न डरे थे, न डरे हैं, डटें रहेंगे हम

शीर्ष पर संजय शर्मा, एक मंच एक किताब और वह उपस्थिति जो किसी भी बैन से कहीं ज्यादा बड़ी है

  • 4PM नेटवर्क पर सरकारी पाबंदियों का पहरा
    चैनल, रील के बाद फेसबुक पेज को भी सरकार ने बनाया निशाना

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। सरकार 4पीएम न्यूज नेटवर्क पर पाबंदियों का पहरा लगाकर डराना चाहती है। 4पीएम के यूटयूब नेशनल चैनल पर बैन लगाया। फिर चैनल की रील पर बैन लगाया गया और ताजा कार्रवाई 4पीएम के फेसबुक पेज को भी भारत में बैन कर दिया गया।
सरकार बैन के सहारे चाहती है कि सवाल पूछने वाले थम जाएं आवाजें धीमी पड़ जाएं और सच की जगह सिर्फ एक तयशुदा कथा चलती रहे। मीडिया पर कसती लगाम डिजिटल प्लेटफॉम्र्स पर बढ़ती निगरानी, और अब 4पीएम नेटवर्क जैसे प्लेटफॉम्र्स पर पाबंदी यह सब किसी इत्तेफाक का हिस्सा नहीं है। यह एक पैटर्न है एक रणनीति है जहां असहमति को अपराध और सवाल को बगावत बना दिया गया है।

विद्रोही नजरिया बगावती तेवर

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक नाम बार-बार उभरता है और वह है संपादक संजय शर्मा का नाम। एक ऐसा पत्रकार जिसने सत्ता के सामने घुटने टेकने के बजाय सवालों को अपना हथियार बनाया। 4पीएम नेटवर्क के जरिए उन्होंने वो सवाल उठाए जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया पूछने से कतराता रहा। संजय शर्मा की पत्रकारिता किसी एजेंडे का हिस्सा नहीं रही बल्कि यह सीधे जनता के मुद्दों से जुड़ी रही चाहे वह सरकारी नीतियों की खामियां हों प्रशासनिक भ्रष्टाचार हो या फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिरती साख। यही वजह है कि उनका प्लेटफॉर्म तेजी से लोकप्रिय हुआ और लोगों का भरोसा जीतने लगा। लेकिन शायद यही लोकप्रियता सत्ता को खटकने लगी। जब कोई मंच बिना डर के सच बोलने लगता है तो वह सत्ता के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। और फिर शुरू होता है दबाव नोटिस और अंत में—बैन। सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक फेसबुक पेज या चैनल को बंद कर देने से आवाजें खत्म हो जाएंगी? क्या संजय शर्मा जैसे पत्रकार चुप बैठ जाएंगे? इतिहास बताता है कि ऐसे हर प्रयास ने आवाजों को और मजबूत ही किया है।

4PM रुका नहीं है और अब रुकेगा भी नहीं

यह वही साहस है जो बंद दरवाजों के सामने भी बोलता है। यह वही जिद है जो हर रोक के बाद और ज्यादा मजबूत होकर खड़ी होती है। अगर मंच छीनोगे तो सड़कें मंच बन जाएंगी। अगर माइक्रोफोन बंद करोगे तो आवाजें और ऊंची हो जाएंगी। 4पीएम को रोकने की कोशिशें कोई नई बात नहीं हैं। लेकिन हर बार इन कोशिशों ने सिर्फ एक चीज साबित की है कि यह आवाज दबने के लिए नहीं बनी। यह आवाज लडऩे के लिए बनी है सवाल पूछने के लिए बनी है और सच को सामने लाने के लिए बनी है।

सवाल तो पूछते रहेंगे हम

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सवाल हैं। अगर सवाल खत्म हो गए तो लोकतंत्र सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएगा। आज जो हो रहा है वह इसी मूल भावना पर हमला है। मीडिया का काम सरकार की तारीफ करना नहीं बल्कि उसकी जवाबदेही तय करना है। लेकिन जब मीडिया पर ही पाबंदियां लगने लगें तो यह खतरे की घंटी है। 4पीएम नेटवर्क पर कार्रवाई इसी दिशा में एक बड़ा संकेत है। लेकिन यह भी सच है कि सवाल पूछने की आदत को खत्म नहीं किया जा सकता। यह समाज के डीएनए में होता है। एक प्लेटफॉर्म बंद होगा तो दूसरा खड़ा होगा। एक आवाज दबेगी तो सौ नई आवाजें उठेंगी। सवाल पूछना सिर्फ अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है। और हम इस जिम्मेदारी से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

