ड्रैगन ने चल दी चाल अब क्या करेगा भारत

  • सीपीईसी पर चीन की दादागीरी, इलाका हमारा, कश्मीर पर वही पुराना झूठ
  • पूर्व से चीन दबाव बना रहा है दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में हालात अस्थिर हो रहे हैं
  • ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापार करने पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैक्स लगाने की बात कही

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। ड्रैगन ने एक बार फिर चाल चल दी है। इस बार न लद्दाख की बर्फ में न अरुणाचल की पहाडिय़ों में बल्कि आर्थिक गलियारे सीपीईसी की शक्ल में एक ऐसा सैनिक रास्ता जो भारत की संप्रभुता के दिल से होकर गुजरता है। सीपीईसी को लेकर चीन के ताजा बयान को महज कूटनीतिक सफाई नहीं बल्कि सीधा शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है।
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने बयान जारी किया है कि इलाका हमारा है कश्मीर पर हमारा रुख बदला नहीं है। बयान को भारतीय विदेश मंत्रालय ने सिरे से खारिज कर दिया है। लेकिन चीन के इस बयान की टाइमिंग पर सवाल उठना शुरू हो गये हैं। साफ शब्दों में कहा जाए तो बीजिंग ने भारत को यह बता दिया है कि वह न तो उसकी आपत्तियों को मानता है और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या में भारत को कोई अहमियत देता है। सीपीईसी के बहाने चीन अब उस इलाके में बुनियादी ढांचा खड़ा कर रहा है जिसे भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। और यही वह बिंदु है जहां यह परियोजना सड़क नहीं बल्कि रणनीतिक घेराबंदी बन जाती है।

घिसा-पिटा झूठ बोल रहा है चीन

चीन का यह दावा कि सीपीईसी महज आर्थिक विकास की परियोजना है अब एक घिसा-पिटा झूठ बन चुका है। जिस गलियारे में सुरंगें हैं, एयरस्ट्रिप हैं, फाइबर नेटवर्क हैं और ग्वादर जैसे गहरे समुद्री बंदरगाह हैं वह किसी व्यापारिक सपने से ज्यादा सैन्य रीढ़ लगता है। भारत यह जानता है अमेरिका यह जानता है और चीन भी यह जानता है। बस सार्वजनिक मंच पर मानने से इनकार कर रहा है। समस्या यहीं खत्म नहीं होती। इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका ने ईरान पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कहकर पश्चिम एशिया में नई आग सुलगा दी है। इसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा व्यापार मार्गों और कूटनीतिक संतुलन पर सीधा पड़ेगा। यानी एक तरफ़ चीन पूर्व से दबाव बना रहा है दूसरी तरफ़ पश्चिम एशिया में हालात अस्थिर हो रहे हैं।

आर्थिक गलियारा या सैनिक जाल?

यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा सीपीईसी कागजों में भले ही व्यापार और विकास का सपना हो लेकिन जमीनी हकीकत में यह चीन की सबसे आक्रामक भू रणनीतिक परियोजना है। यह गलियारा शिनजियांग से लेकर ग्वादर तक फैला है और बीच में पड़ता है पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और शक्सगाम घाटी जिस पर भारत का वैध दावा है। भारत की आपत्ति बिल्कुल साफ है कि पाकिस्तान को इस इलाके में किसी भी तीसरे देश को परियोजना देने का अधिकार नहीं है। लेकिन चीन इस आपत्ति को सुनने के बजाय हर बार यह कह कर कि यह आर्थिक परियोजना है राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। अपना पुराना राग अलापता है। यह वही चीन है जो दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाकर उन्हें सैन्य ठिकानों में बदल चुका है। ऐसे में सीपीईसी को लेकर उसके इरादों पर शक होना स्वाभाविक है। ग्वादर बंदरगाह सीपीईसी की जान है। यह बंदरगाह न सिर्फ चीन को अरब सागर तक सीधी पहुंच देता है बल्कि भारतीय नौसेना की गतिविधियों पर नजर रखने का ठिकाना भी बन सकता है। सड़कें और रेल लाइनें जिनका प्रचार व्यापार के नाम पर किया जा रहा है असल में तेज सैन्य मूवमेंट के लिए तैयार की जा रही हैं।

भारत का जवाब रणनीति से

भारत ने इस चुनौती का जवाब बयानबाजी से नहीं बल्कि रणनीति से दिया है। चाबहार बंदरगाह, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर, इंडो-पैसिफिक में सक्रिय भूमिका यह सभी कदम चीन केसीपीईसी मॉडल का संतुलन बनाने की कोशिश हैं। भारत जानता है कि सीधे टकराव से युद्ध का खतरा है और कूटनीति में धैर्य सबसे बड़ा हथियार।

बंग्लादेश में असंतोष

दक्षिण एशिया का नक्शा भी भारत के पक्ष में शांत नहीं है। बांग्लादेश में असंतोष की आंच है पाकिस्तान आर्थिक रूप से चरमरा रहा है लेकिन सैन्य दुस्साहस से बाज नहीं आ रहा। नेपाल और श्रीलंका जैसे देश चीन की कर्ज कूटनीति में उलझ चुके हैं। और इन सबके बीच भारत जो युद्ध नहीं चाहता है रणनीतिक संतुलन की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। सीपीईसी पर चीन का बयान इस बात का संकेत है कि बीजिंग अब पर्दे के पीछे का खेल छोड़ चुका है। यह अब खुली चुनौती है भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता उसकी विदेश नीति और उसकी उभरती वैश्विक भूमिका के लिए।

ट्रंप की फिर चेतावनी खराब होंगे हालात

अमेरिका के राष्टपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि जो देश ईरान के साथ कारोबार करेंगे उन पर अमेरिका के साथ व्यापार करने पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा। भारत के लिए इसका मतलब यह है कि अमेरिका को निर्यात होने वाले भारतीय उत्पादों पर कुल मिलाकर 75 प्रतिशत तक शुल्क लग सकता है। इससे भारतीय कारोबारियों और उद्योगों पर बुरा असर पडऩे की आशंका है।

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