क्या से क्या हो गये देखते-देखते, शुभांकर मिश्रा का सेक्सी दवाइयों के बाद, कंडोम का इतिहास…

पत्रकारिता से कंडोम तक पहुंचा पॉडकास्ट. व्यूज की भूख ने बदल दिया एजेंडा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। शानदार पत्रकार कुछ व्यूज के लिए सेक्सी दवाइंयों का प्रचार करे और फिर कंडोम की स्टोरी बताए तो दुख तो होता ही है। जी हां शुभांकर मिश्रा अब नये अवतार में हैं और थोड़े से व्यूज और चेहरा चमकाने की ख्वाहिश ने उन्हें पत्रकारिता के निम्म स्तर पर पहुंचा दिया है। जिस जमाने में बेरोजगारी, महंगाई और गिरती अर्थव्यवस्था से आम जन परेशान है उसी जमाने में वह कंडोम की कहानी सुना रहे हैं और अपने पॉडकास्ट के जरिये सेक्सी दवाओं का प्रचार कर जेब गर्म कर रहे हैं।
शुभांकर मिश्रा के गिरते स्तर को देखकर यह कयास लगना मुश्किल है कि वह कहां पर जाकर रूकेंगे। एक दौर था जब कैमरा हाथ में आता था तो सत्ता से सवाल निकलते थे। बेरोजगारी पर सवाल महंगाई पर सवाल भ्रष्टाचार पर सवाल व्यवस्था पर सवाल और लोकतंत्र के बड़े मुद्दों पर बहस होती थी। फिर दौर बदला। टीवी से डिजिटल आया। डिजिटल से यूट्यूब आया। यूट्यूब से पॉडकास्ट आया और पॉडकास्ट के साथ आया व्यूज का गणित। अब सवाल यह नहीं कि खबर कितनी बड़ी है। सवाल यह हो गया है कि थंबनेल कितना बड़ा चलेगा इसी बदले हुए डिजिटल दौर में पत्रकार से कंटेंट क्रिएटर बनने की यात्रा करने वाले शुभांकर मिश्रा का नया कंटेंट बहस के घेरे में है। शुभाकंर मिश्रा के हालिया अपलोड वीडियो में वह कंडोम का इतिहास बता रहे हैं। शुभाकंर इस बातपर चर्चा कर रहे हैं कि वह पहना कैसे जाता था। वीडियो में उनके डायलाग उनकी स्क्रिप्ट यहां लिखने लायक नहीं है व्यूज के लिए व्यक्ति कितने घटिया स्तर तक उतर सकता है यह इस वीडियो में देखा जा सकता है।
अब सवाल यह है कि पत्रकारिता की प्राथमिकताएं आखिर बदल क्यों रही हैं। कंडोम का इतिहास जानना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। सेक्स एजुकेशन और रिप्रोडक्टिव हेल्थ जैसे विषय समाज के लिए जरूरी हैं। लेकिन जब कोई पत्रकार अपनी पहचान अपने पुराने पत्रकारिता प्रोफाइल और अपनी पहुंच के साथ ऐसा कंटेंट पेश करता है तो सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि यह पत्रकारिता है जानकारी है मनोरंजन है या वायरलिटी की रणनीति।

 

क्लिक का लालच

आज की डिजिटल दुनिया में एक बहुत खतरनाक बीमारी फैल चुकी है और वह है क्लिक का लालच। थंबनेल से सनसनी शीर्षक में उत्तेजना और वीडियो में ऐसा विषय जिसे देखते ही अंगूठा स्क्रीन पर रुक जाए फिर व्यूज आते हैं कमेंट आते हैं ट्रोल आते हैं और एल्गोरिद्म मुस्कुराता है लेकिन पत्रकारिता इस पूरी एक्सरसाइज पर सिवाए आंसू बहाने के कुछ नहीं कर सकती। शुभांकर मिश्रा का मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि वह कोई अनजान सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नहीं हैं। उनका चैनल राजनीति सामाजिक मुद्दों इंटरव्यू और विभिन्न समसामयिक विषयों पर लंबे समय से कंटेंट करता रहा है। सोचिए जो कभी भारत चीन पर बात करता था अब कांडोम का इतिहास बता रहा है।

असली सवाल कंडोम नहीं कंटेंट है

यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है कि कंडोम कोई प्रतिबंधित विषय नहीं है सेक्स एजुकेशन कोई गुनाह नहीं है रिप्रोडक्टिव हेल्थ पर बातचीत समाज के लिए जरूरी है स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर जागरूकता फैलाना भी पत्रकारिता और जनसंचार का हिस्सा हो सकता है लेकिन सवाल यह है कि विषय को किस संदर्भ में पेश किया गया अगर उद्देश्य स्वास्थ्य शिक्षा है तो उसके साथ वैज्ञानिक जानकारी होनी चाहिए अगर उद्देश्य इतिहास है तो उसके साथ इतिहास होना चाहिए अगर उद्देश्य जागरूकता है तो उसके साथ सार्वजनिक हित होना चाहिए लेकिन अगर उद्देश्य सिर्फ इतना है कि विषय का नाम सुनते ही दर्शक रुक जाए क्लिक करे और वीडियो चल पड़े तो सवाल बदल जाता है। फिर यह पत्रकारिता से ज्यादा कंटेंट इकोनॉमी का मामला बन जाता है। और यही वह जगह है जहां सोशल मीडिया पर शुभांकर मिश्रा की आलोचना हो रही है।

