इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट की रजामंदी, 12 साल से कोमा में हरीश राणा को मिलेगी मौत

सुप्रीम कोर्ट ने आज बुधवार को अपने एक फैसले के तहत 31 साल के आदमी को पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत दे दी, जो 12 साल से अधिक समय से कोमा में है. इसके लिए कोर्ट ने उसका आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट हटा दिया. पैसिव यूथेनेशिया एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी मरीज को जान-बूझकर मरने दिया जाता है, इसके लिए उसे लाइफ सपोर्ट या जिंदा रखने के लिए जरूरी इलाज रोक दिया जाता है या हटा दिया जाता है.
देश की सबसे बड़ी अदालत ने गाजियाबाद के 32 साल के हरीश राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. बेटे की मौत की गुहार लगाते हुए पिता ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच यह फैसला सुनाया.
‘ईश्वर नहीं पूछता कि कौन जीना चाहता है’
इच्छामृत्यु की मांग वाली याचिका पर जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, “ईश्वर किसी मनुष्य से यह नहीं पूछता कि वह जीवन को स्वीकार करता है या नहीं, जीवन उसे लेना ही पड़ता है, ये Henry David Thoreau के शब्द हैं, जिनका विशेष महत्व तब उभरकर सामने आता है जब अदालतों के समक्ष यह सवाल आता है कि क्या किसी व्यक्ति को मरने का विकल्प चुनने का अधिकार है. इसी संदर्भ में विलियम शेक्सपीयर का प्रसिद्ध कथन ‘To be, or not to be ‘ यानी ‘जीना या न जीना’ भी इस दार्शनिक और विधिक विमर्श को गहराई प्रदान करता है.”
31 साल के हरीश राणा पिछले 12 सालों से बैड पर थे और अब उन्हें इच्छामृत्यु के तहत मौत दी जाएगी. इच्छामृत्यु के तहत मौत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मान्यता देने वाले 2018 के कॉमन कॉज फैसले का पहला न्यायिक फैसला है. बेंच ने फैसले से पहले कोर्ट की ओर से गठित 2 मेडिकल बोर्डों के रिपोर्ट की पड़ताल की जिसमें बताया गया कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है.
12 सालों से ही बिस्तर पर सांस लेने को मजबूर
गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में रहने वाले हरीश के माता-पिता की ओर से दाखिल याचिका के मुताबिक, वह पिछले 12 साल से ज्यादा समय से बिस्तर पर ही सांसें ले रहा है. इस दौरान हरीश को तरल भोजन दिया जाता है.
हरीश राणा को साल 2013 में घर की चौथी मंजिल से गिरने के बाद सिर में गंभीर चोटें आईं और वह एक दशक से ज्यादा समय से कोमा में हैं. बेंच ने AIIMS को हरीश को पैलिएटिव केयर में एडमिशन देने का निर्देश दिया ताकि मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लिया जा सके. साथ ही यह भी कहा कि यह तय किया जाना चाहिए कि इसे एक खास योजना के साथ वापस लिया जाए ताकि इज्जत बनी रहे.
यह एक ‘दुखद’ रिपोर्टः सुप्रीम कोर्ट
शीर्ष अदालत ने फैसले से पहले हरीश के माता-पिता से मिलने की इच्छा जताई थी. उसने दिल्ली स्थित AIIMS के डॉक्टरों के एक सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड द्वारा फाइल की गई हरीश राणा की मेडिकल हिस्ट्री वाली एक रिपोर्ट देखी थी और कहा था कि यह एक “दुखद” रिपोर्ट है.
प्राइमरी मेडिकल बोर्ड ने मरीज की हालत की जांच करने के बाद, उसके ठीक होने की बहुत कम संभावना पर जोर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर को कहा था कि प्राइमरी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, आदमी की हालत “बहुत खराब” है. सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2023 में जारी गाइडलाइंस के मुताबिक, वेजिटेटिव स्टेट में मरीज के लिए आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट हटाने पर एक्सपर्ट की राय के लिए एक प्राइमरी और एक सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड बनाना अनिवार्य होगा.
बेंच ने अपने फैसले में कहा कि मौजूदा मामले में उपचार बंद करने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाया जा सकता था. जब प्राइमरी और सेकेंडरी बोर्ड ने इलाज बंद करने की पुष्टि कर दी है, तो कोर्ट के हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं रह गई. चूंकि यह पहला केस था, इसलिए कोर्ट को मामला सौंपना उचित समझा गया. मरीज की इलाज बंद करने की प्रक्रिया मानवीय होनी चाहिए. इसके लिए एक व्यवस्थित ढांचा आवश्यक है.

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