ITPA पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा- जानिए कानून का उद्देश्य क्या है
जस्टिस पारदीवाला ने 298 पेज के फैसले में कहा कि कानून की धारा 7 और 8 सामान्य नियम के अपवाद हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: जस्टिस पारदीवाला ने 298 पेज के फैसले में कहा कि कानून की धारा 7 और 8 सामान्य नियम के अपवाद हैं. धारा 7 सार्वजनिक स्थानों, शैक्षणिक संस्थानों या अधिसूचित क्षेत्रों के निकट वेश्यावृत्ति को दंडनीय बनाती है, तो धारा 8 सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को आकर्षित करने या बुलाने को अपराध मानती है.
सुप्रीम कोर्ट ने 70 साल पहले लागू किए गए अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 पर अपने अहम फैसले में साफ किया कि इस कानून का मकसद वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करना या उसे स्वतः अपराध घोषित करना नहीं है, बल्कि इसके व्यावसायीकरण, तस्करी और शोषणकारी नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाना है. कोर्ट का कहना है कि इस कानून का मकसद सार्वजनिक जगहों की शालीनता और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना है. साथ ही यह महिलाओं के शोषण पर भी रोक लगाता है.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की 2 सदस्यीय बेंच ने कहा कि इस कानून (Immoral Traffic Prevention Act 1956) का मूल मकसद वेश्यावृत्ति को संगठित व्यवसाय के रूप में चलाने और उससे जुड़े शोषणकारी तंत्र पर नियंत्रण बनाए रखना है. कोर्ट ने कहा कि यह कानून उन लोगों पर काबू करने के लिए है जो इस गतिविधि का व्यावसायिक लाभ उठाते हैं. ये कानून सिर्फ वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को दंडित करने के लिए नहीं है.
वेश्यालयों से मुक्त कराई गई महिलाओं के पुनर्वास से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान देश की सबसे बड़ी अदालत ने कानून के ऐतिहासिक संदर्भों की भी पड़ताल की. कोर्ट ने कहा कि 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं और लड़कियों की तस्करी व्यापक समस्या हुआ करती थी और उस दौर में समाज वेश्यावृत्ति को अनैतिक गतिविधि के रूप में देखता था.
सार्वजनिक-शैक्षणिक संस्थानों के पास वेश्यावृत्ति दंडनीय
जस्टिस पारदीवाला द्वारा लिखे गए 298 पेज के फैसले में कहा गया कि कानून की धारा 7 और 8 सामान्य नियम के अपवाद हैं. धारा 7 सार्वजनिक स्थानों, शैक्षणिक संस्थानों या अधिसूचित क्षेत्रों के निकट वेश्यावृत्ति को दंडनीय बनाती है, जबकि धारा 8 सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को आकर्षित करने या बुलाने को अपराध मानती है.
बेंच ने कहा कि इन प्रावधानों का मकसद सार्वजनिक शालीनता, सामाजिक व्यवस्था और आम नागरिकों की सुविधा बनाए रखना है. इसलिए कानून कुछ विशेष परिस्थितियों में व्यक्तिगत गतिविधियों पर भी नियंत्रण रखता है. इसी सामाजिक और कानूनी पृष्ठभूमि के कारण कानून के नाम में ‘अनैतिक’ शब्द शामिल किया गया. कोर्ट ने कहा कि आईटीपीए मुख्य रूप से तस्करों, दलालों और शोषण करने वाले अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनाया गया था, न कि वेश्यावृत्ति में संलिप्त महिलाओं को दंडित करने के लिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह न तो वेश्यावृत्ति को पूरी तरह अपराध घोषित कर रहा है और न ही इसे पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ने की वकालत कर रहा है. कोर्ट के अनुसार, कानून का मूल मकसद वेश्यावृत्ति से जुड़े हर कृत्य की निंदा करना नहीं है, बल्कि शोषण और व्यावसायिक दोहन को रोकना है.
कोर्ट ने तय की वेश्यालय की परिभाषा
फैसले का सबसे अहम हिस्सा अधिनियम में वेश्यागृह की परिभाषा से जुड़ा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला अकेले अपने घर में आजीविका के लिए वेश्यावृत्ति करती है, वहां कोई अन्य महिला शामिल नहीं है और न ही किसी दलाल, बिचौलिए या बाहरी व्यक्ति की भूमिका है, तो ऐसे निवास स्थान को कानून की नजर में वेश्यालय नहीं माना जाएगा.
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी महिला द्वारा अकेले इस्तेमाल किए जा रहे ऐसे घर को केवल इस आधार पर वेश्यागृह नहीं ठहराया जा सकता कि वह वहां से अपनी जीविका अर्जित कर रही है. यह व्याख्या आईटीपीए की कानूनी सीमाओं और उसके वास्तविक उद्देश्य को स्पष्ट करती है.



