एंटी करप्शन की धारा 17 ए पर फंसा पेंच, दो जजों में उभरे मतभेद!

धारा 17ए का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि ईमानदार अधिकारी सरकार बदलने के बाद राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार न बनें। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में इसकी संवैधानिकता पर विवाद चल रहा है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली मोदी सरकार क्या खुद भ्रष्टाचारियों को बचा रही है? यह सवाल हम नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत के भीतर उठ रही दो अलग-अलग आवाजें उठा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के दो दिग्गज जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17 ए को लेकर आपस में भिड़ गए हैं। मामला इतना गंभीर हो गया है कि अब इसका फैसला एक बड़ी बेंच करेगी, जिसकी अगुवाई जस्टिस सूर्यकांत करेंगे। हालांकि ये नियम कहां से और कैसे आया, और इसमें मोदी सरकार क्यों निशाने पर है, ये पूरा मामला एंटी करप्शन एक्ट की धार 17 ए से जुडा हुआ है। वैसे तो आम आदमी के लिए कानून सीधा है कि चोरी करो तो पुलिस पकड़ेगी। लेकिन मोदी सरकार ने 2018 में एक ऐसा संशोधन किया जिसने सरकारी बाबुओं और नेताओं को सुपरपावर दे दी। धारा 17 ए कहती है कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी ने अपने पद पर रहते हुए कोई फैसला लिया और उसमें भ्रष्टाचार का आरोप लगा, तो जांच एजेंसियां जैसे कि सीबीआइ्र और पुलिस उसकी इंक्वायरी या जांच भी शुरू नहीं कर सकतीं, जब तक कि सरकार से लिखित मंजूरी न मिल जाए।

धारा 17ए का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि ईमानदार अधिकारी सरकार बदलने के बाद
राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार न बनें। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में इसकी संवैधानिकता पर विवाद चल रहा है। यह धारा अधिकारियों को सुरक्षा देती है, लेकिन कुछ जजों ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की है, जबकि अन्य ने इसे वैध माना है, जिस पर अब बड़ी बेंच फैसला करेगी। मोदी जी कहते हैं ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा, लेकिन उनकी सरकार ने कानून बना दिया कि अगर खाया भी है, तो पहले हमसे पूछो कि जांच करें या नहीं। क्या कोई भी सरकार अपने चहेते अफसरों के खिलाफ जांच की इजाजत देगी? कांग्रेस का दावा है कि यह सीधा-सीधा भ्रष्टाचार को सरकारी संरक्षण देने जैसा है।इस कानून की व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बेंच में गहरा मतभेद पैदा हो गया। एक गैर-लाभकारी संगठन सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने इस मामले पर एक रिट दायर की थी। जिसमें तर्क दिया गया है कि 17 ए का प्रावधान भ्रष्टाचार रोधी कानून को कमजोर करता है क्योंकि सरकार स्वयं सक्षम प्राधिकारी होने के कारण निष्पक्ष जांच को बाधित करती है।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पूर्वानुमति की आवश्यकता भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विरुद्ध है, इससे जांच में रुकावट आती है और भ्रष्ट अधिकारियों को बचने का मौका मिल जाता है। दायर याचिका में आज दो पीठों के जज ने सुनवाई की है। इसमें एक नाम जस्टिस बीवी नागरत्ना का तो दूसरा नाम केवी विश्वनाथन का है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ( जस्टिस नागरत्ना, जो अपनी निडरता के लिए जानी जाती हैं, उनका रुख साफ है। उनका मानना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में तकनीकी बाधाएं नहीं आनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर भ्रष्टाचार हुआ है, तो जांच को सरकारी मंजूरी के नाम पर लटकाया नहीं जा सकता। उनका संकेत साफ है कि न्याय की राह में सरकार रोड़ा न बने। जबकि जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की राय अलग थी। उन्होंने कानून के शब्दश पालन और अफसरों को मिलने वाली सुरक्षा पर जोर दिया। असल में फैसले के दौरान दोनों जज इस बात पर एकमत नहीं हो पाए कि क्या यह धारा 17ए उन मामलों पर भी लागू होगी जो 2018 से पहले के हैं? या क्या यह केवल नए मामलों के लिए है?

