सुप्रीम कोर्ट का सिस्टम के चेहरे पर पड़ा सीधा तमाचा

महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन व पेंशन का अधिकार

  • सेना, नौसेना और वायुसेना में ‘व्यवस्थागत भेदभाव’ पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
  • 23 साल की कानूनी जंग के बाद मिला न्याय
  • बड़ा सवाल क्या बदलेगा सिस्टम?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं है बल्कि उस सिस्टम पर पड़ा सीधा तमाचा है जो सालों से वर्दी के भीतर भी भेदभाव की दीवार खड़ी किए बैठा था। देश की रक्षा करने वाली सेनाएं जहां अनुशासन सम्मान और समानता की बातें सबसे ज्यादा होती हैं। वहीं महिला अधिकारियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया। और अब आखिरकार 23 साल चली लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस सच्चाई को खुली अदालत में उजागर कर उसका समाधान दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सेना, नौसेना और वायुसेना में महिला शार्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) अधिकारियों के साथ हुए व्यवस्थागत भेदभाव पर तीखी टिप्पणी करते हुए साफ कर दिया कि यह समस्या योग्यता की नहीं बल्कि मानसिकता की है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि महिलाओं को परमानेंट कमीशन (पीसी) से वंचित करना उनकी क्षमता की कमी नहीं बल्कि सिस्टम में बैठे पूर्वाग्रह का नतीजा है। यह वही सिस्टम है जो हर साल 250 महिलाओं की सीमा तय कर देता है जैसे योग्यता का पैमाना संख्या से तय होता हो। कोर्ट ने इस सीमा को मनमाना बताते हुए खारिज कर दिया। सवाल यही है कि जब देश की रक्षा में कोई सीमा नहीं तो महिलाओं के अवसरों पर यह अदृश्य दीवार क्यों?

सभी को मिलेगा स्थायी कमीशन

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि स्थायी कमीशन अब केवल पुरुष अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा। जो महिला एसएससी अधिकारी पहले ही स्थायी कमीशन पा चुकी हैं उनका कमीशन रद्द नहीं किया जाएगा। कोर्ट की कार्यवाही के दौरान जिन महिला अधिकारियों को सेवा से मुक्त कर दिया गया था उन्हें एक बार की राहत के तौर पर 20 साल की सेवा मानकर पेंशन दी जाएगी। हालांकि यह लाभ जज एडवोकेट जनरल (जेएजी) और आर्मी एजुकेशन कोर (एईसी) कैडर की महिला अधिकारियों पर लागू नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि दिसंबर 2020 में चयन बोर्ड द्वारा अपनाया गया रिक्तियों का माडल तर्कसंगत था लेकिन मूल्यांकन के मानदंड और नीतियां समय पर सार्वजनिक नहीं की गयी जिससे महिला अधिकारियों पर नकारात्मक असर पड़ा। दिसंबर 2020 और दिसंबर 2022 के चयन बोर्ड द्वारा दी गई स्थायी कमीशन और पदोन्नति रद्द नहीं होंगी। पुराने फैसलों के आधार पर दिए गए फायदे भी बरकरार रहेंगे। एक बार की राहत के तौर पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि नया चयन बोर्ड बुलाने के बजाय कुछ योग्य महिला अधिकारियों को सीधे पदोन्नति दी जाएगी, बशर्ते वे मेडिकल और अनुशासनिक जांच में फिट हों। यह राहत जनवरी 2009 से पहले नौसेना में शामिल हुई एसएससी महिला अधिकारियों को मिलेगी। साथ ही जनवरी 2009 के बाद शामिल हुईं महिला अधिकारियों को भी (लॉ, एजुकेशन और नेवल आर्किटेक्चर ब्रांच को छोड़कर) और उन पुरुष एसएससी अधिकारियों को जो सेवा शर्तों की वजह से स्थायी कमीशन से बाहर रखे गए थे। जिन अधिकारी वित्तीय वर्ष 2025 में सेवा से मुक्त हो गए, उन्हें भी 20 साल की सेवा मानकर पेंशन दी जाएगी। उनकी पेंशन 1 जनवरी 2025 से लागू मानी जाएगी। 2019, 2020 और 2021 के चयन बोर्ड द्वारा जिन एसएससी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया गया, उसे रद्द नहीं किया जाएगा। एक बार की राहत के रूप में इन चयन बोर्डों में शामिल सभी एसएससी अधिकारियों (पुरुष और महिला) को 20 साल की सेवा पूरी मानकर पेंशन और अन्य लाभ दिए जाएंगे, लेकिन बकाया वेतन नहीं मिलेगा।

पूरे समाज के लिए आईना है फैसला

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट कई बार महिलाओं के पक्ष में फैसले दे चुका है। लेकिन हकीकत यह है कि उन फैसलों का असर जमीन पर सीमित दिखायी दिया। हालांकि कुछ बदलाव तो जरूर हुए लेकिन मूल समस्या जस की तस बनी रही। यही वजह है कि इस बार का फैसला जितना बड़ा दिखता है उतना ही बड़ा सवाल भी खड़ा करता है कि क्या सिस्टम इस बार सच में बदलेगा या फिर यह आदेश भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? अगर सेना जैसे अनुशासित और संरचित संस्थान में सिस्टमिक डिस्क्रिमिनेशन मौजूद है तो बाकी सेक्टर्स की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। यह फैसला सिर्फ सेना के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए आईना है।

अब बहाने की गुंजाइश कम है

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कोर्ट ने सिर्फ टिप्पणी नहीं की है बल्कि ठोस आदेश दिए हैं कि पेंशन, परमानेंट कमीशन, पारदर्शिता और मनमानी सीमाओं पर रोक। यानी अब बहाने की गुंजाइश कम है। लेकिन असली लड़ाई कोर्ट के आदेश से नहीं उसके क्रियान्वयन से जीती जाएगी। क्योंकि भारत में कानून बनाना आसान है लेकिन उसे जमीन पर उतारना कठिन काम है। यह फैसला एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेतावनी उन लोगों के लिए, जो अब भी पुराने ढर्रे पर चलना चाहते हैं। और अवसर उन महिला अधिकारियों के लिए जिन्होंने सालों तक संघर्ष किया और अब जाकर न्याय पाया। यह सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं बल्कि मानसिकता की लड़ाई में एक बड़ा कदम है लेकिन याद रखिए यह अंत नहीं शुरुआत है।

मिलेगी पूरी पेंशन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जिन महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन नहीं मिला उन्हें अब पेंशन के लिए न्यूनतम 20 साल की सेवा पूरी करने वाला माना जाएगा। यानी अब उन्हें उनके हक से वंचित नहीं रखा जा सकता। यह सिर्फ एक राहत नहीं है बल्कि एक स्वीकारोक्ति है कि उनके साथ अन्याय हुआ। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। कोर्ट ने यह भी पाया कि सेना और नौसेना में महिला अधिकारियों का मूल्यांकन ही गलत तरीके से किया गया। यानी जो प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए थी वहां भी भारी पक्षपात हुआ। अब कोर्ट ने चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और डायनेमिक वैकेंसी माडल को अपनाने के निर्देश दिए हैं।

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