लग रहा था जैसे नेचर खुद इस कन्सर्ट की बैकग्राउंड बन गयी हो। यह सिर्फ एक म्यूजिकल इवेंट नहीं था यह लखनऊ की रूह का जश्न था।
4PM का आयोजन शब्दों से जादू और जादू से इतिहास
4पीएम के संपादक संजय शर्मा और उनकी टीम ने सिर्फ एक इवेंट आर्गनाइज्ड नहीं किया बल्कि उन्होंने यादों का कभी न भूलने वाला वह तोहफा लखनऊ को मयस्सर कराया जो दिल के एक कोने में जुगनूओं की मानिंद हमेशा चमकेगा। उन्होंने ऐसी रूमानी शाम के दीदार कराने का रास्ता फरहम कराया जिसे सिर्फ एहसासात के जरिये ही महसूस किया जा सकता था। उनके और उनकी टीम के जुनून ने रूमानियत के एसहसासों के लाइव नजारों से दो-चार करा दिया। बुक माय शो से टिकट लेकर आए लोग जब लौटे तो उनके पास सिर्फ एक शाम की याद नहीं थी उनके पास एक एहसास था। इतने विपरीत मौसम में भी सैकड़ों लोगों का जुटना और अंत तक जमे रहना यह इस बात का सबूत है कि कला अगर सच्ची हो तो हालात मायने नहीं रखते।
लखनऊ ने साबित किया वह सिर्फ देखता नहीं महसूस करता है
लखनऊ ने एक बार फिर दिखा दिया कि यह शहर सिर्फ तहजीब का नहीं बल्कि एहसास का शहर है। जब मौसम ने करवट ली बूंदें गिरने लगीं और बिजली कड़कने लगी तो उम्मीद थी कि भीड़ छंट जाएगी। लेकिन हुआ ठीक उल्टा। लोग छाते लेकर आए कुछ भीगते रहे कुछ कुर्सियों पर जमे रहे लेकिन कोई गया नहीं। हर कोई उस आवाज को पकड़ लेना चाहता था जो दिल के सबसे नर्म हिस्से को छूती है। दयाल लॉन में बैठे बुजुर्ग हों या युवा हर चेहरे पर एक ही भाव था आज कुछ खास हो रहा है। यह वही लखनऊ है जो मुशायरों में रातें जागता है जो गजलों में खुद को ढूंढता है और जब स्वानंद किरकिरे जैसे फनकार आते हैं तो उन्हें सिर आंखों पर बिठाता है।
तालियों में भी सुनाई दे रहा था संगीत
तालियां भी यहां अलग थीं जो सिर्फ स्वानंद किरकिरे की परफारमेंस के लिए नहीं बल्कि उन अनकहे जज्बातों के लिए थीं जो सालों से दिल के किसी कोने में दबे थे और आज बाहर आने का रास्ता पा गए थे। हर ताल हर सुर हर शब्द भीड़ के भीतर गहराई तक जाकर गूंज रहा था और बारिश भी इस क्रेज को कम नहीं कर सकीं बल्कि बारिश ने इस जुनून को और गहरा कर दिया। भीगते हुए लोग अपनी जगह से नहीं हिले क्योंकि उस पल को छोडऩा जैसे खुद से दूर हो जाना था। यह वही लखनऊ था जो अदब के साथ-साथ एहसासों को भी जीना जानता है। आखिर में यह साफ हो गया कि यह भीड़ सिर्फ म्यूजिक लवर्स की नहीं थी। यह भीड़ उन लोगों की भीड़ थी जो अपनी यादों अपने अधूरे ख्वाबों और अपने जज्बातों को फिर से जीने आए थे। और स्वानंद किरकिरे की आवाज ने उन्हें वह मौका दे दिया जिसका इंतजार शायद वे बरसों से कर रहे थे।




