ईरान जंग में फंसे ट्रंप, 85 सांसदों ने मांग लिया इस्तीफा – कुर्सी जाएगी या नहीं?

देशभक्ति का यह जज्बा देखकर न सिर्फ नेतन्याहू को बैकफुट पर आना पड़ा, बल्कि ट्रंप को भी अपने सरेंडर का ऐलान करना पड़ा।

4pm न्यूज नेटवर्क: हिम्मते मरदां, मद्ददे खुदा’ यानी ऊपर वाला भी उसी की मदद करता है जो साहसी होता है, और यह काम ईरान ने कर दिखाया है। बड़ी खबर यह है कि जब ताकत के गुरूर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर ‘फाइनल हमला’ करने वाले थे, तो पूरा ईरान घरों या तहखानों में छिपने के बजाय सड़कों पर उतर आया। जामे-शहादत पीने के लिए लोग अपने पावर प्लांट्स, न्यूक्लियर प्लांट्स, वॉटर प्लांट्स और रेलवे स्टेशनों पर भारी तादाद में इकट्ठा हो गए और खुद को फना करने का ऐलान कर दिया।

देशभक्ति का यह जज्बा देखकर न सिर्फ नेतन्याहू को बैकफुट पर आना पड़ा, बल्कि ट्रंप को भी अपने सरेंडर का ऐलान करना पड़ा। हालांकि, ट्रंप ने इस सरेंडर को ‘सीज़फायर’ (युद्धविराम) का नाम दिया है और इसके लिए पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ और अपने आर्मी चीफ की सिफारिश पर यह बड़ा फैसला लेने का दावा किया है। लेकिन अंदरखाने का सच कुछ और ही है। सच यह है कि खुद ट्रंप की कुर्सी फंस गई है और शायद इसी डर से ट्रंप ने अचानक सरेंडर का ऐलान किया है। इसका जश्न ईरान से लेकर इराक समेत दुनिया के तमाम मुस्लिम मुल्कों में देखा जा सकता है।

अभी कल शाम को डोनाल्ड ट्रंप ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, उसमें दावा किया था कि दुनिया की एक बहुत ही पुरानी सभ्यता को आज रात पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा। चर्चाएं तो यहाँ तक थीं कि अमेरिका परमाणु बम (Nuclear Bomb) का इस्तेमाल कर सकता है, क्योंकि जंग में ‘सभ्यता को खत्म करने’ का मकसद पूरे इलाके को साफ करने से था। ऐसे में कयासों का दौर चल रहा था।

ट्रंप हों या नेतन्याहू, दोनों ने दावा किया था कि वे ईरान के पुल, रेलवे स्टेशन, बिजली प्लांट, यूरेनियम प्लांट और वॉटर प्लांट को उड़ा देंगे। लेकिन कहते हैं कि जब जनता सड़क पर आ जाती है, तो कोई कितना भी बड़ा तानाशाह क्यों न हो, उसे घुटनों पर टेकना ही पड़ता है, और हुआ भी यही है।

ईरान की जनता अपने देश को बचाने, अपनी सभ्यता और अपने वजूद की हिफाजत के लिए खुद सड़कों पर उतर आई। बिजली प्लांटों से लेकर न्यूक्लियर प्लांटों तक पर 1.4 करोड़ फिदायनी तैनात हो गए। उन्हें फिदायनी इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इन करोड़ों लोगों को अब इस बात का खौफ नहीं था कि वे मरेंगे या बचेंगे; उन्हें बस यह फिक्र थी कि अपना देश और अपनी 8 हज़ार साल पुरानी सभ्यता बचानी है। जैसे ही इन 1.4 करोड़ लोगों ने रणनीतिक ठिकानों पर डेरा डाला, पूरा ईरान जाग गया। ‘या हुसैन’ की सदाओं के साथ लोग अमेरिकी-इज़राइली मिसाइलों के सामने सीना तानकर खड़े हो गए और आखिर में ट्रंप को सरेंडर करना ही पड़ा।

कहानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि इसमें एक और गहरा राज दफन है, जिसे मंज़रे-आम (Public) से छिपाने की कोशिश की जा रही है। ईरान कहीं भी दबा या डरा नहीं है। यह समझौता भी सिर्फ अमेरिका की शर्तों पर नहीं, बल्कि ईरान की 10 शर्तों के साथ हुआ है। इसमें सबसे अहम शर्त यह है कि ईरान होर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले हर जहाज़ से 20 लाख डॉलर वसूलेगा।

यहाँ तक कि ट्रंप ने खुद अपने ट्वीट में इस बात को कबूल किया है कि ईरान की 10 शर्तें उन्हें मिल गई हैं और अब इस सब पर फाइनल रजामंदी दो सप्ताह के भीतर बन जाएगी। 10 अप्रैल को पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के उच्च अफसरों की बातचीत का पहला राउंड शुरू होगा। लेकिन ट्रंप के सरेंडर का दूसरा बड़ा कारण यह है कि खुद ट्रंप की कुर्सी इस ईरान जंग की वजह से बुरी तरह फंस गई है।

