क्या प्रधानमंत्री के दिमागी नक्सली बयान की छाया में रोक दी गई संजय शर्मा की ‘सहिया’

- जंगल में प्रेम की कहानी सेंसर के गलियारे में नक्सल का साया
- सहिया पर सेंसर का शिकंजा या नक्सल का बहाना?
- संजय शर्मा की सहिया पर सेंसर का ब्रेक कहानी प्रेम की सवाल नक्सल का
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। संजय शर्मा की मूवी सहिया पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक बयान की काली छाया मंडराने लगी है। प्रेम पटकथा पर लिखी फिल्म सहिया को रिलीज की परमीशन में सेंसर बोर्ड की तरफ से देरी किया जाना शुरू हो गया है।
प्रोड्यूसर और डायरेक्टर संजय शर्मा ने फिल्म को सीबीएफसी दफ्तर में प्रायोरिटी कैटेगरी में सबमिट किया गया था लेकिन तय समय सीमा गुजर जाने के बाद भी फिल्म को रिलीज की परमीशन नहीं मिली इससे फिल्म के रिलीज प्लान पर असर पड़ रहा है और प्रोड्यूसर्स को फाइनेंशियल नुकसान हो रहा है। गौरतलब है कि 15 अगस्त को लाल किले से दिमागी नक्सल का नया नैरेटिव सामने आया है और ठीक उसी वक्त जंगल की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म सहिया को सीबीएफसी की स्क्रीनिंग में नक्सलवाद का संदर्भ दिखाई दे गया और फिल्म को स्क्रीनिंग कमेटी में भेजने की बात कही गयी है।
सहिया प्रेम की कहानी है
सहिया फिल्म की कहानी शुरू होती है जंगल से जहां न बंदूक है न बारूद न लाल झंडा। जहां नदी बहती है पेड़ों के बीच जिंदगी सांस लेती है और रिश्ते अपनी सबसे मासूम शक्ल में दिखाई देते हैं। कहानी प्रेम की है कहानी इंसान और इंसानियत की है कहानी प्रकृति और रिश्तों की है। लेकिन जैसे ही कहानी सेंसर बोर्ड के दरवाजे पर पहुंचती है अचानक उसके पीछे सेंसर बोर्ड को एक शब्द दिखाई देने लगता है नक्सलवाद। झारखंड के नेतरहाट के जंगलों में शूट हुई यह फिल्म अब रिलीज के इंतजार की लाइन में खड़ी है। फिल्म का नाम सहिया है और इसके निर्माता/निर्देशक हैं संजय शर्मा जिन्होंने अपनी पूंजी अपनी मेहनत और अपना भरोसा लगा कर इस फिल्म पर दांव पर लगाया है। फिल्म में कहानी प्रेम की है लेकिन सीबीएफसी के दरवाजे पर पहुंची तो सवाल नक्सलवाद का खड़ा हो गया। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि सहिया को सर्टिफिकेट कब मिलेगा? बड़ा सवाल यह है कि क्या आज के राजनीतिक माहौल में नक्सल शब्द इतना संवेदनशील हो चुका है कि जंगल की पृष्ठभूमि में बनी प्रेम कहानी को भी संदेह की निगाह से देखा जाने लगे। और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए दिमागी नक्सली जैसे राजनीतिक रूप से बेहद तीखे शब्दों के बाद नक्सलवाद से जुड़े किसी भी संदर्भ को देखने का नजरिया और ज्यादा कठोर हो जाए।
संजय शर्मा की पहली बड़ी फीचर फिल्म है सहिया
सहिया संजय शर्मा के लिए सिर्फ एक फिल्म नहीं है। वह इससे पहले दो शॉर्ट फिल्में बना चुके हैं। लेकिन यह उनकी पहली बड़ी फीचर फिल्म है। यानी एक नए फिल्मकार का सबसे बड़ा सपना अब रिलीज की प्रक्रिया में फंसा है। उन्होंने अपनी मेहनत पैसा और समय इस फिल्म में लगाया है। नेतरहाट के जंगलों में शूटिंग हुई है। फिल्म में नीरज काबी, शांतनु माहेश्वरी और रिंकू राजगुरु जैसे कलाकार हैं। संगीत में सोना मोहपात्रा, जावेद अली, ऋचा शर्मा, कृष्णा बेउरा और स्वानंद किरकिरे जैसे नाम जुड़े हैं। गीत समीर अंजन और स्वानंद किरकिरे ने लिखे हैं। यानी यह कोई मोबाइल कैमरे से बनाई गई अचानक तैयार हुई फिल्म नहीं है। यह एक ऐसी परियोजना है जिसके पीछे लंबी तैयारी निवेश और पूरी टीम की मेहनत है और अब पूरी टीम एक सवाल के सामने खड़ी है कि फिल्म कब रिलीज होगी?
जंगल दिखना ही नक्सलवाद का संकेत कैसे
एक तरफ सीबीएफसी की अपनी वेबसाइट कहती है कि फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया तय चरणों और समय सीमाओं के भीतर होगी जबकि दूसरी तरफ प्रोड्यूसर और डायरेक्टर संजय शर्मा का कहना है कि प्रायोरिटी कैटेगरी के तहत आवेदन करने के बावजूद फिल्म की स्क्रीनिंग करीब डेढ़ महीने बाद हुई। स्क्रीनिंग के बाद बताया गया कि फिल्म की पृष्ठभूमि में नक्सलवाद का संदर्भ होने के कारण फिल्म को स्क्रीनिंग कमेटी में भेजा जाएगा। यहीं से सहिया की असली कहानी शुरू होती है। संजय शर्मा का कहना है फिल्म नक्सलवाद पर है ही नहीं तो फिर सवाल यह है कि जंगल दिखना ही नक्सलवाद का संकेत कैसे बन गया? क्या झारखंड के जंगलों में कहानी कहना भी अब एक राजनीतिक जोखिम है? क्या प्रकृति के बीच प्रेम की कहानी लिखने वाला फिल्मकार पहले यह प्रमाणपत्र लेकर आए कि उसकी कहानी में कोई वैचारिक बारूद नहीं है? या फिर सेंसर बोर्ड का काम यही है कि वह हर आशंका को गंभीरता से जांचे मगर जांच की प्रक्रिया भी उतनी ही पारदर्शी और समयबद्ध हो?
साहिया पूछ रही है जंगल दिखाना अपराध तो नहीं
और अब इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत के जंगल सिर्फ भौगोलिक क्षेत्र नहीं हैं वह कहानियां हैं वह आदिवासी जीवन हैं वह प्रेम हैं वह लोकगीत हैं वह संघर्ष हैं वह प्रकृति हैं और हां वह नक्सलवाद से जुड़े सामाजिक राजनीतिक इतिहास के भी गवाह हैं। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि जंगल की पृष्ठभूमि में बनी हर फिल्म को पहले नक्सलवाद के चश्मे से देखा जाएगा? अगर ऐसा नहीं है तो सहिया को लेकर यह सवाल उठा ही क्यों? और अगर ऐसा है तो फिर फिल्मकारों को पहले से पता होना चाहिए कि जंगल में कैमरा ले जाने से पहले उन्हें सिर्फ कहानी नहीं अपनी वैचारिक निर्दोषता भी साबित करनी होगी। यही वह सवाल है जो इस पूरी कहानी को सामान्य सेंसर विवाद से आगे ले जाता है।




