सुप्रीम कोर्ट से डॉग लवर्स को बड़ा झटका : सार्वजनिक जगहों से हटेंगे आवारा कुत्ते

डॉग लवर्स की दलीलें खारिज

  • अब क्या करेंगे डॉग लवर्स
  • क्या इंसानों की दुनिया में जानवरों के लिए कोई जगह नहीं बची
  • पूर्व आदेश में बदलाव की मांग वाली याचिका खारिज
  • तमिलनाडु में साल के पहले चार महीनों में करीब दो लाख कुत्तों के काटने के मामले सामने आए

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। आज सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला आया है जिसमें कुत्तों के काटने की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाने के अपने पुराने फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें डॉग लवर्स की ओर से स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड जैसी सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने के पूर्व आदेश में बदलाव की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि कि पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किए जाने के कारण समस्या और गंभीर होती जा रही है। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा है कि आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और यह अब बेहद गंभीर समस्या बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान के श्रीगंगानगर शहर में मात्र एक महीने में कुत्तों के काटने के 1,084 मामले दर्ज किए गए। कई छोटे बच्चों के चेहरे पर गंभीर चोटें आईं। तमिलनाडु में साल के पहले चार महीनों में करीब दो लाख कुत्तों के काटने के मामले सामने आए। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट समेत देश के व्यस्त एयरपोट्र्स पर भी कुत्तों के काटने की घटनाएं हो रही हैं। सूरत में एक जर्मन यात्री को भी कुत्ते ने काट लिया। ऐसी घटनाएं शहरी प्रशासन और गवर्नेंस पर लोगों के विश्वास को प्रभावित कर रही हैं।

आदेश के बाद अभी तक नहीं हुई प्रभावी कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त और 7 नवंबर 2025 को जारी अपने निर्देशों का जिक्र करते हुए कहा कि इन निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर राज्य सरकारें और संबंधित अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई, अनुशासनात्मक कार्रवाई और व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी। डॉग लवर्स ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाने का आदेश बहुत कठोर है और इससे कुत्तों के अधिकारों का हनन हो रहा है। उन्होंने एबीसी कार्यक्रम को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए जनहित और सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी।

कुत्तों की भूख और जिंदगी का क्या?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देशभर में डॉग लवर्स और एनिमल एक्टिविस्ट्स के बीच गहरा गुस्सा और बेचैनी है। जिन सड़कों पर लोग खतरा देख रहे हैं वहीं हजारों लोग उन आवारा कुत्तों में एक बेजुबान, डरा हुआ और भूखा जीव देख रहे हैं। डॉग लवर्स का कहना है कि यह फैसला समस्या का समाधान नहीं बल्कि संवेदनाओं की हार है। उनका आरोप है कि इंसानी सिस्टम अपनी नाकामी छिपाने के लिए अब बेजुबानों को सड़क से हटाने की तैयारी कर रहा है। एनिमल एक्टिविस्ट्स का कहना है कि आवारा कुत्ते अचानक हिंसक नहीं होते। उन्हें भूखा रखा जाता है पीटा जाता है पत्थर मारे जाते हैं गाडिय़ों से कुचला जाता है और फिर जब वही कुत्ते डर या आक्रोश में हमला करते हैं, तो पूरा दोष उन्हीं पर डाल दिया जाता है। सवाल उठ रहा है कि क्या इंसानों की क्रूरता पर कभी कोई सुनवाई होगी? डॉग लवर्स का सबसे बड़ा तर्क यह है कि अगर एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम सही तरीके से लागू होता नसबंदी और वैक्सीनेशन समय पर होते तो हालात यहां तक पहुंचते ही नहीं। उनके मुताबिक सरकारों और नगर निगमों की लापरवाही की सजा अब बेजुबान जानवरों को दी जा रही है। वे कह रहे हैं कि हटाना कोई समाधान नहीं है। अगर एक इलाके से कुत्तों को हटाया जाएगा तो दूसरे झुंड वहां आ जाएंगे और समस्या फिर खड़ी हो जाएगी।

कुत्तों के काटने की घटनाओं में हुआ है इजाफा

देशभर में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनसे होने वाले हमलों ने पिछले कुछ वर्षों में बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। कई राज्यों में बच्चों और बुजुर्गों पर कुत्तों के हमलों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को एबीसी कार्यक्रम को सख्ती से लागू करने और आवारा कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए थे।

खाना खिलाकर छोड़ देना क्या यही पशु प्रेम है?

एक तरफ शहरों की गलियों में कटोरों में दूध और बिस्किट लेकर खड़े डॉग लवर्स हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं गलियों में डर के साये में जीते बच्चे बुजुर्ग और आम लोग। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि आवारा कुत्तों को खाना कौन खिला रहा है सवाल यह है कि क्या सिर्फ खाना खिलाना ही पशु प्रेम है? और अगर उन कुत्तों का झुंड किसी मासूम पर हमला कर दे तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? देशभर में आवारा कुत्तों का संकट अब सिर्फ जानवरों से प्यार की बहस नहीं रहा यह सीधे-सीधे सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। कई रिहायशी इलाकों में आरोप लगते रहे हैं कि कुछ डॉग फीडर्स नियमित रूप से एक ही जगह कुत्तों को इकट्ठा करते हैं। धीरे-धीरे वहां झुंड बन जाते हैं जो राह चलते लोगों बाइक सवारों और बच्चों पर हमला करने लगते हैं। लेकिन जब हादसा होता है तब जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं दिखता। लोग पूछ रहे हैं कि अगर आप कुत्तों को खाना खिलाते हैं तो क्या उनकी वैक्सीनेशन नसबंदी और व्यवहार की जिम्मेदारी भी आपकी नहीं होनी चाहिए? क्या सिर्फ सड़क पर खाना डाल देना और फिर पूरे मोहल्ले को खतरे में छोड़ देना ही पशु प्रेम कहलाएगा? लेकिन इस पूरे संकट का सबसे बड़ा चेहरा सिर्फ डॉग फीडर्स नहीं बल्कि फेल सिस्टम भी है। नगर निगमों और प्रशासन ने वर्षों तक एबीसी यानी एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम को सिर्फ फाइलों में चलाया। नसबंदी के दावे हुए बजट खर्च हुए मीटिंग्स हुईं लेकिन सड़कों पर कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ती गई। न वैक्सीनेशन पूरा हुआ न आबादी कंट्रोल हुई और न ही लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई। यही वजह है कि अब सुप्रीम कोर्ट को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा।

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