12 सितंबर तक मांगें नहीं मानीं तो मुंबई कूच करेंगे मनोज जरांगे, इस ऐलान से सरकार परेशान
महाराष्ट्र का सियासी पारा एक बार फिर सातवें आसमान पर है। एक तरफ जहां विपक्ष लगातार बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्ट्राचार पर सवाल उठा रहा है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र का सियासी पारा एक बार फिर सातवें आसमान पर है। एक तरफ जहां विपक्ष लगातार बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्ट्राचार पर सवाल उठा रहा है।
राज्य की बदहाल व्यवस्था पर सवालों के घेरे में फंसी फडणवीस सरकार पर अब एक और मुसीबत आन पड़ी है। दरअसल महाराष्ट्र में एक बार फिर मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से पहले से चिन्हित 58 लाख कुनबी रिकॉर्ड के आधार पर मराठा समुदाय के लोगों को तुरंत जाति प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की।
मनोज जरांगे पाटील ने महाराष्ट्र सरकार को एक सख्त अल्टीमेटम दे दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर आगामी 12 सितंबर तक मराठा समाज की मांगें पूरी नहीं हुईं तो पूरा मराठा समुदाय मुंबई की ओर कूच करेगा। यह अल्टीमेटम देवेंद्र फडणवीस की महायुति सरकार के लिए बड़ा दबाव बनाने वाला है। जरांगे ने अपने गांव अंतरवाली सराटी में निर्णायक अनशन शुरू किया है और इसे अंतिम लड़ाई बताया है।
मराठा आरक्षण का मुद्दा महाराष्ट्र में कई सालों से चल रहा है। मराठा समाज राज्य की सबसे बड़ी जातियों में से एक है। वे कहते हैं कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में उन्हें उचित हिस्सा नहीं मिल रहा। कई मराठा परिवार गरीब हैं, खेती पर निर्भर हैं और युवाओं को अच्छी नौकरी नहीं मिल पा रही।
जरांगे की मुख्य मांग है कि 58 लाख मराठों को कुणबी प्रमाणपत्र दिए जाएं। कुणबी ओबीसी श्रेणी में आता है। अगर मराठाओं को कुणबी मान लिया जाए तो वे ओबीसी आरक्षण का फायदा ले सकेंगे। जरांगे कहते हैं कि पुराने गजट और सरकारी दस्तावेजों में ये नोंदें पहले से मौजूद हैं। हैदराबाद गजट, सातारा, कोल्हापुर, औंध और पुणे के गजट को लागू करने की मांग भी है।
फडणवीस सरकार पहले भी कई बार आश्वासन दे चुकी है। कुछ मांगें मानने का वादा किया गया था। जैसे आंदोलन में शहीद हुए लोगों के परिवारों को मदद, कुछ मामलों को वापस लेना और प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया तेज करना। लेकिन जरांगे का आरोप है कि सरकार सिर्फ समय गंवा रही है। प्रमाणपत्र नहीं दिए जा रहे, प्रक्रिया अधूरी है और युवा बेरोजगार बैठे हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर सवाल हल नहीं हुए तो मराठों को मुंबई से वापस नहीं ला पाएंगे और खुद भी वापस नहीं आएंगे।
यह अल्टीमेटम फडणवीस सरकार को घेरने वाला है। मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है, व्यापार का केंद्र है। अगर हजारों-लाखों मराठा मुंबई पहुंच गए तो शहर की रफ्तार थम सकती है। ट्रैफिक जाम, दैनिक जीवन प्रभावित, पुलिस व्यवस्था पर बोझ—ये सब सरकार के लिए सिरदर्द बन सकते हैं।
पहले भी जरांगे मुंबई के आजाद मैदान पर अनशन कर चुके हैं। तब हाईकोर्ट को दखल देना पड़ा था। सड़कें खाली करने के आदेश दिए गए थे। अब फिर मुंबई कूच की बात हो रही है तो सरकार को गंभीर होना पड़ेगा।
महाराष्ट्र में चल रहे मराठा आरक्षण की मांग को लेकर नेताओं की भी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। इसी बीच मराठा आरक्षण के मुद्दे पर शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कहा, “मराठा समाज के नौजवानों को OBC के तहत आरक्षण मिलना चाहिए, हमारी सरकार इस बात से सहमत है।
