मराठा आरक्षण पर फिर गरमाया मुद्दा, जरांगे ने बढ़ाई फडणवीस सरकार की मुश्किलें

जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में मराठा समाज के नेता मनोज जरांगे पाटील पिछले कई दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं। यह अनशन अब आठवें दिन में पहुंच चुका है और स्थिति और गंभीर हो गई है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र में एक बार फिर सियासी पारा सातवें आसमान पर है। दरअसल इन दिनों मराठा आरक्षण को लेकर मांग तेज हो गई है। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर एक बार फिर बड़ा आंदोलन छिड़ गया है।

जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में मराठा समाज के नेता मनोज जरांगे पाटील पिछले कई दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं। यह अनशन अब आठवें दिन में पहुंच चुका है और स्थिति और गंभीर हो गई है।

जरांगे ने अब पानी और सलाइन लेना भी बंद कर दिया है। डॉक्टरों की सलाह और इलाज को भी उन्होंने ठुकरा दिया है। उनका साफ कहना है कि जब तक सरकार उनकी मांगें जमीन पर लागू नहीं करती, तब तक वे कुछ भी नहीं लेंगे।

इस घटनाक्रम ने सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत को एक तरह से फिर से शुरू कर दिया है। कुछ दिन पहले ही जारांगे ने मंत्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल के इस आश्वासन पर पानी और सलाइन लेने पर सहमति जताई थी कि कुछ मुख्य मांगों पर दो दिनों के भीतर कार्रवाई की जाएगी।

बिना किसी ठोस फैसले के वह समय-सीमा बीत जाने के बाद, जारांगे ने अपना रुख कड़ा कर लिया और अपनी जांच करने आई मेडिकल टीम को वापस लौटा दिया। मनोज जारांगे ने कहा कि जब तक सरकार वास्तव में हमारी सभी मांगों को लागू नहीं करती, तब तक मैं कुछ भी नहीं लूंगा और न ही इलाज कराऊंगा।

मनोज जरांगे के पानी, सलाइन और इलाज लेने से इनकार करने और उनके मुंबई मार्च की समय-सीमा पास आने के कारण, यह गतिरोध एक बार फिर वहीं पहुंच गया है जहां से शुरू हुआ था।

इससे पहले हफ्ते की शुरुआत में, जरांगे राज्य सरकार के एक प्रतिनिधिमंडल की अपील के बाद पानी पीने और नसों के जरिए तर‍ल लेने के लिए सहमत हो गए थे, लेकिन अब उन्होंने अपनी सहमति वापस ले ली है। उन्होंने यहां अंतरवाली सराटी में विरोध स्थल पर डॉक्टरों से चिकित्सा जांच कराने से इनकार कर दिया और कहा कि जब तक उनकी मांगें असल में पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वह कोई इलाज नहीं कराएंगे।

जरांगे ने हालांकि कहा है कि मांगें पूरी होने तक वह अपना आंदोलन वापस नहीं लेंगे। उन्होंने यह भी दोहराया है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह 12 सितंबर को मुंबई जाने के अपने फैसले पर कायम रहेंगे।

जरांगे ने मांग की है कि 12 सितंबर तक पात्र मराठों को कुनबी प्रमाण पत्र जारी करने को लेकर सरकार शासनादेश जारी करे। इससे समुदाय के सदस्यों को अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। जरांगे ने साफ ऐलान किया है कि अगर 12 सितंबर तक सरकार उनकी मांगें नहीं मानती, तो मुंबई की ओर कूच किया जाएगा।

12 सितंबर को अंतरवाली सराटी में बैठक होगी और मुंबई आंदोलन की अंतिम तारीख तथा रणनीति घोषित की जाएगी। उन्होंने समर्थकों को कहा है कि वे चुपचाप, बिना झंडे लगाए और बिना शोर मचाए मुंबई पहुंच जाएं। गाड़ियों पर झंडे न बांधें, ताकि पुलिस को पता न चले। मुंबई में अपने रिश्तेदारों या जानने वालों के घर ठहरें और सिग्नल मिलने पर सड़कों पर उतरें। यह एक तरह की गुरिल्ला रणनीति है, जिससे सरकार को अचानक दबाव महसूस हो।

बात की जाए जरांगे की मुख्य मांग क्या है? तो आपको बता दें कि सरकार के पास करीब 58 लाख कुणबी नोंदियां हैं। इन नोंदियों के आधार पर पात्र मराठा लोगों को कुणबी प्रमाणपत्र तुरंत जारी किए जाएं, ताकि वे ओबीसी कोटे में आरक्षण का लाभ ले सकें।

इसके अलावा जाति वैधता समितियों को खत्म करने, पुराने पुलिस मामलों को वापस लेने और हैदराबाद गजेटियर समेत अन्य दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र देने की मांग भी है। जरांगे कहते हैं कि सरकार ने कई बार आश्वासन दिए, जीआर निकाले, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ। लाखों युवा अभी भी इंतजार कर रहे हैं। नौकरियां, शिक्षा और भविष्य अटक गया है।

मौजूदा हालात को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि यह आंदोलन फडणवीस सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनके सहयोगी मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटील समेत कई नेताओं ने जरांगे से मुलाकात की, मसौदा भेजा, आश्वासन दिए। लेकिन जरांगे ने सब कुछ खारिज कर दिया।

उनका कहना है कि सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा। लिखित और ठोस शासन निर्णय चाहिए, जिसमें साफ हो कि 58 लाख नोंदियों पर प्रमाणपत्र कैसे और कब दिए जाएंगे। सरकार कहती है कि कानूनी और संवैधानिक सीमाओं में ही आरक्षण दिया जा सकता है। लेकिन जरांगे का आरोप है कि सरकार जानबूझकर देरी कर रही है और मराठा समाज के साथ अन्याय हो रहा है।