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “ धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। जांच शुरू करने से पहले किसी तरह की पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। पूर्व मंजूरी की शर्त अधिनियम के उद्देश्य के खिलाफ है। इससे जांच में रुकावट आ सकती है और ईमानदार अधिकारियों के बजाय भ्रष्ट लोकसेवकों को संरक्षण मिलता है।” वहीं, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा, “धारा 17ए संवैधानिक रूप से वैध है, बशर्ते मंजूरी देने का फैसला लोकपाल या राज्य का लोकायुक्त करे। इस प्रावधान से ईमानदार अधिकारियों की रक्षा होगी और भ्रष्ट लोगों के लिए सजा सुनिश्चित होगी। इससे प्रशासनिक व्यवस्था में देश की सेवा के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रतिभावान व्यक्तियों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।” हालांकि इसी कानूनी उलझन की वजह से कोई फैसला नहीं हो पाया है। अगर तीन पीठों की बेंच होती तो शायद बहुमत के आधार पर फैसला ले लिया जाता लेकिन क्योंकि दो जजों की पीठ थी, इसलिस अब इस मामले को सीधे सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।

अक्सर यह बात देखने में आई है कि जब विपक्ष के किसी नेता पर आरोप लगता है, तो ईडी और सीबीआई बिना किसी देरी के, बिना किसी मंजूरी के दरवाजे तोड़कर घुस जाती हैं। वहां कोई धारा 17 ए आड़े नहीं आती। लेकिन विपक्ष का दावा है कि जैसे ही मामला सत्ता के करीबियों या उन अफसरों का आता है जो सरकार के इशारों पर काम करते हैं, तो यही धारा 17 ए कवच बन जाती है। सरकार महीनों तक फाइल दबाकर बैठी रहती है कि जांच की इजाजत दें या न दें। विपक्ष का दावा तो यहां तक है कि यह कानून नहीं, बल्कि अफसरों को ब्लैकमेल करने और उन्हें पालतू बनाने का एक हथियार है। जो अफसर सरकार की सुनेगा, उसकी फाइल 17ए में दबी रहेगी। जो नहीं सुनेगा, उसे कुर्बान कर दिया जाएगा।

बीजेपी सरकार हमेशा कहती है कि उन्होंने सिस्टम को साफ किया है। अगर सिस्टम साफ है तो सवाल यह है कि जांच से इतना डर क्यों? अगर किसी अफसर ने ईमानदारी से काम किया है, तो उसे जांच से डरने की क्या जरूरत है? असल में, 2018 का यह संशोधन इसलिए लाया गया था ताकि बड़े-बड़े घोटालों की आंच ऊपर तक न पहुँचे। जब जांच ही शुरू नहीं होगी, तो सबूत कैसे मिलेंगे? और जब सबूत नहीं होंगे, तो अदालत में केस कैसे टिकेगा? यह एक सोची-समझी साजिश है भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहनाने की। अब गेंद जस्टिस सूर्यकांत के पाले में है। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) अभी भी जिंदा है?
क्या इस देश में दो तरह के नागरिक होंगे? एक आम नागरिक, जिस पर आरोप लगते ही पुलिस डंडा चलाती है। एक सरकारी अफसर, जिस पर जांच शुरू करने के लिए भी सरकार की चाकरी करनी पड़ती है। अब जस्टिस सूर्यकांत की बेंच पर इस धारा 17ए पर बड़ा फैसला लेगी।

जब हम टैक्स भरते हैं, तो हमें उम्मीद होती है कि हमारा पैसा देश के विकास में लगेगा, किसी की जेब में नहीं। लेकिन जब सरकार खुद ऐसे कानून बना दे जो जेबकतरों को सुरक्षा दे, तो समझ लीजिए कि दाल में काला नहीं, पूरी दाल ही काली है। ऐसे में कहा जा रहा है कि जस्टिस नागरत्ना ने जो स्टैंड लिया है, वह उन करोड़ों भारतीयों की उम्मीद है जो भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना देखते हैं। लेकिन केवी विश्वनाथन के तर्कों को भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि इसका फैसला लोकपाल को लेना चाहिए।

ऐसे में साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर का यह टकराव मामूली नहीं है। यह लोकतंत्र के बचने या खत्म होने की लड़ाई है। एक तरफ वो जज हैं जो संविधान और न्याय को सर्वाेपरि रखते हैं, और दूसरी तरफ वो व्यवस्था है जो कानून को अपनी मुट्ठी में रखना चाहती है। बीजेपी सरकार को जवाब देना होगा कि उन्होंने 2018 में यह संशोधन किस मंशा से किया और आज जब सुप्रीम कोर्ट के जज इस पर सवाल उठा रहे हैं, तो सरकार को खुद समाने आकर अपना बयान दर्ज कराना चाहिए। जिससे पूरा मामले की सच्चाई सामने आ सके।

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