NCLT सुधार पर सुप्रीम कोर्ट का रुख, कहा- नियुक्ति प्रक्रिया जारी है
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) की समस्या पर स्वत: संज्ञान लिया था.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) की समस्या पर स्वत: संज्ञान लिया था.
उस समय ये समस्या ये थी कि NCLT में काफी समय से न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो रही थी. ट्रिब्यूनल में बुनियादी सुविधाएं भी बहुत खराब हैं. केस बहुत धीरे निपट रहे हैं. अब सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई स्थगित कर दी.
सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में सदस्यों की नियुक्ति में देरी और बुनियादी ढांचे से जुड़े मामले की सुनवाई यह कहते हुए स्थगित कर दी कि नियुक्ति प्रक्रिया फिलहाल जारी है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने एनसीएलटी में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति में देरी तथा उसके बुनियादी ढांचे की कमियों से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई सोमवार को स्थगित कर दी.
सुनवाई के दौरान एक अधिवक्ता ने पीठ का ध्यान इस ओर दिलाया कि स्वत: संज्ञान की कार्यवाही केवल एनसीएलटी में रिक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अपर्याप्त बुनियादी ढांचे तथा न्यायाधिकरण में मामलों के निपटान की दर से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं.
19 मई को दर्ज की गई थी कार्यवाही
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, मेरे साथियों (दूसरी पीठ के न्यायाधीशों) ने सही मुद्दा उठाया है. यह चिंता का गंभीर विषय है. राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की नियुक्ति तथा अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और उससे जुड़े अन्य मुद्दे शीर्षक से स्वत: संज्ञान की यह कार्यवाही 19 मई को दर्ज की गई थी.
यह कार्रवाई 29 अप्रैल को एवीजे हाइट्स अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन बनाम आईआईएफएल फाइनेंस लिमिटेड मामले में हाई कोर्ट के फैसले के बाद शुरू हुई.
उस फैसले में जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत समाधान योजनाओं को मंजूरी देने में लगातार हो रही देरी पर गंभीर चिंता जाहिर की थी. पीठ ने इसे गंभीर स्थिति बताते हुए स्वत: संज्ञान लिया और उचित निर्देशों के लिए मामले को प्रधान न्यायाधीश के पास भेज दिया, जिसके बाद वर्तमान कार्यवाही दर्ज की गई.
क्या पड़ता है प्रभाव?
इस 29 अप्रैल के फैसले में कहा गया था कि समाधान योजनाओं को मंजूरी देने से संबंधित 383 आवेदन एनसीएलटी के समक्ष लंबित थे. इनमें देरी 48 दिन से लेकर 738 दिन तक थी और कुछ मामलों में यह लगभग चार साल तक पहुंच गई थी.
पीठ ने कहा था कि इतनी देरी आईबीसी के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है, क्योंकि इससे समयबद्ध दिवाला समाधान सुनिश्चित करने, परिसंपत्तियों के मूल्य को बनाए रखने और आर्थिक दक्षता को बढ़ावा देने का उद्देश्य प्रभावित होता है.



