डर गयी सरकार, सवालों से सत्ता में घबराहट

- 170 दिनों बाद जेल से रिहा होंगे सोनम वांगचुक
- सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी रद्द करने का गृह मंत्रालय का फैसला
- मंत्रालय ने हटाया राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी सरकार को लताड़
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। इतिहास गवाह है कि जब भी सत्ता सवालों से घबराती है तो सबसे पहले आवाज़ों को कैद करने की कोशिश करती है। कभी किताबें प्रतिबंधित होती हैं कभी आंदोलनकारियों को देशद्रोही कहा जाता है और कभी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे भारी भरकम कानूनों के पीछे असहमति की आवाजों को बंद कर दिया जाता है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि सच को ज्यादा दिनों तक कैद नहीं रखा जा सकता। जनता का दबाव और सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के बाद गृह मंत्रालाय ने समाजिक और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक पर लगे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम को वापस लेकर उनकी रिहाई का रास्ता साफ कर दिया है। करीब 170 दिनों की हिरासत के बाद केंद्र सरकार ने अचानक उनकी गिरफ्तारी रद्द करने का फैसला किया है। यह वही कानून है जिसे आमतौर पर देश की सुरक्षा के लिए बेहद गंभीर मामलों में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक पर्यावरण कार्यकर्ता की आवाज़ इतनी खतरनाक थी कि उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में डालना पड़ा? दरअसल वांगचुक को पिछले साल लद्दाख में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद हिरासत में लिया गया था। आरोप लगाया गया कि उनके आंदोलन से कानून व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उन्हें हिरासत में लेकर राजस्थान की जोधपुर जेल में रखा गया। उस समय सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम बताया था। लेकिन अब अचानक वही सरकार पीछे हटती दिखाई दे रही है। बयान में कहा गया कि लद्दाख में शांति और संवाद का माहौल बनाने के लिए यह निर्णय लिया गया है।
फैसला राजनीतिक और न्यायिक दबाव का परिणाम
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक और न्यायिक दबाव का परिणाम भी हो सकता है। क्योंकि जिस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा बताकर पेश किया गया था वही मामला अब संवाद और शांति की भाषा में बदल गया है। यही वह विरोधाभास है जिसने पूरे प्रकरण को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। अगर वांगचुक की गतिविधियां वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा थीं तो फिर अचानक उनका खतरा कैसे खत्म हो गया? और अगर खतरा नहीं था तो फिर इतने महीनों तक उन्हें जेल में क्यों रखा गया? इन सवालों के जवाब अभी भी हवा में तैर रहे हैं। लेकिन इतना तय है कि 170 दिनों के बाद जेल से निकलने वाले सोनम वांगचुक अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक प्रतीक बन चुके हैं एक ऐसी आवाज का प्रतीक जिसे दबाने की कोशिश हुई लेकिन जिसे पूरी तरह चुप नहीं कराया जा सका।
यह घटना भविष्य के लिए कोई सबक बनेगी?
लोकतंत्र में सत्ता की ताकत का असली परीक्षण इसी बात से होती है कि वह असहमति को कैसे संभालती है। अगर हर असहज आवाज को खतरा मानकर जेल में डाल दिया जाए तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है। सोनम वांगचुक की रिहाई शायद यही याद दिलाती है कि विचारों को कैद करने की कोशिशें इतिहास में कभी ज्यादा देर तक सफल नहीं हुईं। और यही कारण है कि 170 दिनों के बाद जेल से निकलने वाले यह पर्यावरणविद अब केवल एक कार्यकर्ता नहीं बल्कि एक प्रतीक बन चुके हैं। एक ऐसी आवाज़ का प्रतीक जिसे दबाने की कोशिश हुई लेकिन जिसे आखिरकार फिर बोलने का मौका मिल गया।
अब क्या बदलेगा आंदोलन राजनीति और संदेश
सोनम वांगचुक की रिहाई केवल एक व्यक्ति की आजादी की कहानी नहीं है। यह उस बहस का हिस्सा बन गई है जिसमें सवाल उठता है कि लोकतंत्र में असहमति की आवाजों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का सबसे बड़ा असर यह होगा कि सरकारें अब ऐसे मामलों में अधिक सावधानी बरतने को मजबूर होंगी। जब किसी सामाजिक कार्यकर्ता पर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर कानून लगाए जाते हैं तो उसका असर केवल एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक माहौल पर पड़ता है। वांगचुक की रिहाई के बाद लद्दाख में चल रहे आंदोलनों को भी नई ऊर्जा मिलने की संभावना है। उनके समर्थकों का कहना है कि यह केवल शुरुआत है और अब क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को और मजबूती से उठाया जाएगा। राजनीतिक स्तर पर भी यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रहने वाला है। विपक्ष पहले ही इसे सरकार की बड़ी गलती बताने लगा है और कह रहा है कि अगर शुरुआत से ही संवाद का रास्ता अपनाया जाता तो इतनी बड़ी विवाद की स्थिति ही पैदा नहीं होती।
फजीहत हो रही थी सरकार की
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर मामला अदालत में लंबा चलता और सुप्रीम कोर्ट सीधे हिरासत को अवैध घोषित कर देता तो यह सरकार के लिए बड़ी फजीहत बन सकता था। इसलिए उससे पहले ही कदम पीछे खींच लिया गया। यानी सरकार ने वह रास्ता चुना जिसमें नुकसान कम से कम हो। फैसले को संवाद और शांति के नाम पर पेश किया गया लेकिन आलोचकों का कहना है कि असली वजह न्यायिक और राजनीतिक दबाव ही था।
सरकार ने अचानक क्यों बदला फैसला?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकार ने अचानक यह फैसला क्यों लिया। जिन आरोपों के आधार पर वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था वही आरोप अब अचानक कमजोर कैसे पड़ गए? सूत्रों और कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक इस फैसले के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण न्यायिक दबाव माना जा रहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट आफ इंडिया तक पहुंच चुका था और अदालत ने सरकार से कड़े सवाल पूछने शुरू कर दिए थे। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मामला आगे बढ़ता तो अदालत सरकार से यह पूछ सकती थी कि आखिर एक पर्यावरण कार्यकर्ता को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में रखने के ठोस सबूत क्या हैं। दूसरा कारण सबूतों की कमजोरी भी माना जा रहा है। कई बार प्रशासनिक स्तर पर बड़े कानूनों का इस्तेमाल तो कर लिया जाता है लेकिन अदालत में उन्हें साबित करना मुश्किल हो जाता है। अगर ऐसा होता तो अदालत सीधे हिरासत को रद्द कर सकती थी जिससे सरकार को भारी आलोचना का सामना करना पड़ता। तीसरा कारण अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बताया जा रहा है। सोनम वांगचुक केवल भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी जाने पहचाने पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। जलवायु परिवर्तन और हिमालयी पारिस्थितिकी पर उनके काम को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहा गया है। ऐसे में उनकी लंबी हिरासत को लेकर विदेशों में भी सवाल उठने लगे थे।