पत्रकार से कंटेंट क्रिएटर अब कंडोम का इतिहास

शुभांकर मिश्रा के नए पॉडकास्ट पर सोशल मीडिया में बहस तेज हो चुकी है। सवाल यह नहीं कि विषय गलत है सवाल यह कि पत्रकारिता की प्राथमिकता क्या है। पत्रकारिता और कंटेंट क्रिएशन के बीच की दीवार वैसे भी काफी पतली हो चुकी है। कैमरा वही है माइक्रोफोन वही है सामने बैठा इंसान वही है और स्क्रीन के दूसरी तरफ बैठा दर्शक भी वही है। लेकिन फर्क एक चीज ने पैदा किया है एल्गोरिद्म आज खबर की अहमियत कई बार उसके सामाजिक प्रभाव से नहीं उसके क्लिक की क्षमता से तय होने लगी है कितने लोग देखेंगे कितने लोग शेयर करेंगे कितने लोग कमेंट करेंगे कितने लोग विवाद करेंगे और सबसे बड़ा सवाल कितने लोग पहली पांच सेकेंड में वीडियो छोडक़र नहीं जाएंगे यही डिजिटल पत्रकारिता की नई चुनौती है और इसी चुनौती के बीच शुभांकर मिश्रा का नया कंटेंट सोशल मीडिया पर सवालों के घेरे में है। उनके वीडियो में कंडोम के इतिहास पर चर्चा की गई है। शुरुआत ही इस सवाल से होती है? कि पहला कंडोम कैसा था कहां था और कैसे इस्तेमाल होता था आइए जानते हैं। अब इसके बाद सोशल मीडिया ने अपना काम शुरू कर दिया। किसी ने इसे सूचना कहा किसी ने इसे गैरजरूरी बताया किसी ने सवाल किया कि पत्रकारिता की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए और किसी ने इसे महज व्यूज के लिए चुना गया विषय बताया।

तेज लहरों मेंउन्हें सीख मिलती है : राहुल गांधी

नेता प्रतिपक्ष के तैरने और उथल-पुथल का जिक्र करने वाले पोस्ट ने खींचा ध्यान
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक रहस्यमयी पोस्ट की। उन्होंने समुद्र की तेज लहरों में तैरने का जिक्रकरते हुए कहा कि इससे उन्हें सीख मिलती है कि उथल-पुथल भी एक तरह की शांति होती है। राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा, मुझे समुद्र में तब तैरना पसंद है, जब लहरें तेज हों। इससे यह सीख मिलती है कि उथल-पुथल भी शांति का ही एक रूप है।
राहुल गांधी ने इस पोस्ट में इसके पीछे कोई संदर्भ या वजह नहीं बताई। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक विवाद चल रहा है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से जुड़े फैसलों और आदेशों पर पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों का कहना था कि कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए या जारी किए गए। एसआईआर का देशव्यापी काम तीन सदस्यीय चुनाव आयोग की निगरानी में चल रहा है।
रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने और मतदाता सूची से जुड़े दूसरे मामलों को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र किया गया है।हालांकि, चुनाव आयोग ने शनिवार को कहा कि एसआईआर से जुड़े सभी फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे। राहुल गांधी इससे पहले चुनावों में कथित वोट चोरी का मुद्दा भी उठा चुके हैं। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं और कहा है कि सामने आई मीडिया रिपोर्टों से उनके आरोपों की पुष्टि हुई है। चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के इन आरोपों को खारिज किया है।

ज्ञानेश कुमार को लेकर राहुल गांधी के कई आरोप

इससे पहले राहुल गांधी ने एक खबर का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी आरोप लगाए थे। उन्होंने केरल कांग्रेस की एक पोस्ट साझा करते हुए दावा किया था कि केरल के पूर्व मुख्य सचिव जीजी थॉमसन के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार ने उनसे संपर्क किया था और उन्हें भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लडऩे तथा मंत्री पद दिलाने की पेशकश की थी। इस दावे पर ज्ञानेश कुमार की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।

