फोटो कॉपी दुकान में मिले SIR के 3400 फॉर्म, मच गया हड़कंप

वोट चोरी, EVM हैकिंग, जैसे मुद्दों पर घिरने वाली सरकार अब एक बार फिर सवालों के घेरे में है। दरअसल देश में चल रही SIR प्रतिक्रिया के बीच महाराष्ट्र के नवी मुंबई में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद गहरा गया।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भाजपा राज में जो हो जाए वही कम है। भाजपा चुनाव जीतने के लिए इस कदर गिर चुकी है जिसकी कोई हद्द ही नहीं है।

वोट चोरी, EVM हैकिंग, जैसे मुद्दों पर घिरने वाली सरकार अब एक बार फिर सवालों के घेरे में है। दरअसल देश में चल रही SIR प्रतिक्रिया के बीच महाराष्ट्र के नवी मुंबई में विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद गहरा गया।

इस मामले ने पूरे महाराष्ट्र की राजनीति को हिला दिया है। खारघर के सेक्टर 19 में एक साधारण फोटोकॉपी दुकान पर लगभग 3,400 से 3,404 स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के फॉर्म मिल गए। ये फॉर्म मतदाता सूची को ठीक करने के लिए भरे जाते हैं। इनमें मतदाताओं की तस्वीरें, निजी जानकारी और बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO के हस्ताक्षर भी थे। ये सभी फॉर्म पनवेल विधानसभा क्षेत्र के 11 मतदान केंद्रों से जुड़े थे।

ज्यादातर फॉर्म सिर्फ पांच मतदान केंद्रों के थे। यह बात सामने आने के बाद रायगढ़ जिला कलेक्टर किशन जावले ने पांच BLO को निलंबित कर दिया। साथ ही सूरज पाटिल नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ Representation of the People Act और भारतीय न्याय संहिता के तहत FIR दर्ज की गई। सूरज पाटिल को भाजपा युवा मोर्चा यानी BJYM का पदाधिकारी बताया जा रहा है।

यह मामला तब शुरू हुआ जब शिवसेना यूबीटी के कार्यकर्ताओं ने देखा कि एक व्यक्ति बड़ी संख्या में SIR फॉर्म की फोटोकॉपी करवा रहा है। शिवसेना यूबीटी के स्थानीय नेता बालेश भोजने और उनके साथी मौके पर पहुंचे। उन्होंने सूरज पाटिल को घेर लिया। वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गया।

पुलिस आई, फॉर्म जब्त किए गए और पाटिल को थाने ले जाया गया। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि पाटिल थाने से भागने में सफल हो गए, जिससे रात भर हंगामा मचा रहा। बाद में जांच शुरू हुई और साफ हुआ कि ये फॉर्म असली हैं, नकली नहीं। ये फॉर्म BLO की जिम्मेदारी में होने चाहिए थे, लेकिन किसी तरह निजी दुकान तक पहुंच गए।

पुलिस और प्रशासन के अनुसार, सूरज पाटिल नाम के व्यक्ति को फॉर्म की फोटो कॉपी कराते हुए पाया गया। बाद में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने उन पर मतदाता फॉर्म को कथित रूप से अनधिकृत तरीके से अपने कब्जे में रखने और चुनावी प्रक्रिया की गोपनीयता से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 314 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 128 के तहत दर्ज किया गया है।

सूरज पाटिल को लेकर राजनीतिक विवाद इसलिए भी बढ़ा क्योंकि शिवसेना (UBT) कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि वह BJP युवा विंग से जुड़े हैं। हालांकि, BJP नेताओं ने इस घटना से पार्टी कार्यकर्ताओं के संबंध से इनकार किया है। BJP की ओर से कहा गया है कि पार्टी कार्यकर्ताओं का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी होगा कि फॉर्म किसके निर्देश पर फोटो कॉपी किए जा रहे थे और संबंधित व्यक्ति तक मूल दस्तावेज कैसे पहुंचे।

फॉर्म के निजी दुकान तक पहुंचने के बाद प्रशासन ने चुनावी प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका की जांच शुरू कर दी। पांच बूथ लेवल अधिकारियों को निलंबित किया गया है और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। निलंबित अधिकारियों में निजी कंपनी से जुड़े तीन डेटा एंट्री ऑपरेटर भी शामिल बताए गए हैं, जिन्हें BLO के रूप में तैनात किया गया था।

प्रशासन अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि मतदाताओं से प्राप्त मूल फॉर्मों की सुरक्षा और गोपनीयता बनाए रखने में कहां चूक हुई। मामले की विस्तृत जांच के लिए दो सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है। इसमें पनवेल के एक उप नगर आयुक्त और एक सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को शामिल किया गया है।

वहीं यह घटना सामने आने के बाद शिवसेना (UBT) और BJP कार्यकर्ताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। शिवसेना (UBT) के नेताओं ने सवाल उठाया कि आम मतदाताओं द्वारा भरे गए मूल SIR फॉर्म निजी व्यक्तियों के हाथों तक कैसे पहुंच गए। शिवसेना (UBT) के स्थानीय पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें पहले भी चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की शिकायतें मिली थीं।

उनका दावा है कि इस घटना से उन आशंकाओं को बल मिला है कि SIR प्रक्रिया में पर्याप्त निगरानी नहीं हो रही है। इसके साथ ही इस मामले को लेकर विपक्षी राकांपा (शरदचंद्र पवार) के विधायक रोहित पवार ने कहा कि केवल बीएलओ का निलंबन काफी नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटना ने एसआईआर प्रक्रिया के संचालन के तरीके की पोल खोल दी है। उन्होंने आशंका जताई कि ऐसे कई अन्य मामले भी हो सकते हैं जो अभी सामने नहीं आए हैं, इसलिए निर्वाचन आयोग को इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

