ऑर्थोपेडिक्स में नवाचार की ओर बढ़ते कदम, PGICL-2026 में विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

दो दिवसीय इस शैक्षणिक कार्यक्रम का उद्देश्य केवल परीक्षा की तैयारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रतिभागियों में बेहतर क्लीनिकल सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मरीजों के उपचार में व्यावहारिक निर्णय क्षमता विकसित करना भी रहा।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: उत्तर प्रदेश ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन (UPOA) के तत्वावधान में आयोजित पोस्ट ग्रेजुएट इंस्ट्रक्शनल कोर्स इन ऑर्थोपेडिक्स (PGICL-2026) का दूसरा एवं अंतिम दिन क्लीनिकल ऑर्थोपेडिक्स, शोध, रेडियोलॉजी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी आधुनिक तकनीकों पर केंद्रित रहा।

देश के विभिन्न राज्यों से आए वरिष्ठ अस्थिरोग विशेषज्ञों ने पोस्टग्रेजुएट विद्यार्थियों और युवा ऑर्थोपेडिक चिकित्सकों को जटिल रोगों के क्लीनिकल परीक्षण, केस आधारित शिक्षण, अनुसंधान की नई संभावनाओं तथा आधुनिक तकनीकों के प्रभावी उपयोग की विस्तृत जानकारी दी।

दो दिवसीय इस शैक्षणिक कार्यक्रम का उद्देश्य केवल परीक्षा की तैयारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रतिभागियों में बेहतर क्लीनिकल सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मरीजों के उपचार में व्यावहारिक निर्णय क्षमता विकसित करना भी रहा। कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों से आए युवा चिकित्सकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

क्लीनिकल केस प्रेजेंटेशन से हुई वैज्ञानिक सत्र की शुरुआत

दूसरे दिन के वैज्ञानिक सत्र की शुरुआत हिप के लॉन्ग केस प्रेजेंटेशन से हुई। इस दौरान वरिष्ठ विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को मरीज के इतिहास, शारीरिक परीक्षण, रेडियोलॉजिकल मूल्यांकन तथा उपचार की सही रणनीति तैयार करने के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया।

इस सत्र में डॉ. रवि मित्तल, डॉ. नरेन्द्र सिंह कुशवाहा, डॉ. रजनींद कुमार और डॉ. पवन प्रधान ने विस्तार से बताया कि किसी भी जटिल ऑर्थोपेडिक केस में क्लीनिकल निर्णय क्षमता किस प्रकार विकसित की जा सकती है। उन्होंने वास्तविक मरीजों के उदाहरणों के माध्यम से बताया कि सही निदान केवल जांच रिपोर्टों पर नहीं, बल्कि व्यवस्थित क्लीनिकल परीक्षण और अनुभव पर आधारित होता है।

इसके बाद शोल्डर केस के एप्रोचनॉन-यूनियन फ्रैक्चर के मूल्यांकन तथा विभिन्न शॉर्ट केस प्रेजेंटेशन आयोजित किए गए। विशेषज्ञों ने बताया कि कठिन मामलों में चरणबद्ध तरीके से जांच और उपचार की योजना बनाना मरीज के बेहतर परिणामों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

केस आधारित शिक्षण से मिली व्यावहारिक जानकारी

दूसरे शैक्षणिक सत्र में प्रतिभागियों को विभिन्न जटिल अस्थिरोग संबंधी रोगों पर केस आधारित शिक्षण दिया गया। इसमें क्लब फुट (CTEV), एल्बो की समस्याएं, बोनी स्वेलिंग, बोन ट्यूमर तथा क्रॉनिक ऑस्टियोमायलाइटिस जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे।

विशेषज्ञों ने प्रत्येक केस की विस्तृत चर्चा करते हुए रोग की पहचान, आवश्यक जांच, डिफरेंशियल डायग्नोसिस और उपचार की आधुनिक पद्धतियों को समझाया। सत्र के दौरान युवा चिकित्सकों ने विशेषज्ञों से कई प्रश्न पूछे, जिनका विस्तार से उत्तर देते हुए अनुभवी डॉक्टरों ने अपने वर्षों के व्यावहारिक अनुभव साझा किए।

प्रतिभागियों ने इस इंटरैक्टिव सत्र को विशेष रूप से उपयोगी बताया, क्योंकि इसमें केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं बल्कि वास्तविक क्लीनिकल परिस्थितियों में निर्णय लेने की प्रक्रिया भी समझाई गई।

