दोस्ती की कीमत और डसते रिश्ते

  • अमेरिका का भारत को 500 परसेंट तक का टैरिफ अल्टीमेटम
  • दोस्ती की भाषा में दबाव अमेरिका ने दिया भारत को साफ संदेश
  • टैरिफ बम और भरोसे का ब्लैकआउट क्या अमेरिका भारत को वेनेजुएला बनाना चाहता है?
  • भारत झुकेगा या जवाब देगा? अमेरिकी टैरिफ और आत्मसम्मान की लड़ाई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। अमेरिकन प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 500 फीसदी तक का टैरिफ लगाने का इशारा कर दिया है। अमेरिकन संसद में पास किये गये बिल में इस बात का जिक्र है कि जो भी देश रूस से तेल आयात कर रहे हैं उनपर 500 परसेंट तक का टैरिफ लगाया जाए। ट्रंप लगातार इस बात का जिक्र अपनी मीडिया बाइट में कर रहे हैं कि वह भारत से इस मुद्दे पर खुश नहीं है। और उनके बयान के बाद इस दिशा में काफी तेजी भी दिखाई दे रही है। तो बयान के बाद क्या मान लिया जाए कि टैरिफ 50 फीसदी से बढ़कर 500 फीसदी हो जाएगा। सोने की बड़ती कीमते, चांदी की कमी, महंगाई, रोजगार और डालर के प्रति रूपये में गिरवाट के बीच ट्रंप का यह तोहफा कहीं कोढ़ में खाज बनने वाली कहावत न चरितार्थ कर दे। 500 परसेंट टैरिफ का मतलब साफ है भारतीय निर्यात पर सीधा प्रहार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव आईटी और फार्मा जैसे क्षेत्रों में अनिश्चितता और रोजग़ार पर असर। यह आर्थिक चोट अपने आप में गंभीर है लेकिन इससे भी बड़ा सवाल राजनीतिक है क्या यही है अमेरिका से दोस्ती की कीमत?

विकल्प कम दबाव ज्यादा

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति इस आशंका को और तेज करती है। ट्रंप का भारत प्रेम अक्सर मंचों तक सीमित रहा है जबकि व्यापार टैरिफ और वीजा जैसे मुद्दों पर सख्ती जमीन पर दिखती है। अमेरिका फस्र्ट के एजेंडे में दोस्ती की कोई जगह नहीं वहां सिर्फ उपयोगिता है और उपयोगिता खत्म होते ही दोस्ती भी। इस बीच भारत की परिधि में एक अजीब घेरा बनता दिख रहा है। पाकिस्तान पुराना दुश्मन है नेपाल रिश्तों में खटास दिखा चुका है और बांग्लादेश में सियासी अनिश्चितता है कनाडा पहले ही तल्खी का प्रतीक बन चुका है। सवाल यह नहीं कि भारत अकेला क्यों पड़ रहा है सवाल यह है कि क्या भारत की विदेश नीति किसी ऐसी रणनीति में फंस रही है जहां विकल्प कम और दबाव ज्यादा हैं?

अनुशासन का औजार बनती जा रही दोस्ती

इतिहास गवाह है कि अमेरिका जब भी मित्र देशों पर टैरिफ हथियार का इस्तेमाल करता है उसके पीछे सिर्फ व्यापार नहीं होता बल्कि भू राजनीति होती है। चीन, तुर्की, ईरान और यूरोपीय यूनियन इसके उदाहरण हैं। अब भारत का नाम इस पंक्ति में आना बताता है कि वाशिंगटन में दोस्ती अब रणनीतिक बराबरी नहीं बल्कि अनुशासन का औजार बनती जा रही है।

तेजी से बदल रही हैं शर्तें!

नया विश्व किसी घोषणा के साथ नहीं बदलता वह धीरे धीरे दोस्ती की शर्तें बदलकर बदलता है। आज भारत उसी चौराहे पर खड़ा हो गया है जहां हाथ मिलाने की तस्वीरें तो हैं लेकिन पीठ पीछे रखे खंजर भी दिखने लगे हैं। सवाल सीधा है क्या अमेरिका सच में भारत का मित्र है? या फिर वह वही सांप है जो दोस्ती करते करते जहर उतार देता है? अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक नजदीकियां बीते एक दशक में अभूतपूर्व रहीं। रक्षा समझौते, क्वाड, इंडो-पैसिफिक, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सब कुछ ऐसा लगा मानो भारत को आखिरकार वैश्विक मंच पर स्वीकृत कर लिया गया हो। लेकिन इतिहास गवाह है कि अमेरिका की दोस्ती स्थायी नहीं सशर्त होती है। वियतनाम, ईरान, इराक, अफगानिस्तान, और अब वेनेजुएला हर जगह पैटर्न एक जैसा है पहले साथ फिर दबाव और अंत में अपने हित।
वेनेजुएला तो एक मोहरा भर है वेनेजुएला का संकट सिर्फ लैटिन अमेरिका की कहानी नहीं है। वह एक चेतावनी है कि जो देश अमेरिकी लाइन से हटता है उसकी अर्थव्यवस्था राजनीति और अंतरराष्ट्रीय साख तीनों पर चोट होती है। सवाल यह है कि क्या भारत जो आज रूस से तेल खरीदता है ईरान से रिश्ते रखना चाहता है और ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने का दावा करता है क्या वह अगला मैनेज्ड फ्रेंड बनने की ओर बढ़ रहा है?

दोस्त-दुश्मन की धुंध

दुनिया अब ब्लाक में नहीं धुंध में बंट रही है। दोस्त और दुश्मन के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। अमेरिका आज किसके साथ खड़ा होगा यह सवाल सिर्फ भारत के लिए नहीं पूरी एशिया पैसिफिक राजनीति के लिए अहम है। पाकिस्तान जो कभी अमेरिका का फ्रंटलाइन अलाय था अब एक बार फिर उपयोगी दिखने लगा है। अफगानिस्तान के बाद अमेरिका को क्षेत्र में नए संतुलन की तलाश है। बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य प्रभाव की चर्चा भी इसी बड़े खेल का हिस्सा मानी जा रही है। सवाल उठता है कि क्या भारत के पड़ोसी एक बार फिर अमेरिका की प्रयोगशाला बन रहे हैं? अगर अमेरिका पाकिस्तान या बांग्लादेश के साथ सामरिक संतुलन साधता है तो भारत की स्थिति आसान नहीं होगी। भारत पहले ही चीन के साथ सीमा तनाव हिंद महासागर में बढ़ती गतिविधियों और पश्चिमी दबावों से जूझ रहा है। ऐसे में मित्र देशों की संख्या घटती दिखना एक गंभीर संकेत है। भारत को तय करना होगा कि दोस्ती का मतलब क्या है। समानता या निर्भरता। अमेरिका के साथ रिश्ते जरूरी हैं लेकिन आंख बंद करके नहीं। वेनेजुएला की राख ट्रंप की बयानबाजी और बदलता वैश्विक माहौल एक ही बात कहता है कि दुनिया में स्थायी मित्र नहीं स्थायी हित होते हैं।

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