टेस्टिंग में ही धड़ाम हुई 21 करोड़ की टंकी, गुजरात में भ्रष्टाचार की पोल!
भाजपा राज में जो हो जाए वही कम है। मोदी का गढ़ कहा जाने वाला गुजरात आज भ्रष्टाचार की जद में इस कदर जकड़ा हुआ है जिसकी कोई हद नहीं है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भाजपा राज में जो हो जाए वही कम है। मोदी का गढ़ कहा जाने वाला गुजरात आज भ्रष्टाचार की जद में इस कदर जकड़ा हुआ है जिसकी कोई हद नहीं है। यूँ तो कहने को कागजों में विकास दिखाया जाता है लेकिन हकीकत क्या है ये बात किसी से छुपी नहीं है। ऐसी ही एक घटना इन दिनों सुर्ख़ियों में बनी हुई है।
यह घटना गुजरात के सूरत जिले में हुई है, जहां एक पानी की टंकी, जो 21 करोड़ रुपये की लागत से बनी थी, उद्घाटन से पहले ही टेस्टिंग के दौरान ढह गई। सूरत शहर गुजरात राज्य में स्थित है, जो हीरों की नगरी के नाम से मशहूर है। लेकिन हाल ही में यहां एक दुखद घटना घटी है, जो जनता के पैसे की बर्बादी और निर्माण कार्य में लापरवाही को उजागर करती है। बीते 19 जनवरी सूरत जिले के ताड़केश्वर गांव में एक पानी की टंकी टेस्टिंग के दौरान ही धराशायी हो गई। इस टंकी की लागत 21 करोड़ रुपये थी, जो जनता के टैक्स से इकट्ठा किया गया पैसा था।
टंकी को ‘गाय पगला ग्रुप वॉटर सप्लाई स्कीम’ के तहत बनाया गया था, जिसका मकसद आसपास के 33 गांवों को साफ पीने का पानी पहुंचाना था। लेकिन उद्घाटन से पहले ही यह टंकी गिर गई, जिससे लोगों में गुस्सा और निराशा फैल गई। यह घटना दिखाती है कि कैसे सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार और घटिया सामग्री का इस्तेमाल आम लोगों की मेहनत की कमाई को पानी में बहा देता है।
इस टंकी का निर्माण पिछले तीन साल से चल रहा था। यह 15 मीटर ऊंची थी और इसमें 11 लाख लीटर पानी स्टोर करने की क्षमता थी। योजना के तहत टंकी से पानी की पाइपलाइन बिछाई गई थी, ताकि दूर-दराज के गांवों तक पानी पहुंच सके। सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए 21 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, जिसमें टंकी के अलावा एक तालाब भी बनाया जाना था। लेकिन टंकी बनने के ठीक बाद ही इसकी दीवारों से पपड़ी छूटने लगी थी, जो सीमेंट की खराब क्वालिटी को दर्शाती थी। गांव वाले पहले ही शिकायत कर चुके थे कि निर्माण में लोहे और सीमेंट का सही इस्तेमाल नहीं किया गया है। फिर भी अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया। 19 जनवरी को जब टेस्टिंग के लिए टंकी में पानी भरा जाने लगा, तो करीब 9 लाख लीटर पानी डालने के बाद अचानक पूरी संरचना भरभराकर गिर गई। यह दृश्य इतना भयानक था कि आसपास के लोग दौड़कर आए, लेकिन गनीमत है कि बड़ा हादसा टल गया।
सामने आई जानकारी के मुताबिक घटना के समय टंकी के नीचे कुछ मजदूर काम कर रहे थे। हादसे में एक महिला समेत तीन मजदूर घायल हो गए, लेकिन किसी की जान नहीं गई। घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया और उनका इलाज चल रहा है। गांव वालों का कहना है कि अगर उद्घाटन के बाद टंकी गिरती और पानी भरा होता, तो आसपास के घरों और लोगों को बड़ा नुकसान हो सकता था। यह टंकी गिरने से न केवल 21 करोड़ रुपये बर्बाद हुए, बल्कि गांवों की पानी की समस्या भी जस की तस बनी रही। लोग अब पूछ रहे हैं कि इतने पैसे से कितने कुएं या हैंडपंप बन सकते थे, लेकिन सरकारी लापरवाही ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। टंकी के मलबे से निकली सामग्री को देखकर साफ पता चलता है कि निर्माण में घटिया माल इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि सीमेंट की परतें आसानी से उखड़ रही थीं।
यह घटना भ्रष्टाचार की एक बड़ी मिसाल है। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार ने पैसे बचाने के लिए कम सीमेंट और लोहे का इस्तेमाल किया, जिससे टंकी की नींव कमजोर हो गई। बनने के बाद ही पपड़ी छूटने लगी थी, जो निर्माण की खराबी का पहला संकेत था। लेकिन अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज कर दिया। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग ठीक से हुई? क्या सामग्री की जांच की गई? यह ‘हर घर जल’ जैसी योजनाओं में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करता है। जनता के टैक्स का पैसा पानी में बह गया, जबकि गांव वाले अभी भी पानी के लिए तरस रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग इसे ‘गुजरात मॉडल’ का मजाक उड़ा रहे हैं, कहते हैं कि विकास के नाम पर लूट हो रही है।
