CBI अधिकारी बनकर करते थे ‘डिजिटल अरेस्ट’, कानपुर पुलिस ने खोला 10 करोड़ की साइबर ठगी का नेटवर्क
कानपुर पुलिस ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर करोड़ों की साइबर ठगी करने वाले अंतरराज्यीय गैंग का खुलासा किया है। आरोपी खुद को CBI और पुलिस अधिकारी बताकर लोगों को डराते थे और ऑनलाइन करोड़ों रुपये वसूलते थे।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कानपुर में साइबर अपराध का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। फोन की घंटी बजती थी, दूसरी तरफ खुद को CBI या पुलिस अधिकारी बताने वाला व्यक्ति होता था, और कुछ ही मिनटों में सामने वाला डर के ऐसे जाल में फंस जाता था कि अपनी मेहनत की कमाई ऑनलाइन ट्रांसफर कर देता था। इस पूरे खेल को साइबर अपराधियों ने नया नाम दिया था ‘डिजिटल अरेस्ट’।
अब कानपुर पुलिस ने ऐसे ही एक अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिस पर देशभर में करीब 10 करोड़ रुपये की ठगी करने का आरोप है। पुलिस ने गिरोह के दो शातिर सदस्यों को गिरफ्तार किया है, जबकि कई अन्य आरोपी अभी भी फरार बताए जा रहे हैं।
खुद को CBI और पुलिस अधिकारी बताकर करते थे ठगी
कानपुर कमिश्नरेट की साइबर सेल पश्चिम जोन और थाना पनकी पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में इस गिरोह का खुलासा हुआ। जांच में सामने आया कि आरोपी लोगों को फोन कर खुद को CBI, पुलिस या दूसरी केंद्रीय एजेंसियों का अधिकारी बताते थे। इसके बाद पीड़ितों को फर्जी केस में फंसाने, गिरफ्तारी कराने या परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी जाती थी। कई मामलों में वीडियो कॉल के जरिए नकली पूछताछ का माहौल बनाया जाता था ताकि सामने वाला घबरा जाए और अपराधियों की बातों में आकर पैसे ट्रांसफर कर दे। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक यही तरीका अपनाकर गिरोह ने करोड़ों रुपये की ठगी को अंजाम दिया।
खातों में मिले करोड़ों के ट्रांजैक्शन
जांच के दौरान पुलिस को आरोपियों के बैंक खातों में बड़े पैमाने पर लेनदेन के सबूत मिले हैं। शुरुआती जांच में करीब 10 करोड़ रुपये के ट्रांजैक्शन सामने आने की बात कही जा रही है। गिरफ्तार आरोपियों के पास से मोबाइल फोन, बैंक पासबुक, चेकबुक और कई एटीएम कार्ड बरामद किए गए हैं। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस नेटवर्क से और कितने लोग जुड़े हुए हैं और देश के किन-किन राज्यों में इस गिरोह ने वारदातों को अंजाम दिया।
‘डिजिटल अरेस्ट’ क्या है?
हाल के महीनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराध का नया तरीका बनकर सामने आया है। इसमें अपराधी खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को डराते हैं। उन्हें कहा जाता है कि उनका मोबाइल नंबर, आधार कार्ड या बैंक खाता किसी अपराध में इस्तेमाल हुआ है। इसके बाद पीड़ित को वीडियो कॉल या लगातार फोन कॉल के जरिए मानसिक दबाव में रखा जाता है। कई बार लोगों को घंटों तक ऑनलाइन रहने के लिए मजबूर किया जाता है, ताकि वे किसी और से संपर्क न कर सकें। इसी दबाव में लोग अपने बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर कर देते हैं।
पुलिस ने लोगों को किया सतर्क
डीसीपी पश्चिम काशिम आब्दी ने बताया कि साइबर अपराधी लगातार नए तरीके अपना रहे हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि कोई भी जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। अगर किसी व्यक्ति को इस तरह का कॉल आता है तो तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करनी चाहिए। साथ ही किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक डिटेल, OTP या निजी जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए।
तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराध
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल लेनदेन बढ़ने के साथ साइबर अपराध के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। अपराधी अब तकनीक और मनोवैज्ञानिक दबाव दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव माना जा रहा है। फिलहाल कानपुर पुलिस गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही है और उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भी गिरफ्तारी हो सकती है।
रिपोर्ट – प्रांजुल मिश्रा
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