जिन मराठा बच्चों के परिवार के नाम OBC की लिस्ट में है, उन सभी को आरक्षण मिल रहा है। जब सरकार एक बार फैसला ले चुकी है तो निश्चित तौर पर सरकारी कर्मचारियों के स्तर पर कुछ देरी हो रही होगी। हमने कई सारे बच्चों के आरक्षण दे दिया है, इसमें कोई शक नहीं है।
बीते रोज जब जरंगे ने आंदोलन शुरू किया तो जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में पत्रकारों से बातचीत में जरांगे ने कहा कि यह उनका अंतिम आंदोलन होगा। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर मराठा समुदाय के प्रति दुश्मनी रखने का आरोप लगाया।
उन्होंने दावा किया कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे उन्हें चुपचाप समर्थन दे रहे हैं। मनोज जरांगे ने जाति सत्यापन समिति को खत्म करने की भी मांग की। साथ ही चेतावनी दी कि अगर सरकार आरक्षण से जुड़े सभी लंबित मुद्दों का समाधान नहीं करती है तो वह मुंबई में मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘वर्षा’ की ओर मार्च करेंगे।
इतना ही नहीं उनका गुस्सा सीएम फडणवीस पर भी जमकर फूटा। उन्होंने करारा हमला बोलता हुए फडणवीस को दुश्मन बताया। मनोज जरांगे ने कहा कि ”देवेंद्र फडणवीस जानबूझकर मराठा समुदाय के प्रति दुश्मनी रख रहे हैं और एकनाथ शिंदे सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट के जरिए उन्हें गुप्त समर्थन दे रहे हैं।
अगर वे हमारे मुद्दों का समाधान नहीं करते हैं तो हम मुंबई में मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘वर्षा’ की ओर मार्च करेंगे। अगर सरकार का प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए आता है तो हम उससे बात करेंगे, लेकिन उसे ठोस समाधान के साथ आना होगा।”
जरांगे ने मराठा समुदाय के पात्र लोगों को कुनबी के रूप में मान्यता देने की मांग को लेकर कई आंदोलन किए हैं। कुनबी एक कृषि समुदाय है, जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता है। उन्होंने कहा, ”सरकार को 58 लाख कुनबी रिकॉर्ड के आधार पर मराठा समुदाय के लोगों को तुरंत जाति प्रमाणपत्र जारी करने चाहिए।
Jसमुदाय सरकार को इसके लिए अब और समय नहीं देगा।” उन्होंने राज्य सरकार से सातारा गजट के आधार पर आरक्षण देने की भी मांग की। उन्होंने महाराष्ट्र में आरक्षण आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी पुलिस मामले वापस लेने की मांग की। उन्होंने पिछले आंदोलनों के दौरान जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी और आर्थिक मुआवजा देने की भी मांग की।
जरांगे ने मराठा और कुनबी समुदायों के लिए अलग राज्य स्तरीय विभाग बनाने और उसमें तत्काल कर्मचारियों की नियुक्ति करने की मांग की। उन्होंने अन्नासाहेब पाटील आर्थिक विकास महामंडल के माध्यम से दिए गए कर्ज पर ब्याज की राशि जारी करने और लंबित सारथी छात्रवृत्तियां जारी करने की भी मांग की।
उन्होंने सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग तथा आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग कोटे के तहत चयनित उम्मीदवारों को तत्काल नियुक्ति पत्र देने की मांग भी की। व्यवस्था में पक्षपात का आरोप लगाते हुए जरांगे ने कहा, ”यह सरकार नहीं चाहती कि मराठा समुदाय आगे बढ़े। मैंने अपने लोगों से कहा है कि वैध ऐतिहासिक रिकॉर्ड मिल चुके हैं, लेकिन प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार अब भी ऐसे अधिकारियों के पास है, जो समुदाय की प्रगति से ईर्ष्या करते हैं।”
