4 मुस्लिम देशों ने नाकाम किया नेतन्याहू का गेम, ईरान के आगे झुके ट्रंप?

ईरान ने एक बार फिर से बड़ी जीत दर्ज कर न सिर्फ इजराइल को घुटनों पर ला दिया है बल्कि साबित कर दिया है कि वो किसी से डरने और दबने वाला देश है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: ईरान ने एक बार फिर से बड़ी जीत दर्ज कर न सिर्फ इजराइल को घुटनों पर ला दिया है बल्कि साबित कर दिया है कि वो किसी से डरने और दबने वाला देश है। बड़ी खबर निकल कर आई है कि ट्रंप ने खुद ईरान को फोन करके कहा है कि ईरान किसी अमेरिकी हितों को निशाना न बनाए, क्योंकि वो कोई जंग नहीं लड़ने वाले हैं।

ऐसे में एक ओर जहां पेरिस में बैठ कर ईरानी जनता को भड़काने का खेल फेल हो गया है तो वहीं दूसरी ये बात भी पूरी साफ हो चुकी है कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर कोई हमला नहीं करने जा रहा है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर कैसे यह सबकुछ मुमकिन हुआ। कैसे कल जो डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में सबक सिखाने और मदद भेजने का दावा पेश करे थे, कैसे वो अचानक मान गए हैं। पूरे मामले में कौन सी डिप्लोमेसी काम की है।

अब से ठीक 24 घंटे पहले दुनिया की सांसें थमी हुई थीं। अखबारों की सुर्खियां कह रही थीं कि किसी भी पल ईरान पर हमला हो सकता है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ ही युद्ध के बादल गहरे हो गए थे। इजरायल उत्साहित था, उसे लग रहा था कि अब ईरान का नामो-निशान मिटाने का वक्त आ गया है। लेकिन अचानक… पासा पलट गया। ईरान के राजदूत ने एक ऐसा दावा किया जिसने पेंटागन से लेकर यरूशलेम तक हड़कंप मचा दिया। ट्रंप ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। ईरान ने अपना एयरस्पेस खोल दिया है और कतर के अल-उदैद एयरबेस से उड़ानें फिर से शुरू हो गई हैं। कहा जा रहा है कि इस पूरी डिप्लोमेसी में चार मुस्लिम देशों का हाथ है।

ईरान के राजदूत रजा अमीरी मोघदम ने बताया कि उन्हें यह सूचना बुधवार को पाकिस्तान समयानुसार रात लगभग 1 बजे मिली। उनके अनुसार ट्रंप युद्ध नहीं चाहते और उन्होंने ईरान से अपील की है कि वह क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना न बनाए। ईरानी राजदूत ने यह भी कहा कि ईरान में लोगों को विरोध प्रदर्शन करने का वैध अधिकार है। ईरानी सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत भी की है। मोघदम ने आरोप लगाया कि ईरान में हिंसा के पीछे सशस्त्र समूह शामिल हैं, जिन पर हत्याओं और मस्जिदों पर हमलों के आरोप हैं।इस हमले के बाद हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिसकी संख्या 10000 से ऊपर बताई जा रही हैं, हालांकि ईरान ने यह भी साफ किया है कि वो किसी को फांसी देने नहीं जा रहे हैं। हालांकि इसके बाद ट्रंप का रुख नरम हुआ है और खबरों को लेकर अफवाहें सामने आई हैं। ऐसे में साफ है कि ईरान के राजदूत का हालिया बयान कोई साधारण बयान नहीं है। यह एक जीत का ऐलान है।

राजदूत का दावा है कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर हमला नहीं करेंगे। लेकिन सवाल यह है कि जो ट्रंप अपनी पहली पारी में ईरान पर मैक्सिमम प्रेशर डाल रहे थे, वो अब इतने नरम कैसे हो गए? खबर निकल कर आई है कि ईरान ने अपनी सुरक्षा को केवल मिसाइलों के भरोसे नहीं छोड़ा, बल्कि उसने डिप्लोमेसी की ढाल तैयार की। ईरान ने दुनिया को यह संदेश दिया कि वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ, तो वह पूरे क्षेत्र को आग की लपटों में झोंक देगा। ट्रंप, जो एक कारोबारी दिमाग वाले नेता हैं, समझ गए कि ईरान पर हमला करने का मतलब है इंटरनेशनल तेल बाजार की तबाही आ जाएगी और इसका सीधा असर अमेरिका पर पडेगा। इस पूरे खेल में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब चार मुस्लिम देशों ने हस्तक्षेप किया। इन देशों ने ट्रंप को साफ कर दिया कि वे ईरान के खिलाफ किसी भी युद्ध का हिस्सा नहीं बनेंगे। वॉल स्ट्रीट जनरल ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान ने मिलकर मिडिल ईस्ट में युद्ध न रोकने की अपील की थी।