सरकार चाहती है चापलूसी की कथा

पहले चैनल पर रोक फिर रील्स पर शिकंजा और अब फेसबुक पेज तक को बैन कर देना। यह सिर्फ तकनीकी कार्रवाई नहीं है। यह एक संदेश है। जो पूछेगा वो बचेगा नहीं। लेकिन शायद सत्ता यह भूल रही है कि सवाल पूछना कोई जुर्म नहीं बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। हम डरने वालों में से नहीं हैं। हमें डराने की कोशिश जितनी तेज होगी हमारी आवाज उतनी ही बुलंद होगी। इतिहास गवाह है कि जब जब सत्ता ने डर का हथियार उठाया है तब तब समाज ने सवालों को और धारदार बनाया है। और आज भी वही हो रहा है। अगर सरकार सोचती है कि बैन करके दबाव बनाकर या आवाजों को बंद करके सच्चाई को छुपा लिया जाएगा तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है। क्योंकि सवाल बंद नहीं होते वह रास्ते बदल लेते हैं। वह चैनल से निकलकर सोशल मीडिया में आते हैं वहां से सड़कों पर उतरते हैं और फिर एक आंदोलन बन जाते हैं।

हम सवाल पूछते रहेंगे

आज 4पीएम नेटवर्क पर लगी पाबंदी सिर्फ एक संस्था की कहानी नहीं है। यह उस हर आवाज की कहानी है जो सच बोलने की हिम्मत रखती है। और हम साफ कह देना चाहते हैं कि हम डरेंगे नहीं, हम झुकेंगें नहीं? हम सच की राह पर चलते हुए सवाल पूछते रहेंगे।

सच के साथी संजय शर्मा

देश की लीजेंड राजनीतिक पर्सनालटी संजय राउत की किताब अनलाइकली पैराडाइज के लॉन्च में शामिल होना कोई साधारण घटना नहीं है। यह महज एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक राजनीतिक सामाजिक संकेत है। उस मंच पर खड़ा होना जहां कपिल सिब्बल, अरविंद केजरीवाल, डेरेक ओब्रायन और जया बच्चन जैसे दिग्गज मौजूद हों यह सिर्फ एक निमंत्रण नहीं यह एक ऐलान है। यह ऐलान है कि आवाजों को कैद नहीं किया जा सकता। यह जवाब है उन तमाम ताकतों के लिए जो यह मान बैठी हैं कि डर दिखाकर दबाव बनाकर और प्लेटफॉर्म छीनकर सच को खत्म किया जा सकता है। उन्हें समझ लेना चाहिए सच किसी सर्वर पर नहीं चलता सच किसी एक चैनल की मोहताज नहीं होता। सच वहां होता है जहां उसे कहने का साहस होता है। आज जब कुछ लोग यह सोच रहे हैं कि 4पीएम रुक गया है उन्हें यह समझ लेना चाहिए यह सिर्फ एक पड़ाव है अंत नहीं। यह एक नई शुरुआत है एक नए तेवर के साथ। 4पीएम रुका नहीं है और अब रुकेगा भी नहीं। सच यह है कि आवाजें बंद नहीं होतीं वह रूप बदलती हैं। जितना दबाओगे उतना उभरेंगी। जितना रोकने की कोशिश करोगे उतनी तेजी से फैलेंगी। आज उसी सच का एक और ठोस सबूत हमारे सामने खड़ा है एक मंच एक किताब और वह उपस्थिति जो किसी भी बैन से कहीं ज्यादा बड़ी है।

अपनी आवाज बुलंद रखेंगे

डर एक ऐसा हथियार है जिसे सत्ता बार बार इस्तेमाल करती है। लेकिन हर बार यह हथियार कामयाब नहीं होता। क्योंकि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो डर को चुनौती देते हैं। हम न पहले डरे थे न आज डर रहे हैं और न ही आगे डरेंगे। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ एक चैनल या एक पत्रकार की नहीं है यह लड़ाई सच और झूठ के बीच की है। अगर आज हम चुप हो गए तो कल सवाल पूछने का अधिकार ही खत्म हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि हम डटकर खड़े रहें अपनी आवाज बुलंद रखें और हर उस कोशिश का विरोध करें जो हमें डराने के लिए की जा रही है। और जब तक सवाल जिंदा हैं तब तक लोकतंत्र भी जिंदा रहेगा।

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