गाय को लेकर फिर घिरी बीजेपी, सुधांशु के बयान से बीजेपी में ही हड़कंप!

देश में इन दिनों नफरत राजनीति इस कदर बढ़ गई है जिसकी कोई हद्द नहीं है। आलम ये है अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए बीजेपी नेता किसी स्तर तक गिर सकते हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: देश में इन दिनों नफरत राजनीति इस कदर बढ़ गई है जिसकी कोई हद्द नहीं है। आलम ये है अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए बीजेपी नेता किसी स्तर तक गिर सकते हैं।

इसी बीच बीजेपी के एक काफी पढ़े लिखे और खुद में समझदार कहे जाने वाले सुधांशु त्रिवेदी ने गाय को लेकर ऐसा बयान दे दिया जिससे देश में अलग ही प्रकार की बहस छिड़ गई है। विपक्ष सुधांशु के बयान को लेकर जमकर निशाना साध रहा है, तो वहीं आम लोग भी सुधांशु समेत अन्य बीजेपी नेताओं पर हमलावर हैं। दरअसल बीते दिनों News 24 को दिए एक इंटरव्यू में त्रिवेदी जी ने गाय की परिभाषा ही बदल दी। साथ ही उन्होंने यह भी बता दिया कि कौनसी गाय माता है और कौनसी नहीं।

दरअसल बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि नॉर्थ-ईस्ट में लोग गाय का नहीं, बल्कि मिथुन नाम के पशु का मांस खाते हैं. इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई. कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब मिथुन दिखने में गाय जैसा है और उसी परिवार से जुड़ा है, तो फिर दोनों में फर्क क्यों किया जा रहा है. कुछ यूजर्स ने इसे राजनीतिक और धार्मिक नजरिए से भी जोड़कर देखा, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया.

उनके इस बयान पर विपक्ष ने निशाना साधना शुरू कर दिया। इसी कड़ी में कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया के जरिये उनपर जोरदार कटाक्ष करते हुए लिखा कि सुधांशु त्रिवेदी जी के लिए, उत्तर भारत में “गाय हमारी माता है”, पूर्वोत्तर भारत में “हम गाय को खाता है”, इतनी कोरी बकवास सिर्फ़ यही कर सकते हैं! इसी कड़ी में डॉक्टर रागिनी नायक ने भी जोरदार हमला बोला। उन्होंने एक्स पर वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा कि- हमारे लिए ‘गाय’ माता है लेकिन जो North East में खाया जाता है उसका नाम है ‘मिथुन’.। ‘गाय’ माता है लेकिन ‘जर्सी’ गाय माता नहीं है ना” ‘जर्सी’ का तो पता नहीं पर Beef-Eating पर ऐसा तर्क तो कोई ‘चरसी’ भी ना दे। भाजपाइयों के ‘दोगलेपन’ की कोई सीमा नहीं,

हालांकि सुधांशु त्रिवेदी जैसे विद्वान् लीडर के बयान से न सिर्फ विपक्ष ने हमला करना जारी रखा ,बल्कि इस बयान से भाजपा के नेता भी कहीं-न-कहीं आहत नजर आए तभी तो खुद किरेन रिजिजू भी इस बहस में कूद पड़े। बहस के बीच केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने मिथुन के साथ एक वीडियो शेयर किया. उन्होंने साफ लिखा कि यह मिथुन है और अरुणाचल प्रदेश का राजकीय पशु है. उनके इस कदम को मिथुन की पहचान और नॉर्थ-ईस्ट की संस्कृति को समझाने की कोशिश के तौर पर देखा गया. वीडियो के बाद कई लोगों को पहली बार पता चला कि मिथुन सिर्फ नाम नहीं, बल्कि एक अलग और खास पशु है.

