सुप्रीम कोर्ट की फटकार बेअसर? विजय शाह को बीजेपी ने बनाया गणतंत्र दिवस का चीफ गेस्ट

कोर्ट ने साफ कहा कि आपकी भाषा राष्ट्रीय शर्मिंदगी का विषय है। लेकिन दूसरी तरफ वो बीजेपी है, जो खुद को राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा झंडाबरदार कहती है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: एक तरफ देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट है, जिसने मंत्री विजय शाह को उनकी घटिया टिप्पणी के लिए बुरी तरह फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि आपकी भाषा राष्ट्रीय शर्मिंदगी का विषय है। लेकिन दूसरी तरफ वो बीजेपी है, जो खुद को राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा झंडाबरदार कहती है।

उसी बीजेपी ने बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए विजय शाह को 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस पर रतलाम में चीफ गेस्ट बना दिया है। बीजेपी सरकार एक ओर जहाँ एक फौजी बेटी के अपमान पर कार्रवाई करने के बजाय, उस अपमान करने वाले को राष्ट्रीय सम्मान की वीआईपी कुर्सी दी जा रही है। ये खेल कैसे शुरू हुआ और बीजेपी आखिर विजय शाह को बचाने के लिए कानून के साथ खिलवाड़ क्यों कर रही है?

पहले ये जान लीजिए कि आखिर मामला क्या था। पिछले साल जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे, तब पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा था। उस ऑपरेशन की ब्रीफिंग में भारतीय सेना की बहादुर अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी भी शामिल थीं। लेकिन मध्य प्रदेश के आदिवासी कल्याण मंत्री विजय शाह को उनकी बहादुरी नहीं, बल्कि उनका मजहब नजर आया।

विजय शाह ने एक सार्वजनिक सभा में कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकवादियों की बहन तक कह डाला। उन्होंने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे सुनकर किसी भी देशभक्त का खून खौल जाए। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस पर खुद संज्ञान लिया और विजय शाह के बयानों को गटर की भाषा करार दिया। हाईकोर्ट ने तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, लेकिन क्या बीजेपी ने उन पर कोई कार्रवाई की? बिल्कुल नहीं!

हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक यानि कि को निर्देश दिया कि मंत्री के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता बीएनएस की धाराओं 152, 196, 197 के तहत तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए। हालांकि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार नहीं चेती। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश पर एफआईआर तो दर्ज कर लिया लेकिन जब इसको हाईकोर्ट में सम्मिट किया तो एफआईआर की तहरीर पढकर ही हाईकोर्ट के जस्टिस बुरी तरह से भड़क उठे, उन्होंने न सिर्फ डीजीपी को फटकार लगाई बल्कि पूरे मामले की तहरीर को दुरुस्त कर लाने को कहा है। हालांकि एफआईआर के बाद जांच के नाम पर लगातार मध्य प्रदेश की बीजपी सरकार लगातार संरक्षण देती रही है और ना तो विजय शाह को मंत्री पद से हटाया गया न मंत्री जी पर कोई कड़ी कार्रवाई की गई। हालांकि इस दौरान सरकार ने वीडियो की ऐडिटिंग मामले को काफी दिनों को कोर्ट में लटकाए रखा और ये मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया लेकिन सरकार की ओर से कोई कार्रवाई न की है।

सोचिए अगर सेना के बारे में अब तक किसी ने ऐसा कहा होता तो उसका ये बीजेपी वाले क्या करते। राहुल गांधी की सेना वाली टिप्पणी तो आपको याद ही होगी कैसे पूरी बीजेपी और अदालत इसमें राहुल को देशद्रोही बताने पर लगी है जबकि विजय शाह और राहुल गांधी दोनों का मामला एक बयान का है। राहुल गांधी के अपेक्षा विजय शाह का बयान ज्यादा खतरनाक और बेहूदा है लेकिन विजय शाह मंत्री बने बैठे हैं और राहुल गांधी को कोर्ट में सुनवाई हो रही है और बीजेपी की मोहन सरकार विजय शाह को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है

जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो उम्मीद थी कि शायद अब विजय शाह को सजा मिलेगी। लेकिन बीजेपी की सरकार ने क्या किया? उन्होंने महीनों तक एसआईटी की रिपोर्ट पर कुंडली मारकर बैठे रहना चुना। 19 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्याकांत ने मध्य प्रदेश सरकार को जमकर फटकारा। कोर्ट ने पूछा कि आप अगस्त 2025 से रिपोर्ट दबाकर क्यों बैठे हैं? क्या आप कोर्ट के सब्र का इम्तिहान ले रहे हैं? कोर्ट ने विजय शाह की माफी को मगरमच्छ के आंसू बताया और साफ कह दिया कि अब माफी के लिए बहुत देर हो चुकी है। कोर्ट ने सरकार को 2 हफ्ते का अल्टीमेटम दिया कि मंत्री पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दी जाए। लेकिन बीजेपी का साफ्ट कार्नर देखिए कि सुप्रीम कोर्ट की इस डांट के महज 4 दिन बाद ही सरकार ने विजय शाह को गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि घोषित कर दिया।

