महिला को डायन बताकर की हत्या, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सजा रहेगी बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने डायन बताकर महिला की हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा बरकरार रखी. कोर्ट ने कहा कि अंधविश्वास के आगे कानून और सांविधानिक मूल्यों को कमजोर नहीं पड़ने दिया जा सकता.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने डायन बताकर महिला की हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा बरकरार रखी. कोर्ट ने कहा कि अंधविश्वास के आगे कानून और सांविधानिक मूल्यों को कमजोर नहीं पड़ने दिया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर डायन बताकर महिलाओं को प्रताड़ित करने जैसी कुप्रथाएं कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों के बावजूद जारी रहीं तो संवैधानिक लोकतंत्र कायम नहीं रह सकता. शीर्ष अदालत ने एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी.
ओडिशा में वर्ष 1998 में दोषी ने एक सह-आरोपी के साथ मिलकर एक महिला को उसके घर से घसीटकर बाहर निकाला और उस पर डायन होने का आरोप लगाते हुए उसे बेरहमी से पीटा. इस हमले में महिला की मौत हो गई थी.
‘कोर्ट की अंतरात्मा को गहराई से झकझोर दिया’
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई पूरी करते हुए हम सिर्फ इतना कहना चाहेंगे कि इस मामले के तथ्यों ने इस कोर्ट की अंतरात्मा को गहराई से झकझोर दिया है. एक असहाय महिला को डायन बताया गया और उसकी बेटी पर उस घटना का क्या असर हुआ होगा, जिसने अपनी मां को बेहद क्रूर तरीके से मारे जाते हुए देखा, यह बेहद पीड़ादायक है.
महिलाओं को प्रताड़ित करने की कुप्रथाएं
पीठ ने कहा कि भारत के संविधान में ऐसे समाज की परिकल्पना की गई है, जो समानता, बंधुत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सिद्धांतों पर आधारित हो तथा महिलाओं के प्रति अपमानजनक किसी भी प्रथा को त्याग दिया जाए. पीठ ने कहा कि इसके बावजूद समाज के कुछ वर्गों में डायन बताकर महिलाओं को प्रताड़ित करने जैसी कुप्रथाएं अब भी जारी हैं.
लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं रह सकती कायम
पीठ ने कहा कि हमारे जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था कायम नहीं रह सकती, जहां इस तरह की अपमानजनक कुप्रथाएं कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों से बचती रहें. पीठ ने कहा कि न्यायालय को पूरी उम्मीद है कि मौजूदा मामला इस बात की गंभीर याद दिलाएगा कि अंधविश्वास और तर्कहीन मान्यताओं पर हमेशा न्याय की जीत होनी चाहिए.
ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले को दी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला बालकू ओराम की अपील पर सुनाया. ओराम ने सितंबर 2022 में ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती दी थी. हाईकोर्ट ने अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अपीलकर्ता को दोषी ठहराए जाने और उम्रकैद की सजा दिए जाने के फैसले को बरकरार रखा था.