इसी बीच वरिष्ठ और देश के चर्चित पत्रकारों में से एक रविश कुमार ने भी इस मामले पर तंज कसा। जर्सी गाय को मौसी का दर्जा दिया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री को मन की बात में सुधाँशु त्रिवेदी की परिभाषा का प्रसारण करना चाहिए ताकि ज़बरदस्ती सुन रहे बीजेपी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के दिल दिमाग़ में गाय, जर्सी गाय और मिथुन का अंतर स्पष्ट हो सके। विज्ञापन का यह बोर्ड दिल्ली के निज़ामुद्दीन में लगा है। अमूल को भी लिखना चाहिए कि किस गाय की ममता से भरा दूध है। भारत की सफेद गाय की या जर्सी गाय की?

खैर ये बात किसी से छुपी नहीं है कि भाजपा अपने राजनीतिक फायदे के लिए किसी भी हद्द तक जा सकती है। ऐसे में कई सवाल आ रहे हैं। अब सुधांशु के बयान पर भाजपा ने करुणा की जगह सुविधा की थियोलॉजी गढ़ ली है। जब दलितों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा को वैचारिक वैधता देनी होती है, तो “गाय” की परिभाषा फैल जाती है, और किसी भी खाल के नीचे “गौ माता” का चेहरा रख दिया जाता है। जब किसानों या निर्यातकों को राहत देनी होती है, तो वही परिभाषा सिकुड़ जाती है, भैंसें, मिथुन और जर्सी गायें अचानक “सिर्फ़ पशु” बन जाती हैं। गोपवित्रता की सीमाएँ अब नैतिकता से नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों से तय होती हैं।

यहाँ कुछ बेहद कठोर सवाल सामने आते हैं, जिन्हें टीआरपी की शोर-शराबे में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रिकॉर्ड पर उठाया जाना चाहिए। अगर मिथुन “गाय नहीं है”, तो क्या भाजपा साफ़ शब्दों में मानेगी कि उसका वध स्वीकार्य है? और अगर हाँ, तो किस आधार पर: जैविक, धार्मिक, या मौकापरस्त राजनीतिक? अगर जर्सी और संकर नस्ल की गायें “गौ माता” नहीं हैं, तो क्या वे गोवंश हत्या निषेध की नैतिक सीमा से बाहर हैं, या उन्हें चुपचाप बलि चढ़ा दिया जाएगा जबकि मंचों और भाषणों में देसी गाय की महिमा गाई जाती रहेगी?

सवाल ये भी है कि आज की हिंसक गौरक्षा मुहिम को किसी “आध्यात्मिक चेतना” का रूप बताना कितनी गंभीरता के साथ लिया जा सकता है? क्या यह वही पुरानी रणनीति नहीं है, भय, भ्रम और भावनाओं से राजनीति चलाने की? सबसे बुनियादी सवाल यही है: जो पार्टी स्वयं को सर्व जीवों के प्रति करुणा की संवाहक बताती है, वह ऐसी नैतिक पदानुक्रम कैसे बना सकती है जिसमें कुछ जानवर देवता बना दिए जाते हैं, जबकि उतने ही संवेदनशील जीव चाकू के हवाले कर दिए जाते हैं? और उन मनुष्यों के साथ घृणा की जाती है जिनका श्रम पशु-आधारित अर्थव्यवस्था को जीवित रखता है?

अगर भाजपा सचमुच करुणा की राजनीति में विश्वास रखती है, तो उसकी संवेदना नस्ल, भूगोल और वोट-बैंक पर पहुँचते ही क्यों समाप्त हो जाती है? जब तक सुधांशु त्रिवेदी और उनकी पार्टी तीन सीधें प्रश्नों का उत्तर नहीं देती: कौन से गोवंश मारे जा सकते हैं, किनकी रक्षा होगी, और क्यों केवल उन्हीं की, तब तक “गौ माता” का हर जयघोष उसी निंदक राजनीति की गूंज रहेगा, जिसे गोलवलकर ने स्वयं कभी स्वीकार किया था, कोई नैतिक सिद्धांत नहीं बल्कि एक राजनीतिक हथियार, जो बूचड़खानों के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि नागरिकों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल होता है। खैर सुधांशु के बयान के बाद सियासी गलियारों में एक बार फिर गाय को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

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