पिछले दिनों मोहन सरकार गणतंत्र के लिए विभिन्न जिलों के लिए चीफ जस्टिस का नाम जारी किया है इसमें रतलाम जिले में गणतंत्र दिवस की परेड और झंडारोहण के लिए विजय शाह को चीफ गेस्ट बनाया गया है।जैसे ही ये ये लिस्ट वायरल हुई हैं, हडकंप मच गया हैं। एक ओर जहां कांग्रेस ने सवाल उठाया है तो वहीं दूसरी ओर ये लिस्ट बीजेपी के लिए जी का जंजाल बन गई है। दावा किया जा रहा है है कि ये सीधे-सीधे न्यायपालिका को चुनौती है। ये चुनौती है उस सेना को, जिसके नाम पर ये पार्टियां वोट मांगती हैं। क्या बीजेपी के पास कोई दूसरा नेता नहीं था? क्या रतलाम में झंडा फहराने के लिए उसी शख्स को चुनना जरूरी था जिस पर देश की बेटी को अपमानित करने का केस चल रहा है?

अजीब विडंबना है! जब मुंब्रा में एआईएमआईएम की पार्षद सहर शेख हरा रंग की बात करती हैं, तो बीजेपी का पूरा तंत्र उन्हें विभाजनकारी और राष्ट्रद्रोही घोषित करने के लिए सड़कों पर उतर आता है। सहर शेख के खिलाफ पुलिस नोटिस जारी होते हैं, किरीट सोमैया शिकायत दर्ज कराते हैं और ये सही भी है, किसी भी गलत बयान पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि जब यही विभाजनकारी और अपमानजनक भाषा बीजेपी का अपना मंत्री बोलता है, तो वही किरीट सोमैया और बीजेपी के बड़े नेता चुप्पी क्यों साध लेते हैं? क्या सहर शेख का बयान गलत है और विजय शाह का गटर जैसा बयान राष्ट्रवाद है? बीजेपी का ये दोहरा चेहरा आज देश के सामने बेनकाब हो चुका है। एक तरफ आप महिलाओं के सम्मान की बात करते हैं और दूसरी तरफ एक महिला आर्मी ऑफिसर को नीचा दिखाने वाले को तिरंगे के नीचे सलामी दिलवाते हैं।

अब सवाल उठता है कि आखिर विजय शाह में ऐसी क्या खासियत है कि पूरी पार्टी और मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार उनके लिए ढाल बनी खड़ी है? इसके पीछे है वोट बैंक की गंदी राजनीति। विजय शाह एक कद्दावर आदिवासी नेता माने जाते हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी वोट बैंक किसी भी सरकार को बनाने या गिराने की ताकत रखता है। बीजेपी को डर है कि अगर उन्होंने विजय शाह को पद से हटाया या उन पर कड़ा एक्शन लिया, तो उनके आदिवासी वोट बैंक में सेंध लग सकती है। इसीलिए, नैतिकता को ताक पर रखकर, सेना के सम्मान की बलि देकर और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का खतरा मोल लेकर भी बीजेपी विजय शाह को प्रोटेक्ट कर रही है। कांग्रेस ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। राज्यसभा सांसद रेणुका चौधरी ने सोशल मीडिया पर सीधा सवाल पूछा है क्या यही बीजेपी का राष्ट्रवाद है? जो व्यक्ति महिलाओं का अपमान करे, उसे 26 जनवरी के मंच पर बुलाना क्या संविधान का अपमान नहीं है?

खेल साफ है। सत्ता का नशा इतना ज्यादा है कि अब उन्हें न तो अदालत की परवाह है और न ही वर्दी की मर्यादा की। बीजेपी जिस राष्ट्रवाद का ढोल पीटती है, उसकी पोल विजय शाह जैसे मंत्रियों ने खोल दी है। गणतंत्र दिवस पर रतलाम की जनता देखेगी कि कैसे एक दागी मंत्री, जिस पर खुद सुप्रीम कोर्ट मुकदमा चलाने की तैयारी में है, वो संविधान की कसमें खाएगा। बीजेपी कह रही है कि वे मुख्यमंत्री मोहन यादव के विदेश दौरे से लौटने का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन क्या इंसाफ के लिए मुख्यमंत्री के लौटने का इंतजार करना जरूरी है? क्या सेना की गरिमा से बड़ा कोई विदेश दौरा हो सकता है?

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