जेनेवा बैठक से पहले वॉशिंगटन-तेहरान आमने-सामने, भारत की बढ़ी चिंता
अमेरिका-ईरान टेंशन के बीच जंग के आसार बढ़ गए हैं और अगले 24 घंटे मिडिल ईस्ट के लिए बहुंत अहम होने वाले हैं। क्योंकि एक ओर जेनेवा में अमेरिका-ईरान मेज पर बातचीत करने के लिए आमने सामने हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: अमेरिका-ईरान टेंशन के बीच जंग के आसार बढ़ गए हैं और अगले 24 घंटे मिडिल ईस्ट के लिए बहुंत अहम होने वाले हैं। क्योंकि एक ओर जेनेवा में अमेरिका-ईरान मेज पर बातचीत करने के लिए आमने सामने हैं।
तो दूसरी ओर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का ऐसा बयान आया है जो ईरान के साथ न्यूक्लियर डील की बातचीत को पूरी तरह से खत्म कर सकता हैै।
बड़ी खबर यह है कि मौके की नजाकत को भांपते हुए ईरान ने आखिरकार होमुर्ज में अपनी सेना उतार दी है तो मार्को रुबियो शिया मौलानाओं पर तीखा हमला करना शुरु कर चुके हैं और पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि भारत की अचानक ईरान-अमेरिका टेंशन के बीच में एंट्री हुई है मार्को रुबियो का कौन सा ऐसा बयान है कि जिस के बाद न्यूक्लियर डील पर ईरान के साथ समझौता नो डील मे बदल सकता हैै और क्यों अचानक ईरान ने होमुर्ज की खाड़ी में अपनी सेना उतार दी है.
अमेरिका ईरान पर बहुत दिनों से दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। खासतौर से ट्रंप को जब भी सत्ता मिली है कि तो ईरान पर मैक्सिम प्रेशर देने में कभी नहीं चूके हैं। पिछले दिनों ट्रंप ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर अटैक किया था और 12 रोजा जंग चली थी लेकिन मामला यही नहीं शांत हुआ है बल्कि अमेरिका इस बार सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ उतर गया है। आपको बता दें कि पिछले एक महीने से अमेरिका ईरान को घेरने की कोशिश कर रहा है। लाल सागर सागर से लेकर दक्षिणी चीन तक समंदर में अमेरिका ने पहरा बिठा दिया है।
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी एयर बेस पर सेनाएं अलर्ट है। कई बडे युद्धपोत से अमेरिका ईरान को चारों ओर से घेर चुका है और अब प्रेशर बना रहा है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से खत्म करे और ईरान भी इस बात का दावा कर रहा है कि वो अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से से रोक लेगा लेकिन इस बीच एक बड़ा खेल हुआ है। एक ओर अमेरिकी विदेश मंत्री का बडा बयान आया है तो दूसरी ओर ईरान के तेल से भरे टैंकर भारत के पास पकड़े गए हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में बयान देते हुए कहा कि ईरान के साथ किसी भी तरह का समझौता आसान नहीं होने वाला है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ईरान की नीतियां और उसका रवैया इस बातचीत को जटिल बना रहा है। मारको रुबियो ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि ईरान सिर्फ परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि अपने मिसाइल कार्यक्रम और मिलिट्री मूवमेंट्स पर भी बात करे।
अमेरिका का मानना है कि सिर्फ परमाणु मुद्दे तक सीमित बातचीत से स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। आपको बता दें कि ईरान बहुत पहले ही ओमान में हुई बातचीत में बात पूरी तरह से साफ कर चुका है कि वो परमाणु और यूरेनियन संवर्द्धन के अलावा वो किसी दूसरे मुद्दे पर बातचीत नहीं करेगा। ईरान का कहना है कि वो सिर्फ परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने को लेकर ही बातचीत करेगा। ईरान बार-बार ये दोहराता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और उसका इस्तेमाल सिर्फ ऊर्जा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।
