चैतर वसावा का BJP पर बड़ा हमला | आदिवासी बजट में ‘खेल’ के आरोप, SIT जांच की मांग

आदिवासी विकास बजट को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है... नेता चैतर वसावा ने BJP सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए... 

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात में आदिवासी विकास के नाम पर चल रहे करोड़ों रुपये के बजट में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया गया है.. आम आदमी पार्टी के एक युवा आदिवासी नेता ने कहा कि आदिवासी विकास विभाग का बजट बिना टेंडर, बिना ऑफर.. और बिना किसी शर्त के सीधे गांधीनगर से विकास सहायता एजेंसी.. और कुछ चुनिंदा एजेंसियों को दे दिया जाता है.. ग्राम पंचायत, तालुका पंचायत या जिला पंचायत से आदिवासी लोगों की जरूरतें नहीं पूछी जाती.. शिक्षा, कुपोषण, आंगनवाड़ी, सड़क, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए आदिवासी क्या चाहते हैं.. यह कभी नहीं पूछा जाता..

आपको बता दें कि चैतर वसावा ने कहा कि एक तरफ सरकार नया पोर्टल और ई-टेंडर की बात करती है.. लेकिन आदिवासी विकास विभाग में कोई टेंडर नहीं होता.. इससे आदिवासियों का असली विकास कैसे होगा.. और उन्होंने मांग की कि DSAG एजेंसी को तुरंत बंद किया जाए.. और बजट सीधे ग्राम सभा के प्रस्तावों के आधार पर तालुका.. और जिला स्तर पर लागू किया जाए.. साथ ही बिना टेंडर के हुए सभी कामों की जांच के लिए SIT गठित की जाए..

वहीं यह आरोप गुजरात की आदिवासी राजनीति को हिला देने वाला है.. राज्य में कुल 89.17 लाख आदिवासी आबादी है.. जो 14 जिलों में फैली हुई है.. इनमें 25 अनुसूचित जनजातियां और 5 प्रिमिटिव ट्राइब्स शामिल हैं.. सरकार का दावा है कि वनबंधु कल्याण योजना और ट्राइबल सब प्लान के तहत हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं.. 2025-26 के बजट में ट्राइबल सब प्लान का आउटले 30,120.96 करोड़ था.. इसमें से अक्टूबर 2025 तक 9,800 करोड़ खर्च हो चुके थे.. लेकिन विपक्ष कह रहा है कि यह पैसा एजेंसियों के जरिए बिना पारदर्शिता के खर्च हो रहा है..

आदिवासी विकास विभाग की मुख्य एजेंसी DSAG है.. यह 2000 के दशक में सोसाइटी एक्ट के तहत बनाई गई स्वायत्त संस्था है.. इसका काम ट्राइबल सब प्लान को लागू करना, कौशल विकास, PPP प्रोजेक्ट, शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाएं चलाना है.. DSAG का दफ्तर गांधीनगर में है.. यह ट्राइबल डेवलपमेंट डिपार्टमेंट के अधीन काम करती है.. सरकारी दस्तावेजों में DSAG को नोडल एजेंसी कहा गया है.. लेकिन नेता का आरोप है कि इसी एजेंसी को बिना टेंडर के काम सौंपा जाता है.. एजेंसी तय करती है कि किस ठेकेदार को कितना प्रतिशत काम मिलेगा.. ग्राम सभा या पंचायत से कोई राय नहीं ली जाती..

चैतर वसावा ने विस्तार से बताया कि आदिवासी क्षेत्रों में क्या हो रहा है.. दाहोद, भरूच, वडोदरा, महिसागर जैसे ट्राइबल जिलों में NREGA, नल से जल.. और अन्य योजनाओं में घोटाले सामने आए हैं.. 2025 में इंडिया टुडे की रिपोर्ट में कहा गया कि इन जिलों में एजेंसियां फर्जी बिल बनाकर पैसा हड़प रही हैं.. टेंडर बायपास कर दिया जाता है.. कुछ एजेंसियों को बिना बोली के 30 करोड़ से ज्यादा के काम दे दिए गए.. CAG रिपोर्ट्स में भी पिछले सालों में DSAG के तहत स्किल डेवलपमेंट.. और अन्य स्कीमों में अनियमितताएं बताई गई हैं.. जिसको लेकर वसावा ने कहा कि आदिवासी बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते.. कुपोषण से जूझ रहे हैं.. आंगनवाड़ी में दूध-बिस्किट नहीं पहुंचते.. लेकिन बजट एजेंसियों के खाते में जा रहा है..

