अबू सलेम की समयपूर्व रिहाई की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व किया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 मुंबई बम धमाकों के दोषी अबू सलेम की समय पूर्व रिहाई पर फैसला सुरक्षित रख लिया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने 1993 मुंबई बम धमाकों के दोषी अबू सलेम की समय पूर्व रिहाई पर फैसला सुरक्षित रख लिया है.
सलेम ने 25 साल से अधिक की जेल अवधि पूरी होने और पुर्तगाल प्रत्यर्पण की शर्तों का हवाला देते हुए रिहाई मांगी है. उसे साल 2005 में पुर्तगाल से भारत लाया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के दोषी अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका पर सोमवार (27 जुलाई) को सुनवाई की.
कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. सलेम ने अपनी याचिका में कहा कि वो उम्रकैद की सजा के तहत पिछले 25 सालों से जेल में बंद है और अब उसे रिहा किया जाना चाहिए. मुंबई बम धमाकों में 257 लोग मारे गए थे.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच से सलेम के वकील ऋषि मल्होत्रा ने कहा कि TADA कोर्ट के साफ निर्देश के बावजूद कि सलेम को ट्रायल के दौरान जेल में बिताए समय का पूरा फ़ायदा (सेट-ऑफ़) मिलना चाहिए, लेकिन जेल अधिकारी उन्हें यह फ़ायदा नहीं दे रहे हैं.
सलेम के वकील ने दी दलील
जस्टिस मेहता ने कहा कि कस्टडी की असल अवधि का मैथमैटिकल हिसाब क्या है?. सलेम के वकील ने कहा कि एक संवैधानिक फैसला है कि जेल में मिली छूट को असल सजा की अवधि में गिना जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि छूट दो तरह की होती है.
एक धारा 432 के तहत मिलती है, जिसका वो दावा भी नहीं कर रहे हैं. और दूसरी जेल में अच्छे व्यवहार के आधार पर मिलती है. कोर्ट ने माना है कि इसे असल कैद की अवधि में गिना जाना चाहिए.
जेल में 25 साल से ज्यादा समय हो चुका है’
वकील ने कहा कि सेट-ऑफ (सज़ा में कटौती) का फ़ायदा और साथ ही सरकार का पुर्तगाल को दिया गया यह भरोसा कि उन्हें 25 साल से ज़्यादा की जेल नहीं होगी. आज जेल में 25 साल से ज़्यादा समय हो चुका है यानी 26 साल, 9 महीने और 22 दिन.
मल्होत्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 25 साल की सज़ा पूरी होने से एक महीने पहले CrPC की धारा 432 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि वो धारा 432 का दावा भी नहीं कर रहा हैं. उनका तर्क यह है कि एक ‘फ़ुल बेंच’ के फ़ैसले के अनुसार, जेल में सलेम के अच्छे व्यवहार के लिए मिलने वाली छूट (जिसे ‘अर्न्ड रिमिशन’ कहा जाता है) को असल सज़ा की अवधि में गिना जाना चाहिए. कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा है कि इसे असल सज़ा में शामिल किया जाना चाहिए.
सलेम की याचिका पर आदेश सुरक्षित
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अबू सलेम की याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया. सलेम के वकील से कहा कि उनकी तरफ से लिखित दलीलें और पूर्व के सहायक फैसले एक हफ़्ते के भीतर दाखिल किए जा सकते हैं.
जस्टिस नाथ ने वकील से कहा कि क्या आप विस्तृत फ़ैसला चाहते हैं या याचिका को सीधे खारिज करवाना चाहते हैं?. मल्होत्रा ने कहा कि विस्तृत फ़ैसला. जस्टिस नाथ ने कहा कि हमने आपकी बात सुन ली है. आगे इसे अपनी लिखित दलीलों में शामिल करें.
मल्होत्रा ने कहा कि कम से कम नोटिस तो जारी किया जा सकता है. कम से कम अंडरट्रायल सेट-ऑफ़ (विचाराधीन कैदी के तौर पर बिताई गई सज़ा की अवधि को कुल सज़ा में से घटाना) को तो शामिल किया जाना चाहिए, जैसा कि TADA कोर्ट ने आदेश दिया था.
2005 में पुर्तगाल से भारत लाया गया था सलेम
अबू सलेम की रिहाई का मामला पुर्तगाल से उसके प्रत्यर्पण की शर्तों से भी जुड़ा हुआ है. सलेम को साल 2005 में पुर्तगाल से भारत लाया गया था. उसके प्रत्यर्पण के दौरान कुछ शर्तें तय की गई थीं, जिनमें उसकी सजा की अवधि को लेकर भी प्रावधान शामिल थे. सलेम का कहना है कि इन शर्तों के तहत उसने 24 दिसंबर 2024 को 25 साल की जेल की अवधि पूरी कर ली थी.