ईरान का साफतौर पर कहना है कि वो अपना परमाणु कार्यक्रम शून्य तक ले जाएगा लेकिन इसके लिए सबसे पहली शर्त यह है कि अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंधन हटाए। ईरान ने यह भी साफ कर दिया है कि वो यूरेनियम संवर्द्धन के अलावा बेलेस्टिक मिसाइल और अपने दूसरे सैन्य कार्यक्रमों पर कोई रोक लगाने वाला नहीं है। ऐसे में मार्को रुबियो और ईरान का नजरिया बिल्कुल अलग अलग है। हालांकि बातचीत के लिए जेनेवा में ईरान और अमेरिका का दल पहुंच चुका है। माना जा रहा है कि इस बैठक में बहुत हद तक अमेरिका ईरान के बीच फाइनल रिजल्ट निकलकर सामने आएगा। अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफतौर पर कह दिया है कि वो भले से ही जेनेवा बातचीत में सीधे तौर पर शामिल नहीं हैं लेकिन उनकी इन डायरेक्ट एंटी वहां पर रहेगी।
वहीं दूसरी ओर जेनेवा पहुंचते ही ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ ऐलान किया है ईरान डरने और दबने वाला देश नहीं है। अब्बास अराघची ने मीडिया में दावा किया है कि – मैं जिनेवा में हूं, जहां एक निष्पक्ष और समान समझौते को हासिल करने के लिए वास्तविक विचारों के साथ हूं. धमकियों के आगे झुकना डील का हिस्सा नहीं है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण सम्मेलन को संबोधित करना भी अराघची की योजना में शामिल है लेकिन जिस तरह का बयान अब्बास अराघची का है उसमें एक बात बिल्कुल साफ है कि ईरान यूरेनियम और परमाणु संवर्द्धन के अलावा ईरान और कोई समझौता नहीं करेगा। ऐसे में जेनेवा में बातचीत को बहुत आगे जाने के आसार न के बराबर दिख रहे हैं, ऐसे में अगले 24 घंटे अमेरिकी-ईरान जंग के बहुत अहम होने वाले है।
अमेरिका बहुत दिनों से ईरान को घेरने की कोशिश कर रहा है, और अब अमेरिकी सेना पूरी तरह से मिडिल ईस्ट में एक्टिव है। दरअसल लाल सागर से लेकर दक्षिणी चीन तक सेना सिर्फ इसलिए तैनात नहीं है कि वो ईरान पर अटैक करे बल्कि अमेरिकी सेना इस पर पूरी तरह से नजर बनाए हुए है कि आखिर ईरान का तेल और गैस कौन खरीद रहा है।
अमेरिका ऐसा इसलिए कर रहा है कि ईरान की कमाई का एकमात्र जरिया अब यही तेल और गैस बचा है , जिसको कई मुल्क चोरी चुपके से खरीदते हैं लेकिन अब ईरान ने लाल सागर से लेकर हिंद महासागर और दक्षिणी चीन तक अपनी पहुंच समंदर में बढा ली है , मकसद है कि ईरान का तेल ईरान से बाहर न जाने पाए। खबर है कि कल रात में ईरान के तेल से भरे तीन जहाज को भारतीय सेना ने अपने कब्जे में लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत ने ईरान से जुड़े तीन तेल टैंकरों को जब्त कर लिया है, जिन पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए हुए हैं। ये जहाज अवैध तेल व्यापार में शामिल होने के संदेह में पकड़े गए हैं। रॉयटर्स को एक सूत्र ने यह जानकारी दी, जिसके मुताबिक भारतीय तट रक्षक ने समुद्री क्षेत्र में निगरानी सख्त कर दी है ताकि प्रतिबंधों को चकमा देने वाली गतिविधियां रोकी जा सकें।
जब्त किए गए तीन जहाजों के नाम स्टेलर रूबी, एस्फाल्ट स्टार और अल जफजिया हैं। सूत्र के अनुसार, ये जहाज अक्सर अपनी पहचान बदलते रहते थे ताकि तटीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों से बच सकें। इनके मालिक विदेशी हैं। दावा किया जा रहा है कि भारतीय अधिकारियों ने 6 फरवरी को एक्स पर एक पोस्ट में बताया था कि मुंबई से लगभग 100 नॉटिकल मील पश्चिम में संदिग्ध गतिविधि का पता चलने के बाद तीन जहाजों को रोका गया था। यह पोस्ट बाद में हटा दी गई, लेकिन सूत्र ने पुष्टि की कि जहाजों को मुंबई लाकर आगे जांच के लिए रखा गया है।
ऐसे में साफ है कि अमेरिका की पूरी कोशिश है कि ईरान से कोई देश तेल और गैस बिल्कुल न खरीद सके और अगर ईरान अगर तेल और गैस नहीं बेच पाएगा तो वहां भुखमरी तक आ सकती है। क्योंकि ईरान में पहले से ही बहुत क्राइसिस है।