आप नेता ने आरोप लगाया कि आदिवासी विकास विभाग का बजट सीधे गांधीनगर से एजेंसियों को आवंटित होता है.. कोई टेंडर पोर्टल नहीं, कोई ई-बिडिंग नहीं.. एजेंसी तय करती है कि कौन सा ठेकेदार काम करेगा.. आदिवासी गांवों में स्कूल में शिक्षक, अस्पताल में डॉक्टर, आंगनवाड़ी में पौष्टिक आहार, सड़क, बिजली या पानी चाहिए.. यह कभी नहीं पूछा जाता.. पंचायत से प्रस्ताव नहीं मांगे जाते.. इससे विकास योजनाएं आदिवासी जरूरतों से दूर हो जाती हैं.. जिसको लेकर वसावा ने कहा कि एक तरफ सरकार कहती है कि हम आदिवासियों के लिए 30,000 करोड़ से ज्यादा खर्च कर रहे हैं.. लेकिन हकीकत में पैसा कहां जा रहा है, कोई जवाब नहीं..

वहीं यह मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा हो गया है.. गुजरात में 14 ट्राइबल जिलों में आदिवासी वोट बहुत महत्वपूर्ण हैं.. AAP, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को उठा रहे हैं.. नेता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि DSAG एजेंसी को तुरंत बंद कर दिया जाए.. अगर आदिवासियों का बजट इस्तेमाल करना है.. तो सीधे ग्राम सभा में प्रस्ताव रखा जाए.. ग्राम सभा में जो मांगें आएं, उन्हें मंजूरी देकर तालुका.. और जिला स्तर पर काम कराया जाए.. इससे विकास असली लोगों तक पहुंचेगा.. उन्होंने मांग की कि बिना टेंडर के हुए सभी कामों की जांच हो.. और इस मामले में SIT गठित की जाए..

आपको बता दें कि DSAG की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.. DSAG की वेबसाइट पर टेंडर सेक्शन है.. और कुछ कामों के लिए ई-टेंडर होते हैं.. लेकिन नेता का कहना है कि आदिवासी विकास विभाग का बड़ा बजट DSAG.. और कुछ एजेंसियों को बिना प्रतिस्पर्धा के दिया जाता है.. CAG की पुरानी रिपोर्ट में भी DSAG के तहत स्किल ट्रेनिंग में अनियमितताएं बताई गई थी.. 2025 की इंडिया टुडे रिपोर्ट में दाहोद-भरूच में NREGA घोटाले में एजेंसियों द्वारा टेंडर बायपास करने का जिक्र है..

जानकारी के मुताबिक गुजरात में आदिवासी जिले जैसे दाहोद, पंचमहाल, तापी, नर्मदा में कुपोषण, स्कूल ड्रॉपआउट और बेरोजगारी बड़ी समस्या है.. आंगनवाड़ी केंद्रों में पौष्टिक भोजन नहीं पहुंचता.. स्कूलों में शिक्षक कम हैं.. सड़क और पानी की सुविधा अपर्याप्त है.. सरकार का दावा है कि वनबंधु कल्याण योजना के तहत नए गुजरात पैटर्न से 90% बजट जिला स्तर पर.. और 10% राज्य स्तर पर खर्च होता है.. लेकिन नेता कहते हैं कि जिला ट्राइबल डेवलपमेंट कमेटी भी असल आदिवासी जरूरतें नहीं पूछती.. सब कुछ ऊपर से तय होता है..

 

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