ईरान में जहाँ युद्धविराम से जश्न का माहौल है, वहीं अमेरिका में राजनीतिक विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। ‘एक्सिओस’ (Axios) की रिपोर्ट के मुताबिक, बताया जा रहा है कि 85 से ज्यादा डेमोक्रेट सांसदों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पद से हटाने की मांग कर दी है। ये सभी सांसद यूँ तो विपक्षी पार्टी से हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर विपक्ष का दबाव ट्रंप पर पहले कभी नहीं आया था। वैसे भी अमेरिका में यह नैरेटिव चल ही रहा था कि ट्रंप ने यह युद्ध ‘एप्सटीन फाइल्स’ के गंदे अपराधों को ढंकने के लिए छेड़ा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईस्टर के मौके पर सोशल मीडिया पर इतना गुस्सैल और अपशब्दों से भरा पोस्ट लिखा कि अमेरिका के भीतर भी उनकी भाषा और पल-पल बदलते रुख को लेकर विरोध के सुर ऊंचे होने लगे। अमेरिका के कई सांसद और नेता कह रहे हैं कि ट्रंप का ईरान युद्ध को लेकर बार-बार शब्द बदलना, रणनीति बदलना और यह विवादित पोस्ट लिखना, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

अब अमेरिकी कांग्रेस में ’25वें संशोधन की धारा 4′ लागू करने की मांग ज़ोर पकड़ रही है। यह धारा ही अब अमेरिकी सांसदों को ट्रंप की सनक का सही इलाज नज़र आ रही है। वैसे तो अमेरिका में किसी राष्ट्रपति को हटाना आसान नहीं होता, लेकिन 25वें संशोधन की चौथी धारा राष्ट्रपति को पदमुक्त करने का अधिकार देती है। इस धारा के अनुसार, यदि उपराष्ट्रपति और कैबिनेट का बहुमत (15 में से 8 सदस्य) लिखित रूप से यह घोषणा करे कि राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों को निभाने में असमर्थ हैं, तो उपराष्ट्रपति तुरंत ‘एक्टिंग प्रेसिडेंट’ बन जाता है। दावा किया जा रहा है कि डेमोक्रेट्स अब इस प्रस्ताव को लाने की तैयारी कर रहे हैं।

ट्रंप के अपने प्रशासन के बड़े अधिकारियों, जैसे कि काउंटर-टेररिज्म चीफ जो केंट, ने पहले ही इस्तीफा दे दिया है। केंट ने साफ कहा कि यह जंग सिर्फ इज़राइल और उसकी लॉबी के दबाव में शुरू की गई है। अपनी कुर्सी को खतरे में देख ट्रंप ने रातों-रात अपना रुख बदल लिया। जो ट्रंप कल तक दहाड़ रहे थे, आज वे ‘दो हफ्ते के संघर्ष विराम’ की भीख मांगते नज़र आ रहे हैं।

हालांकि, ट्रंप का दावा है कि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ पाकिस्तान का दखल है। ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में खुद स्वीकार किया कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर के साथ लंबी बातचीत के बाद हमलों को रोकने का फैसला किया है।

पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए ट्रंप को आईना दिखाया कि यह जंग पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगी। ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने यह फैसला ‘दोस्ती’ और ‘ग्लोबल पीस’ के लिए लिया है, लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप ईरान के हौसले के आगे सरेंडर हुए हैं। एक ओर जहाँ दुनिया अमेरिका के इस सरेंडर का जश्न मना रही है, वहीं तेल अवीव में बेंजामिन नेतन्याहू छटपटाकर रह गए हैं। नेतन्याहू को लग रहा था कि वे अमेरिकी कंधों पर बंदूक रखकर ईरान को तबाह कर देंगे, लेकिन ट्रंप के इस यू-टर्न ने नेतन्याहू को अधर में छोड़ दिया है।

इज़राइल के सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप ने यह फैसला लेकर इज़राइल की पीठ में छुरा घोंपा है। नेतन्याहू अब भी दावा कर रहे हैं कि वे लेबनान में हमले जारी रखेंगे, लेकिन बिना अमेरिकी मदद के ईरान से सीधे टकराना अब इज़राइल के लिए नामुमकिन है। ट्रंप ने ईरान की इस बात को भी मान लिया है कि जब तक अमेरिका हमला नहीं करेगा, ईरान होर्मुज को खुला रखेगा।

यह समझौता नेतन्याहू के उस प्लान पर पानी फेरने जैसा है, जिसमें वे अमेरिका को पूरी तरह जंग में घसीटना चाहते थे। जैसे ही सीज़फायर की खबर तेहरान और बगदाद पहुँची, सड़कों पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। ईरान और इराक में बच्चे, बूढ़े और जवान—सभी जश्न मना रहे हैं और प्रतिरोध की जीत के नारे लगा रहे हैं।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने गर्व से कहा कि 1.4 करोड़ से ज्यादा ईरानी अपनी जान देने को तैयार थे, और इसी अटूट संकल्प ने दुश्मन को कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया। यह जश्न सिर्फ एक जंग के रुकने का नहीं है, बल्कि यह जश्न उस ‘अहंकार’ की हार का है जो एक सभ्यता को मिटाने चला था। इराक के लोग भी राहत की सांस ले रहे हैं, क्योंकि जंग की सबसे ज्यादा मार उन्हीं के मुल्क पर पड़ रही थी।

ऐसे में साफ़ है कि डोनाल्ड ट्रंप अपनी ही बिछाई बिसात में फंस गए हैं। कुर्सी जाने के डर और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने उन्हें उस ईरान के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया जिसे वे नक्शे से मिटाने की बात कर रहे थे। नेतन्याहू की ज़िद ने इज़राइल को अकेला कर दिया है, और ट्रंप का यह फैसला साबित करता है कि अब दुनिया ‘गुंडागर्दी’ से नहीं चलेगी। क्या आपको लगता है कि ट्रंप ने वाकई शांति के लिए जंग रोकी है या सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए? क्या यह ट्रंप का सरेंडर नहीं है? क्या नेतन्याहू अब कोई नई साजिश रचेंगे?

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