ऑर्थोसिस, प्रोस्थेसिस और इम्प्लांट्स के सुरक्षित उपयोग पर विशेष चर्चा

कार्यक्रम के दौरान ऑर्थोपेडिक उपचार में उपयोग होने वाले ऑर्थोसिस एवं प्रोस्थेसिस, विभिन्न ऑर्थोपेडिक इंस्ट्रूमेंट्स तथा इम्प्लांट्स के सुरक्षित और उचित चयन पर भी विशेषज्ञों ने विस्तृत व्याख्यान दिए।

उन्होंने बताया कि सही मरीज के लिए सही इम्प्लांट का चयन उपचार की सफलता का महत्वपूर्ण आधार है। साथ ही आधुनिक उपकरणों के सुरक्षित उपयोग, उनकी गुणवत्ता और ऑपरेशन के दौरान सावधानियों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

रेडियोलॉजी, रिसर्च और एआई पर रहा अंतिम शैक्षणिक सत्र का फोकस

कार्यक्रम के अंतिम शैक्षणिक सत्र में ऑर्थोपेडिक्स में रेडियोलॉजी की भूमिकाशोध एवं रिसर्च की संभावनाएं तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) और अन्य आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर विशेषज्ञों ने व्याख्यान दिए।

वक्ताओं ने कहा कि आने वाले समय में एआई आधारित तकनीकें रोगों के निदान, उपचार योजना तैयार करने और मेडिकल रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आधुनिक तकनीक केवल चिकित्सक की सहायता कर सकती है, लेकिन बेहतर क्लीनिकल निर्णय के लिए डॉक्टर की समझ और अनुभव सबसे महत्वपूर्ण रहेगा।

विशेषज्ञों ने युवा चिकित्सकों को शोध कार्यों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि वैज्ञानिक सोच और अनुसंधान की संस्कृति विकसित किए बिना चिकित्सा विज्ञान में निरंतर प्रगति संभव नहीं है।

युवा डॉक्टरों में बेहतर क्लीनिकल सोच विकसित करना है उद्देश्य

कार्यक्रम के आयोजन अध्यक्ष प्रो. डॉ. अमित मिश्रा ने कहा कि पीजीआईसीएल-2026 का उद्देश्य केवल पोस्टग्रेजुएट विद्यार्थियों को परीक्षा की तैयारी कराना नहीं है, बल्कि उनमें ऐसी क्लीनिकल सोच विकसित करना है जिससे वे भविष्य में बेहतर और आत्मविश्वास के साथ मरीजों का उपचार कर सकें।

उन्होंने कहा कि दो दिवसीय इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को देश के अग्रणी ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों से सीधे सीखने का अवसर मिला, जिससे उनके ज्ञान और व्यावहारिक कौशल दोनों में वृद्धि होगी।

विभिन्न राज्यों से पहुंचे युवा चिकित्सकों ने लिया प्रशिक्षण

आयोजन सचिव डॉ. अतिल कुमार लाल ने बताया कि उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए पोस्टग्रेजुएट विद्यार्थियों और युवा चिकित्सकों ने पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम में भाग लिया।

उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के फैकल्टी सदस्यों, प्रतिभागियों, आयोजन समिति और सहयोगी संस्थाओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भविष्य में भी इसी प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि युवा डॉक्टरों को नवीनतम चिकित्सा तकनीकों और शोध गतिविधियों से लगातार जोड़ा जा सके।

वैलेडिक्टरी समारोह के साथ हुआ समापन

दो दिवसीय पोस्ट ग्रेजुएट इंस्ट्रक्शनल कोर्स इन ऑर्थोपेडिक्स (PGICL-2026) का समापन वैलेडिक्टरी समारोहसमूह छायाचित्र और वोट ऑफ थैंक्स के साथ हुआ। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने आयोजन को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम उनके क्लीनिकल कौशल और पेशेवर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इस अवसर पर देशभर से आए वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ, मेडिकल शिक्षक, पोस्टग्रेजुएट विद्यार्थी, युवा चिकित्सक तथा आयोजन समिति के सदस्य उपस्थित रहे।
रिपोर्ट- अमरेंद्र पांडेय, गोरखपुर

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