जरांगे ने आगे आरोप लगाया कि अधिकारी वैध दावों को मनमाने तरीके से खारिज कर रहे हैं। उन्होंने जाति सत्यापन समिति को खत्म करने की मांग की। उन्होंने कहा, ”सरकार दस्तावेजी सबूतों को तब भी खारिज करके हमें प्रमाणपत्र देने से रोकने की कोशिश कर रही है, जब वे रिकॉर्ड से मेल खाते हैं। राज्य में जाति सत्यापन की कोई प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। दूसरे राज्यों में तहसीलदार और उप-विभागीय अधिकारी प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार रखते हैं, तो यहां अलग सत्यापन समिति की जरूरत क्यों है? कानून एक समान होना चाहिए।
इस मुद्दे का इतिहास लंबा है। 1980 के दशक से मांग चल रही है। कई बार आरक्षण दिया गया, कोर्ट ने रद्द किया। 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ प्रावधान खारिज किए थे। जरांगे ने पिछले तीन साल में कई अनशन किए। हर बार आश्वासन मिले, लेकिन पूर्ण समाधान नहीं हुआ।
अब वे कहते हैं कि यह अंतिम लड़ाई है। 58 लाख नोंदें मिली हैं, लेकिन प्रमाणपत्र नहीं मिल रहे। युवाओं का भविष्य अंधेरे में है।फडणवीस सरकार को अब जल्दी फैसला लेना होगा। या तो ठोस कदम उठाए प्रमाणपत्र जारी करे, गजट लागू करे, मामलों को वापस ले, या फिर मुंबई में बड़े आंदोलन का सामना करे। गणेशोत्सव के आसपास अगर मुंबई में भीड़ इकट्ठी हुई तो व्यवस्था संभालना मुश्किल होगा। पुलिस, प्रशासन, आम जनता सब प्रभावित होंगे।
जरांगे का आंदोलन सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं। वे SARTHI जैसी योजनाओं को फिर से शुरू करने, शहीद परिवारों को नौकरी और मदद, और मराठा-कुणबी मंत्रालय बनाने की भी मांग कर रहे हैं। ये मांगें जायज लगती हैं क्योंकि कई मराठा परिवार सच में पिछड़े हैं। लेकिन कानूनी बाधाएं भी हैं। सरकार को संतुलन बनाना होगा ताकि न मराठा नाराज हों, न ओबीसी।अगर 12 सितंबर तक कुछ ठोस नहीं हुआ तो मुंबई कूच तय है।
जरांगे कहते हैं कि राज्यभर से लोग आएंगे। यह दृश्य फडणवीस सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। पहले भी आंदोलन में तनाव बढ़ा था, सड़कें जाम हुई थीं। अब फिर वही स्थिति न बने, इसके लिए सरकार को सक्रिय होना चाहिए।मराठा युवा बेरोजगारी से परेशान हैं। खेती घाटे में है, शिक्षा महंगी है, नौकरियां कम हैं। आरक्षण से उन्हें मौका मिल सकता है। जरांगे इसी दर्द को आवाज दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार मराठा बच्चों का तड़पना ले रही है।
सरकार की तरफ से कुछ प्रयास हुए हैं। समिति बनाई गई, कुछ मदद दी गई। लेकिन जरांगे को लगता है कि यह पर्याप्त नहीं। वे पूर्ण कार्यान्वयन चाहते हैं। 12 सितंबर की डेडलाइन अब नजदीक है। अगर बातचीत नहीं हुई तो मुंबई की तरफ कदम बढ़ेंगे। यह मुद्दा सिर्फ एक व्यक्ति या एक समुदाय का नहीं। महाराष्ट्र की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा है।
फडणवीस सरकार को अब सावधानी से आगे बढ़ना होगा। मांगें सुनकर समाधान निकालना बेहतर है बजाय बड़े आंदोलन के। मुंबई कूच से शहर ठप हो सकता है, व्यापार प्रभावित हो सकता है, और राजनीतिक संकट गहरा सकता है।जरांगे ने साफ चेतावनी दी है। 15 दिन का समय दिया है।
इस दौरान रोज दबाव बनाया जाएगा। समर्थक एकजुट हैं। अगर सरकार ने सुना तो समाधान निकल सकता है। नहीं सुना तो मुंबई में निर्णायक आंदोलन होगा।फडणवीस सरकार इस घेराबंदी से कैसे निकलेगी, यह देखने वाली बात है। मराठा समाज इंतजार कर रहा है कि उनकी आवाज सुनी जाए और न्याय मिले।



