कानूनी शिक्षाविदों की SC में नियुक्ति क्यों अटकी? सुप्रीम कोर्ट के जज ने उठाया सवाल
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 124(3)(c) के तहत 'प्रतिष्ठित विधिवेत्ता' को जज नियुक्त करने के प्रावधान के 76 साल से निष्क्रिय रहने पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि यह अफसोस की बात है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 124(3)(c) के तहत ‘प्रतिष्ठित विधिवेत्ता’ को जज नियुक्त करने के प्रावधान के 76 साल से निष्क्रिय रहने पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि यह अफसोस की बात है.
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने संविधान के एक ऐसे प्रावधान पर सवाल उठाया है, जिसका पिछले 76 साल से इस्तेमाल नहीं हुआ.
उन्होंने कहा कि संविधान में Distinguished Jurist यानी प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने का प्रावधान मौजूद है, लेकिन संविधान लागू होने के 76 साल से ज्यादा समय बाद भी इसका इस्तेमाल नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि यह अफसोस की बात है कि संविधान का यह प्रावधान अब तक निष्क्रिय बना हुआ है.
उन्होंने कहा कि देश में संविधान को लागू हुए 76 साल से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन अब तक सुप्रीम कोर्ट में किसी भी कानून के जानकार (ज्यूरिस्ट) को नियुक्त नहीं किया गया है. उन्होंने कहा कि या तो पहले केंद्र सरकार या बाद में कॉलेजियम को भारतीय एकेडमिक जगत की गहराई पर भरोसा नहीं था या फिर उन्होंने अब तक आर्टिकल 124(3) पर गंभीरता से विचार नहीं किया है.
संविधान के अनुच्छेद 124(3) में है प्रावधान
रविवार (30 अगस्त) को दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एलएलएम कार्यक्रम के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 124(3) में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान है कि राष्ट्रपति की राय में किसी प्रतिष्ठित न्यायविद को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है. फिर भी, उन्होंने कहा कि अब तक किसी भी कानून विद्वान को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त नहीं किया गया है.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 124(3)(c) में ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त करने का प्रावधान है, जो राष्ट्रपति की नजर में एक ‘विशिष्ट विधिवेत्ता’ हो.
इसके बावजूद संविधान लागू होने के 76 साल से अधिक समय में सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ हाईकोर्ट के जजों या प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के रास्ते ही नियुक्तियां हुई हैं. उन्होंने कहा कि यह बेहद अफसोस की बात है कि संविधान का यह प्रावधान अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया.
जस्टिस भुइयां ने बातए दो कारण
जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि संविधान के इस प्रावधान के अब तक इस्तेमाल नहीं होने के पीछे दो संभावित कारण हो सकते हैं. पहला, केंद्र सरकार और कॉलेजियम को लगता हो कि भारतीय अकादमिक क्षेत्र में ऐसे पर्याप्त गहरे और योग्य विशेषज्ञ नहीं हैं,
जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज पद के लिए गंभीरता से विचार किया जा सके और दूसरा, हो सकता है कि केंद्र और कॉलेजियम ने अब तक इस संवैधानिक प्रावधान को गंभीरता से तलाशा ही न हो. उन्होंने कहा कि इन दोनों में से जो भी कारण हो, इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.
कोर्ट में अनुभव के तर्क को किया खारिज
जस्टिस भुइयां ने उस तर्क को भी खारिज किया कि किसी कानून के प्रोफेसर या शिक्षाविद के पास अदालत में व्यावहारिक काम का पर्याप्त अनुभव नहीं होता. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ देश की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था नहीं है. यह भारत की कानूनी, संवैधानिक और नैतिक चेतना का महत्वपूर्ण संरक्षक भी है.
इसलिए बेंच में अलग तरह की विशेषज्ञता रखने वाले लोगों की मौजूदगी उपयोगी हो सकती है. उनके मुताबिक प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ अपनी अकादमिक समझ की वजस से केवल तकनीकी कानूनी पेचीदगियों तक सीमित नहीं रहेंगे. सार्वजनिक कानून और संवैधानिक सवालों को व्यापक नजरिए से समझने में उनकी विशेषज्ञता कोर्ट के लिए उपयोगी साबित हो सकती है.
अन्य देशों का दिया उदाहरण
जस्टिस भुइयां ने यह भी स्पष्ट किया कि Distinguished Jurist की कोई एक तय और संकीर्ण परिभाषा नहीं है. इसका दायरा कानून की प्रैक्टिस, अध्यापन और शोध से जुड़े प्रतिष्ठित लोगों तक हो सकता है. उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ मानने के लिए उसका कोर्ट में में नियमित तौर पर वकालत करना जरूरी नहीं होना चाहिए.
इस दौरान उन्होंने दूसरे देशों की न्यायिक व्यवस्था का उदाहरण भी दिया. उन्होंने बताया कि अमेरिका में संघीय अदालत का जज बनने के लिए औपचारिक लॉ डिग्री की शर्त भी उसी तरह नहीं है जैसी भारत में दिखाई देती है.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट देश की नैतिक, कानूनी और संवैधानिक चेतना का संरक्षक है. ऐसे में कोर्ट को केवल तकनीकी कानूनी पहलुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका, बार और कानून के अकादमिक क्षेत्र में भारत की वास्तविक विविधता दिखाई देनी चाहिए.
उनके मुताबिक, ‘विशिष्ट विधिवेत्ता’ को सुप्रीम कोर्ट में शामिल करने के पीछे भी यही सोच थी कि प्रतिभाशाली और विद्वान लोगों को न्यायपालिका में जगह मिले. उन्होंने कहा कि अपनी अकादमिक विशेषज्ञता के कारण ऐसे विद्वान संकीर्ण कानूनी तकनीकीताओं से आगे जाकर जनहित और संवैधानिक कानून से जुड़े बड़े सवालों पर बेहतर योगदान दे सकते हैं.
‘प्रोफेसर का न्यायिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है’
उन्होंने कहा कि यह राय भी सामने आती रही है कि किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर का न्यायिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है और उन्हें इस विचार से असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखता. उन्होंने कहा कि किसी विशिष्ट विधिवेत्ता की विद्वता सुप्रीम कोर्ट की बेंच के लिए ‘बहुत बड़ा मूल्यवर्धन’ हो सकती है. अपनी गहरी कानूनी समझ और शोध के जरिए ऐसा व्यक्ति शीर्ष स्तर पर न्यायिक फैसलों की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है.
उनकी टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है जब देश में न्यायिक नियुक्तियों, कॉलेजियम और न्यायपालिका में अलग-अलग तरह की विशेषज्ञता के प्रतिनिधित्व पर चर्चा होती रहती है.फिलहाल जस्टिस भुइयां ने किसी विशेष व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की बात नहीं कही है.
उनका जोर इस बात पर है कि संविधान ने जो रास्ता पहले से खोल रखा है, उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए. अगर कभी इस प्रावधान का इस्तेमाल होता है, तो इससे सुप्रीम कोर्ट की बेंच में अकादमिक कानून विशेषज्ञता के लिए भी एक नया रास्ता खुल सकता है.



