आया नया मोर्चा, हिल जाएगी मोदी सरकार की चूलें!

शिक्षा मंत्री का इस्तीफा या देशव्यापी बगावत?

  • कॉकरोच की पहली अग्निपरीक्षा
  • आंदोलन सिर्फ सोशल मीडिया की हलचल है या फिर बड़े आंदोलन की दस्तक

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। देश की राजनीति में कई आंदोलन हुए कई नारों ने सुर्खियां बटोरीं लेकिन क्या कोई ऐसा आंदोलन भी हो सकता है जो सीधे देश के करोड़ों युवाओं के गुस्से को राजनीतिक चुनौती में बदल दे? यही सवाल आज सत्ता के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया के रणक्षेत्र तक गूंज रहा है। नीट पेपर लीक का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा कि कॉकरोच आंदोलन ने सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। सोशल मीडिया के जरिये वजूद में आयी कॉकरोच जनता पार्टी का अल्टीमेटम साफ है अगर 5 जून की शाम तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते है तो 6 जून से देशव्यापी विरोध का बिगुल बज जाएगा। सोनम वांगचुक के सोशल मीडिया पर तैरते वीडियो कुछ इस तरह का संदेश दे रहे हैं। यह सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे की मांग नहीं है। यह उस व्यवस्था के खिलाफ उभरता हुआ आक्रोश है जिस पर लाखों छात्रों के सपनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। सवाल यह है कि जब देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक नीट का प्रश्नपत्र लीक हो सकता है तब युवा आखिर किस व्यवस्था पर भरोसा करें?

मंच के पीछे खड़ी है करोड़ों युवाओं की नाराजगी?

कॉकरोच आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका प्रतीकवाद है। दावा किया जा रहा है कि देश के करोड़ों युवाओं की नाराजगी इस मंच के पीछे खड़ी है। संकेत मिल रहे है कि सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधार की आवाज माने जाने वाले सोनम वांगचुक इस आंदोलन से खुलकर जुड़ रहे हैं यदि ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक परीक्षा घोटाले का विरोध नहीं रहेगा बल्कि जवाबदेही बनाम सत्ता का बड़ा संघर्ष बन सकता है। दिलचस्प बात यह भी है कि पिछले एक साल में रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों ने लगातार सरकार को घेरा है। ऐसे में अगर यह आंदोलन सड़कों पर उतरता है तो इसका राजनीतिक असर केवल शिक्षा मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगा। मोदी सरकार के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष नहीं है। चुनौती उस युवा वर्ग की नाराजगी है जिसने कभी बड़े सपने और बड़ी उम्मीदें लेकर व्यवस्था पर भरोसा किया था। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार समय रहते इस गुस्से को सुन पाएगी या फिर यह असंतोष एक बड़े राजनीतिक विस्फोट में बदल जाएगा। आने वाले कुछ घंटे तय करेंगे कि यह केवल सोशल मीडिया की हलचल है या फिर भारतीय राजनीति के अगले बड़े आंदोलन की दस्तक।

45 बड़े पेपर लीक कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति

अब तक दर्जनों बड़े पेपर लीक मामले सामने आये हैं। रिकॉर्ड बताता है कि सिस्टम की नाकामी बार-बार सामने आयी लेकिन जवाबदेही का दायरा सिर्फ निचले स्तर तक ही सीमित रहा। कुछ अधिकारियों को हटाया गया, कुछ के खिलाफ जांच शुरू हुई लेकिन बहुत कम मामलों में ऐसी सख्त कार्रवाई देखने को मिली जिसने भविष्य के लिए मिसाल कायम की हो। 2024 का यूजीसी नीट पेपर लीक हो, यूपीपीएससी आरओ एआरओ परीक्षा विवाद हो या फिर यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा का मामला। हर जगह एक जैसी कहानी दिखायी दी। परीक्षा रद्द हुई, लाखों अभ्यर्थियों को दोबारा तैयारी करनी पड़ी सरकारों पर सवाल उठे और संबंधित अधिकारियों को हटाने या जांच के दायरे में लाने की कार्रवाई हुई। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल पद से हटाना ही पर्याप्त सजा है? बिहार पुलिस कांस्टेबल भर्ती से लेकर राजस्थान लोक सेवा आयोग और उससे पहले के कई चर्चित मामलों तक देखें तो एक पैटर्न साफ नजर आता है। पेपर लीक कोई एक दिन की घटना नहीं होती। इसके पीछे पूरा नेटवर्क, अंदरूनी मिलीभगत, तकनीकी खामियां और प्रशासनिक लापरवाही काम करती है। इसके बावजूद अक्सर कार्रवाई का फोकस कुछ व्यक्तियों तक सीमित रह जाता है जबकि व्यवस्था की खामियां जस की तस बनी रहती हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हर पेपर लीक के बाद सरकारें जीरो टॉलरेंस की बात करती हैं लेकिन कुछ महीनों बाद कोई नया भर्ती घोटाला या परीक्षा विवाद फिर सुर्खियों में आ जाता है। इसका मतलब साफ है कि बीमारी की जड़ अभी भी बची हुई है।

राहुल की भविष्यवाणी क्या सचमुच मोदी युग ढलान पर है?

राजनीति में भविष्यवाणियां नई बात नहीं हैं। लेकिन जब विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा यह कहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सूर्य अस्त होने की ओर है और वह सत्ता की कुर्सी छोडऩे को मजबूर हो सकते हैं तो बयान केवल बयान नहीं रह जाता वह राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाता है। राहुल गांधी पिछले कुछ समय से लगातार दावा कर रहे हैं कि देश में बदलाव की लहर बन रही है। उनका तर्क है कि बेरोजगारी, महंगाई, भर्ती घोटाले, पेपर लीक, किसानों की नाराजगी और आर्थिक असंतोष धीरे-धीरे सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी बनते जा रहे हैं। राहुल का मानना है कि जनता के भीतर जमा हो रहा यह असंतोष आने वाले समय में राजनीतिक रूप से विस्फोटक साबित हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। नरेंद्र मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। भाजपा केंद्र में लगातार तीसरे कार्यकाल में है और कई राज्यों में उसकी मजबूत राजनीतिक पकड़ कायम है। फिर भी राहुल गांधी की बातों को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं है। इतिहास गवाह है कि कई बार सत्ता का सबसे मजबूत किला भी जनता के मूड बदलने पर अचानक हिल जाता है। 1977 में इंदिरा गांधी की हार हो या 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का अप्रत्याशित पतन, भारतीय राजनीति ने कई बार बड़े-बड़े पूर्वानुमानों को गलत साबित किया है। यही वजह है कि राहुल गांधी की भविष्यवाणी को केवल विपक्षी बयान कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। असली सवाल यह नहीं है कि मोदी कुर्सी छोड़ेंगे या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या सरकार उन मुद्दों का समाधान कर पाएगी जो युवाओं, किसानों और मध्यम वर्ग के भीतर असंतोष पैदा कर रहे हैं। क्योंकि लोकतंत्र में सिंहासन चुनाव जीतने से मिलता है, लेकिन उसे बचाए रखने के लिए जनता का भरोसा जीतते रहना पड़ता है। और राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि यहां कोई भी कुर्सी स्थायी नहीं होती।

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