ईरान में मंहगाई अपने चरम पर है और डॉलर के मुकाबले ईरान का वैल्यू इतनी गिर गई है कि ईरान के पैसे रद्दी के भाव में बिक रहे हैं। अब अगर चोरी चुपके बिकने वाले तेल और गैस ईरान की बिकनी बंद हो जाती है कि तो एक बात पूरी तरह से साफ है कि ईरान पर घोर संकट आने वाला है। सबसे खास बात यह है कि ईरान इस बात का समझता है और यही वजह है कि ईरान ने होमुर्ज की खाड़ी में जेनेवा बातचीत से एक दिन पहले ही अपनी सेना उतार दी है। वैसे तो ईरान की ओर से दावा किया जा रहा है कि ये सैन्य अभ्यास है लेकिन सच यह है कि ईरान जान चुका है कि अगर कड़ा एक्शन नहीं लिया गया तो बडा संकट खड़ा हो सकता है।
होमुर्ज में कोई साधारण अभ्यास नहीं है बल्कि यह अमेरिका के लिए सीधा संदेश है। याद रहे, इसी इलाके में अमेरिका का विशाल नौसैनिक बेड़ा और आर्मडा तैनात है। दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर खड़ी हैं। ईरान ने अपनी एंटी-शिप मिसाइलें तैनात कर दी हैं और उसके ड्रोन अमेरिकी जहाजों के ऊपर मंडरा रहे हैं। अगर जेनेवा में बातचीत विफल हुई, तो इसकी पहली गोली होर्मुज की लहरों पर चलेगी। और अगर होर्मुज बंद हुआ, तो दुनिया की अर्थव्यवस्था का दम घुट जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति बार-बार दावा करते हैं कि वे ईरान के साथ एक ग्रेट डील चाहते हैं। वे कहते हैं कि वे जंग नहीं चाहते। लेकिन क्या उनकी नीतियां उनके शब्दों का साथ दे रही हैं? एक तरफ आप शांति की बात करते हैं और दूसरी तरफ ईरान के चारों तरफ घेराबंदी बढ़ा देते हैं। आप उन पर इतने आर्थिक प्रतिबंध लगा देते हैं कि आम जनता के लिए दवाइयां जुटाना मुश्किल हो जाता है। यह अमेरिका की पुरानी रणनीति है कि पहले गले को दबाओ और फिर कहो कि आओ, शांति की बात करते हैं। मार्काे रुबियो का ताजा बयान इसी दोहरी चाल का हिस्सा है। वे जानते हैं कि ईरान कभी भी अपनी मिसाइल क्षमता पर समझौता नहीं करेगा। तो फिर ऐसी शर्त क्यों रखी गई? क्या अमेरिका जानबूझकर जेनेवा वार्ता को विफल करना चाहता है ताकि उसे जंग छेड़ने का एक बहाना मिल जाए? आज मार्को रुबियो का बयान आया है जो साफ कर रहा है कि समझौते होना नामुमकिन है। मार्को रुबियो का दावा है कि ईरान की सत्ता शिया मौलवियों के हाथ में है ऐसे में समझौता नहीं हो पाएगा।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि आज का दिन इतिहास के सबसे खतरनाक दिनों में से एक है। अगर जेनेवा से आज नो डील की खबर आती है, तो इसका मतलब होगा युद्ध का नगाड़ा। ईरान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अब और इंतजार नहीं करेगा। अगर कूटनीति रास्ता नहीं देगी, तो वह अपनी रक्षा के लिए हर हद पार कर जाएगा। होर्मुज की खाड़ी में तैनात सेनाएं बस एक आदेश का इंतजार कर रही हैं। अमेरिका की विस्तारवादी सोच ने मिडिल ईस्ट को बारूद के ढेर पर बैठा दिया है। यदि युद्ध छिड़ता है, तो सिर्फ दो देश नहीं लड़ेंगे.पूरी दुनिया इसकी चपेट में आएगी। तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल पार कर सकती हैं, सप्लाई चेन ध्वस्त हो जाएगी और मानवता एक बार फिर विनाश का गवाह बनेगी।
ऐसे में साफ है कि जेनेवा की मेज पर आज सिर्फ कागज के टुकड़े नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगियां रखी हैं। क्या अमेरिका अपनी सुपरपावर होने की जिद छोड़ पाएगा? क्या वह ईरान को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में सम्मान दे पाएगा? या फिर मार्काे रुबियो जैसे नेताओं की हठधर्मिता दुनिया को तबाही की ओर ले जाएगी? ईरान ने अपना रुख साफ कर दिया है कि सम्मान दोगे तो शांति मिलेगी, धमकी दोगे तो होर्मुज की लहरें गवाह बनेंगी। अब फैसला वाशिंगटन को करना है कि वह इतिहास में शांतिदूत के रूप में दर्ज होना चाहता है या एक ऐसे हमलावर के रूप में जिसने शांति के आखिरी मौके को भी अपनी अकड़ में गंवा दिया।