दिल्ली व एनसीआर में रेप की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

शीर्ष अदालत ने लिया स्वत: संज्ञान लिया
कहा -इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के आस्था कुंज में गैंगरेप की घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि इन घटनाओं से 2012 के निर्भया कांड की दर्दनाक समानताएं सामने आती हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि ये घटनाएं कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों की विफलता को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं।
गौरतलब है कि दिल्ली के आस्था कुंज में एक नाबालिग के साथ गैंगरेप की घटना के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हुए थे।कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर की रेप की घटनाओं पर कहा कि सार्वजनिक स्थानों, जिनमें पार्क और बसें शामिल हैं वहां रोशनी की अपर्याप्त व्यवस्था, कमजोर निगरानी और अन्य प्रशासनिक सुविधाओं की कमी के कारण उच्च जोखिम वाले क्षेत्र बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि केवल एकजुटता व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है।। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये जरूरी है कि इस मामले में आवश्यक जवाबदेही तय की जाए। कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान का मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया। गौरतलब है कि राजधानी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म के मामला सामने आया था। इसमें मामले में गिरफ्तार आसिफ, हेमंत और मुकेश को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। गौरतलब है कि अगस्त में भी दिल्ली-एनसीआर में चलती बस में एक नाबालिग से रेप की घटना हुई थी। करीब 47 किलोमीटर तक चलती बस के दौरान लडक़ी से रेप किया गया। इस दौरान न तो पुलिस की नजर पड़ी न ही बस को किसी नाके पर रोका गया।
पुलिस ने बताया था कि ये घटना 4 अगस्त को ग्रेटर नोएडा में परी चौक के पास हुई थी। पीडि़ता ने शिकायत में आरोप लगाया था कि दो आरोपियों ने उसके साथ यौन उत्पीडऩ किया और विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी. बाद में उन्होंने लडक़ी को दिल्ली में कश्मीरी गेट के पास छोड़ दिया। आरोपियों की पहचान ड्राइवर कुलदीप और कंडक्टर संदीप के तौर पर हुई थी। पुलिस ने दोनों को तिमारपुर के एक पार्किंग एरिया से गिरफ्तार कर लिया था।

यूपीआई से पेमेंट देने वालों को राहत नहीं

सुप्रीम कोर्ट का केंद्र के फैसले पर रोक लगाने से इनकार
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसके तहत 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से ज्यादा के कुछ खास यूपीआई पर्सन-टू-मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाया जाना है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दो हजार से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर लगाने को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र और अन्य से जवाब मांगा है। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि गेटवे का इस्तेमाल करने वाले 96 प्रतिशत लोग इससे छूट प्राप्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला कानूनी से ज्यादा तकनीकी है और केंद्र व अन्य को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया।

92 गवाह मुकर गए तो निष्पक्ष सुनवाई कैसे हुई : सुप्रीम कोर्ट

सोहराबुद्दीन केस में बरी आरोपियों और सीबाआई को नोटिस

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी एनकाउंटर मामले में 21 पुलिसकर्मियों सहित 22 आरोपियों को बरी करने के बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई हुई। अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने ष्टक्चढ्ढ और हाई कोर्ट से बरी किए गए 22 आरोपियों को नोटिस जारी किया है।
28 अक्टूबर को इस मामले पर अगली सुनवाई होगी। सोहराबुद्दीन शेख के भाई रूबाबुद्दीन शेख ने बाम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। 92 गवाहों के मुकरने पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। सीजेआई ने का, वह कुछ महत्वपूर्ण गवाहों के बयानों की जांच करना चाहते हैं। पूरे रिकॉर्ड को तलब नहीं किया जा रहा है, बल्कि संबंधित पक्ष 3-4 ऐसे गवाहों के बयान पेश करें, जिन्हें वे सबसे अहम मानते हैं। कोर्ट आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले की जांच करेगी। हालांकि, आदेश के एक हिस्से, विशेष रूप से पैराग्राम 43 की समीक्षा अदालत नहीं करेगी। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने 92 गवाहों के मुकरने को गंभीर चिंता का विषय बताया।
उन्होंने कहा कि यह भी विचारणीय है कि मामले में निष्पक्ष और न्यायपूर्ण सुनवाई हुई थी या नहीं। सीजेआई ने कहा कि अदालत इस मामले में सीमित रिकॉर्ड के आधार पर अहम पहलुओं की जांच करेगी और सभी दस्तावेजों को तलब करने की बजाय जरूरी गवाहों के बयानों पर ध्यान देगी।

पिछले साल हाई कोर्ट ने दिखाई थी हरी झंडी

7 मई 2026 को बाम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। बाम्बे हाईकोर्ट कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा कुल 22 आरोपियों की रिहाई को सही ठहराया है। आरोप है कि साल 2005 में गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख और पत्नी कौसर बी को फर्जी एनकाउंटर मे पुलिस ने मार दिया था। सीबीआई कोर्ट ने दिसंबर 2018 में सबूतो के अभाव मे आरोपियों को बरी कर दिया था।

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