रायगढ़ के जिला कलेक्टर किशन जावले ने बताया कि सूरज पाटिल के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। यह कार्रवाई पनवेल विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं से संबंधित एसआईआर फॉर्म दुकान में मिलने के बाद की गई। जावले ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पनवेल के उप-विभागीय अधिकारी पवन चांडक के कार्यालय का दौरा भी किया। उन्होंने बताया कि पांच बीएलओ को निलंबित कर दिया गया है और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

वहीं महाराष्ट्र कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता अतुल लोंढे पाटिल ने भी इसको लेकर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने एक्स पर वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा कि-
खारघर ,नवी मुंबई ,महाराष्ट्र
खाली SIR FORM पर BLO के साइन है
कल XEROX के दुकान से मिले 3400 Form
जो SIR FORM केचुआ दफ्तर में रहने चाहिए
वो Form भाजपा नेता के पास कैसे पहुंचे
मित्र नहीं बताया
जो भाजपा है वही केचुआ है
जो केचुआ है वही भाजपा है
मिलकर लोकतंत्र को कैदी बना रहे है

यह घटना महाराष्ट्र सरकार और भाजपा पर सवाल खड़े करती है। महाराष्ट्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया को पारदर्शी रखना राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी भी है। लेकिन यहां इतनी बड़ी लापरवाही हुई। अगर BLO फॉर्म सुरक्षित नहीं रख पाए, तो सिस्टम में कमजोरी साफ दिखती है। सोचिए, मतदाता अपनी जानकारी देते हैं इस उम्मीद में कि वो सुरक्षित रहेगी। लेकिन जब 3400 फॉर्म एक फोटोकॉपी दुकान पर मिल जाएं, तो विश्वास कैसे बने। यह सिर्फ एक इलाके की घटना नहीं लगती।

अगर पनवेल में ऐसा हो सकता है, तो दूसरे जगहों पर भी हो सकता है। प्रशासन ने जांच समिति बनाई है। पनवेल डिप्टी म्युनिसिपल कमिश्नर और असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर जांच करेंगे। लेकिन लोगों को संदेह है कि जांच कितनी निष्पक्ष होगी। जब सत्ताधारी दल से जुड़े व्यक्ति पर आरोप हो, तो प्रशासन पर दबाव पड़ना स्वाभाविक है।

भाजपा लंबे समय से दावा करती रही है कि वह चुनावी प्रक्रिया को साफ-सुथरा रखती है। लेकिन इस घटना ने उनके दावों पर पानी फेर दिया। अगर युवा मोर्चा का पदाधिकारी फॉर्म लेकर फोटोकॉपी करवा रहा था, तो मकसद क्या था।

क्या वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने-घटाने की कोशिश थी। या मतदाताओं की जानकारी इकट्ठा करके राजनीतिक फायदा उठाना। ये सवाल अनुत्तरित हैं। कलेक्टर ने गंभीरता दिखाई और सस्पेंशन किया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं लगता। मूल समस्या सिस्टम की है। प्राइवेट कंपनी के कर्मचारियों को BLO बनाना कितना सही है। सुरक्षा के इंतजाम कितने मजबूत हैं।

महाराष्ट्र सरकार पर भी आरोप लग रहे हैं कि वे चुनावी गड़बड़ियों पर नजर नहीं रख पा रहे। राज्य में पहले भी कई चुनावी विवाद हो चुके हैं। मतदाता सूची में नाम गायब होने या फर्जी नाम जुड़ने की शिकायतें आती रहती हैं। SIR प्रक्रिया इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए चलाई गई थी। लेकिन खुद प्रक्रिया में इतनी बड़ी चूक हो जाए तो भरोसा कैसे बने। शिवसेना यूबीटी ने पहले भी पनवेल के सब-डिवीजनल ऑफिसर को पत्र लिखकर चुनावी प्रक्रिया में खामियों की शिकायत की थी। लेकिन तब ध्यान नहीं दिया गया। अब जब वीडियो वायरल हुआ तब कार्रवाई हुई।

इस पूरे मामले में आम आदमी की चिंता सबसे बड़ी है। उसकी निजी जानकारी लीक हो सकती है। फॉर्म में फोटो, पता, उम्र जैसी डिटेल्स होती हैं। इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कानून के तहत गोपनीयता तोड़ने पर सजा का प्रावधान है। लेकिन क्या कार्रवाई सिर्फ एक व्यक्ति और पांच BLO तक सीमित रहेगी। बड़े स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। विपक्ष मांग कर रहा है कि पूरे SIR अभियान की समीक्षा हो। पारदर्शिता बढ़ाई जाए। सीसीटीवी, डिजिटल ट्रैकिंग जैसी व्यवस्था हो ताकि फॉर्म कहां से कहां जा रहे हैं, पता चले।

कुल मिलाकर नवी मुंबई का यह मामला भाजपा और महाराष्ट्र सरकार की नाकामी को उजागर करता है। मतदाताओं की जानकारी को निजी दुकान तक पहुंचने देना गंभीर लापरवाही है। पांच BLO सस्पेंड करना सिर्फ शुरुआत है। बीजेपी नेता सूरज पाटिल पर FIR है, लेकिन पूरी साजिश का पर्दाफाश होना बाकी है।

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