वहीं घटना के बाद सूरत प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई की। डिप्टी एग्जीक्यूटिव इंजीनियर और एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को सस्पेंड कर दिया गया। ठेकेदार की सभी पेमेंट रोक दी गईं। प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट और अन्य एजेंसियों को नोटिस भेजे गए। पुलिस में शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। जांच के लिए SVNIT यानी सूरत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के इंजीनियरों की टीम बनाई गई है, जो टेक्निकल रिपोर्ट देगी। इसके अलावा, GERI और विजिलेंस विभाग के अधिकारी सैंपल इकट्ठा कर रहे हैं, ताकि सामग्री की क्वालिटी जांच हो सके।
ऐसे में यह घटना राजनीतिक रूप से भी गरमा गई है। कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर कहा कि कांग्रेस के समय की 70 साल पुरानी टंकी को तोड़ने के लिए JCB लगानी पड़ी, जबकि बीजेपी की नई टंकी उद्घाटन से पहले ही गिर गई। कांग्रेस ने इसे ‘कांग्रेस मॉडल बनाम बीजेपी मॉडल’ बताया और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। गुजरात में बीजेपी की सरकार है, और यह घटना केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल के इलाके में हुई है, जिससे विपक्ष को हमला करने का मौका मिल गया। बीजेपी की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सोशल मीडिया पर समर्थक इसे अलग-अलग तरीके से देख रहे हैं। कुछ कहते हैं कि जांच होनी चाहिए, जबकि कुछ इसे सामान्य हादसा मान रहे हैं।
सोशल मीडिया पर इस घटना की खूब चर्चा हो रही है। एक्स पर हजारों पोस्ट आए हैं, जहां लोग भ्रष्टाचार पर गुस्सा जता रहे हैं। एक यूजर ने लिखा कि ’21 करोड़ की टंकी 21 मिनट भी नहीं चली’, जबकि दूसरे ने कहा कि ‘इग्नोर करो, ये सब चलता रहता है’। कई लोगों ने गुजरात मॉडल का मजाक उड़ाया, कहते हैं कि विकास के नाम पर लूट हो रही है। युवा कांग्रेस के नेता उदय भानु चिब ने कहा कि यह टंकी नहीं, बीजेपी के भ्रष्ट विकास की पोल है। कुछ पोस्ट में वीडियो शेयर किए गए हैं, जहां टंकी गिरने का दृश्य दिख रहा है। जनता मांग कर रही है कि ठेकेदार और अधिकारियों पर कड़ी सजा हो, ताकि आगे ऐसी घटनाएं न हों।
यह घटना सिर्फ एक टंकी गिरने की नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल उठाती है। भारत में सरकारी प्रोजेक्ट्स में अक्सर ऐसी लापरवाही देखी जाती है, जहां पैसे की बंदरबांट होती है और क्वालिटी से समझौता किया जाता है। जनता के टैक्स का पैसा विकास के नाम पर बर्बाद हो जाता है, जबकि जरूरतमंद लोग सुविधाओं से वंचित रहते हैं। इस मामले से सबक लेना चाहिए कि निर्माण कार्य की सख्त मॉनिटरिंग हो, सामग्री की जांच हो और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस हो। अगर जांच सही से हुई और दोषियों को सजा मिली, तो ही जनता का भरोसा लौटेगा। अन्यथा, ऐसी घटनाएं जारी रहेंगी और जनता की मेहनत पानी में बहती रहेगी।
इतना ही नहीं इस टंकी गिरने से 33 गांवों की पानी की योजना रुक गई है। लोग अब वैकल्पिक तरीकों से पानी मंगवा रहे हैं, जो महंगा और मुश्किल है। ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी पहले से समस्या है, और ऐसी योजनाएं उम्मीद जगाती हैं। लेकिन जब ये असफल हो जाती हैं, तो निराशा बढ़ती है। सरकार को अब नई योजना बनानी होगी, जो और पैसे मांगेगी। इससे टैक्सपेयर्स पर बोझ बढ़ेगा। साथ ही, निर्माण क्षेत्र में विश्वास कम होगा, और ठेकेदारों पर सख्ती बढ़ेगी। यह घटना अन्य राज्यों के लिए भी चेतावनी है कि जल आपूर्ति योजनाओं में पारदर्शिता जरूरी है।
21 करोड़ रुपये कोई छोटी रकम नहीं है, इससे कितने स्कूल, अस्पताल या सड़कें बन सकती थीं। लेकिन लापरवाही ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। उम्मीद है कि जांच से सच्चाई सामने आएगी और दोषियों को सजा मिलेगी। जनता को जागरूक रहना चाहिए। मगर अफ़सोस की बात ये है कि सरकार चुप्पी साधे हुए है। अब हालांकि ये कोई पहली घटना नहीं है जब ऐसे जनता के पैसों की बर्बादी हुई हो। सवाल ये बनता है आखिर कब तक जनता के पैसों की बर्बादी होती रहेगी और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी।