फडणवीस सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह मराठा समाज को सिर्फ वोट बैंक मानती है। चुनाव के समय वादे किए जाते हैं, बाद में भुला दिए जाते हैं। पिछले तीन साल में जरांगे ने ग्यारह बार अनशन किया है, दो बार मुंबई तक मार्च निकाला है।

2023 में अंतरवाली से शुरू हुआ आंदोलन पूरे राज्य में फैल गया था। 2025 में मुंबई के आजाद मैदान में भी अनशन हुआ था। हर बार सरकार कुछ रियायतें देती दिखती है, लेकिन मूल समस्या जस की तस रहती है। अब जरांगे कह रहे हैं कि यह अंतिम और निर्णायक आंदोलन है। एक भी मांग में पीछे नहीं हटेंगे। अगर मरना पड़े तो मर जाएंगे, लेकिन लाश भी मुंबई ले जाई जाएगी।

आंदोलन की तीव्रता बढ़ने का कारण साफ है। मराठा समाज महसूस कर रहा है कि उसके बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण नहीं मिल रहा, शिक्षा में जगह नहीं मिल रही।

कुणबी प्रमाणपत्र मिलने से ओबीसी कोटे में प्रवेश खुल सकता है। लेकिन प्रमाणपत्र मिलने की प्रक्रिया लंबी और जटिल है। जाति जांच समितियां बाधा बन रही हैं। जरांगे कहते हैं कि दूसरे राज्यों में ऐसी समितियां नहीं हैं, तो महाराष्ट्र में क्यों? सरकार को तुरंत इन्हें खत्म करना चाहिए।जालना में अंतरवाली सराटी अब मराठा आंदोलन का केंद्र बन गया है। आसपास के जिलों से लोग आ रहे हैं।

युवा, महिलाएं, बुजुर्ग सब मौजूद हैं। अनशन स्थल पर भीड़ बढ़ रही है। लोग नारे लगा रहे हैं, सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। जरांगे हर सुबह-शाम समर्थकों से बात करते हैं। वे कहते हैं कि मुंबई में एक-दो लाख मराठा घर हैं। वहां ठहरकर इंतजार करें। जब सिग्नल मिले, तब सड़कों पर आ जाएं। आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा, कोई हिंसा नहीं होगी, कोई जाड़पोळ नहीं। लेकिन दबाव इतना बढ़ेगा कि सरकार को झुकना पड़ेगा।

फडणवीस सरकार इस दबाव को महसूस कर रही है। मंत्री भेजकर मनाने की कोशिश हो रही है। लेकिन जरांगे अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि आश्वासन काफी नहीं। जमीन पर काम दिखना चाहिए। 12 सितंबर तक जीआर जारी हो, प्रमाणपत्र बंटने शुरू हों। नहीं तो मुंबई कूच तय है। पांच चरणों में आंदोलन होगा। ऐसे में अब ये अनुमान लगाया जा रहा है कि 40 से 45 लाख मोटरसाइकिलें मुंबई पहुंच सकती हैं। यह दावा भले अतिरंजित लगे, लेकिन पिछले आंदोलनों से साबित हो चुका है कि जरांगे समर्थक बड़ी संख्या में जुट सकते हैं।

यह आंदोलन सिर्फ आरक्षण का नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार का भी है। मराठा समाज सदियों से महाराष्ट्र की रीढ़ रहा है। खेती, सेना, प्रशासन हर क्षेत्र में योगदान दिया है। लेकिन बदलते समय में आरक्षण की जरूरत महसूस हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले मराठा आरक्षण रद्द किया था। अब कुणबी मार्ग से आरक्षण हासिल करने की कोशिश हो रही है। सरकार को कानूनी रास्ता निकालना चाहिए, न कि देरी की नीति अपनानी चाहिए।

फडणवीस सरकार पर आरोप है कि वह अन्य समुदायों को खुश रखने के लिए मराठा समाज की उपेक्षा कर रही है। ओबीसी समाज में भी आरक्षण को लेकर चिंता है कि कुणबी प्रमाणपत्र से उनका कोटा प्रभावित होगा। लेकिन जरांगे का कहना है कि पात्र मराठा ही प्रमाणपत्र लेंगे, अवैध तरीके से कोई नहीं। सरकार को पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

अनशन की वजह से जरांगे की सेहत बिगड़ रही है। पानी बंद करने के बाद स्थिति और नाजुक हो गई है। डॉक्टर चिंतित हैं, परिवार चिंतित है, समर्थक चिंतित हैं। लेकिन जरांगे का संकल्प अटल है। जरंगे का कहना है कि मराठा बच्चों के भविष्य के लिए यह कुर्बानी जरूरी है। अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो मुंबई में बड़ा आंदोलन होगा। शहर ठप पड़ सकता है, प्रशासन पर दबाव बढ़ेगा।

12 सितंबर करीब आ रहा है। सबकी नजरें जालना और मुंबई पर हैं। क्या सरकार समय रहते मांगें मान लेगी? या फिर एक और बड़ा आंदोलन मुंबई की सड़कों पर उतरेगा? जरांगे का कहना है कि अब कोई माघार नहीं। यह अंतिम लड़ाई है। फडणवीस सरकार को अब ठोस कदम उठाने होंगे, वरना मराठा समाज का गुस्सा पूरे राज्य में फैल सकता है।

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