कभी सऊदी अरबरू कभी ईरान का कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहा सऊदी, अब चीन की मध्यस्थता के बाद ईरान के करीब है। सऊदी ने ट्रंप को साफ बताया कि अगर युद्ध हुआ, तो उनके विजन 2030 और आर्थिक सुधारों का क्या होगा? कतर ने ईरान को बचाने में मुख्य भूमिका की भूमिका निभाई। उसने अमेरिका को याद दिलाया कि अल-उदैद से उसकी सुरक्षा के लिए है, न कि पड़ोसी मुस्लिम देश पर हमले के लिए। क्योंकि ईरान ने दो दिन पहले अपने बयान में कहा था कि अगर ईरान पर हमला होता है तो वो अमेरिकी एयरबेस पर हमला करेगा। यहां तक कि ईरान ने अपनी उड़ाने भी बंद कर ली थी। खबर तो यहां तक निकल कर सामने आई थी कि अमेरिका ने अल उदैद पर तैयारियां तेज कर दी थी। इसके अलावा यूएई भी व्यापारिक केंद्र होने के नाते जंग के खिलाफ था।

दावा किया जा रहा है कि यूएई ने भी अमेरिका से बातचीत की है। इस तीनों देशों के अलावा ने सबसे अहम भूमिका निभाई है। ओमान न सिर्फ शांति का दूत बनकर तेहरान पहुंचा बल्कि वाशिंगटन से सीधा संपर्क कर दोनों ओर संदेशों को आदान प्रदान किया है। हालांकि इजराइल पूरी कोशिश में लगा रहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच सीधी जंग हो जाए और इसका उसको फायदा मिले। यहां तक कि खुद बेंजामिन नेतन्याहू ट्रंप से मिलने अमेरिका भी गए लेकिन इस सबके बाद भी डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम देशों की बातों पर ज्यादा ध्यान दिया है। चारों मुस्लिम ने ट्रंप को समझाया कि इजरायल के कहने पर युद्ध छेड़ना अमेरिका के लिए एक आत्मघाती गोल साबित होगा।

और अब ईरान ने अपना एयरस्पेस खोल दिया है। यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि तनाव कम हो चुका है। जब युद्ध का खतरा होता है, तो सबसे पहले आसमान बंद होता है। लेकिन अब कतर के अल-उदैद एयरबेस से फिर से उड़ानें शुरू होना यह बताता है कि पर्दे के पीछे कोई बड़ी डील हो चुकी है। ईरान की यह बहादुरी देखिए कि एक तरफ वह अपनी सीमाओं की रक्षा कर रहा था, और दूसरी तरफ उसने दुनिया को दिखा दिया कि वह सामान्य स्थिति की ओर लौटने को तैयार है। कतर के बेस से उड़ानों का शुरू होना इजरायल के लिए एक तमाचा था, जो उम्मीद कर रहा था कि यह बेस अमेरिकी बमवर्षकों के लिए इस्तेमाल होगा।

इस पूरी कहानी में अगर कोई हारा है, तो वह है इजरायल। प्रधानमंत्री नेतन्याहू को पूरी उम्मीद थी कि ट्रंप आते ही ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला बोल देंगे। लेकिन आज इजरायल खुद को इतिहास के सबसे अलग-थलग मोड़ पर पा रहा है। अमेरिका और ट्रंप के यू-टर्न ने स्पष्ट कर दिया कि वह अमेरिका को नए युद्धों में नहीं फंसाएंगे। पूरे मामले में सबसे खास बात यह है कि जो अरब देश कभी ईरान के खिलाफ इजरायल के साथ खड़े दिखते थे, आज वे ईरान के साथ हाथ मिला रहे हैं। ऐसे में ईरान ने साबित कर दिया कि उसे घेरना मुमकिन नहीं है।

इजरायल अब यह सोचने पर मजबूर है कि क्या वह बिना अमेरिका के ईरान जैसे बड़े और शक्तिशाली देश से टकरा सकता है? ईरान की इस जीत के पीछे उसकी सैन्य ताकत और उसका धैर्य है। ईरान ने कभी भी डर कर घुटने नहीं टेके। उसने प्रतिबंधों को झेला, आर्थिक दबाव सहे, लेकिन अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं किया। ट्रंप जैसे सख्त नेता को मनाने का मतलब यह नहीं कि ईरान झुक गया, बल्कि इसका मतलब यह है कि ट्रंप को ईरान की हकीकत समझ आ गई। ईरान ने दिखाया कि वह केवल युद्ध के मैदान में ही नहीं, बल्कि डिप्लोमेसी की मेज पर भी माहिर है। उसने मुस्लिम देशों को एकजुट किया और अमेरिका को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इजरायल के हित और अमेरिका के हित एक नहीं हो सकते।

आज ईरान का एयरस्पेस खुला है, और दुनिया के लिए यह राहत की बात है। ट्रंप का पीछे हटना यह साबित करता है कि ताकत केवल हथियारों में नहीं, बल्कि सही गठबंधन और सही समय पर लिए गए फैसलों में होती है। चार मुस्लिम देशों की सूझबूझ और ईरान की अटूट हिम्मत ने एक बड़े विनाश को टाल दिया है। सबसे बड़ी बात है कि इसका बडा असर ईरान में विद्रोहियों पर भी होगा। अभी तक जो लोग यह समझ रहे थे कि रेजा पहलवी की अपील पर अमेरिकी सेना तेहरान को नेस्तोनाबूत कर देगी, अब वो जान चुके हैं कि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। इसलिए हिंसा से कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि आर्थिक मोर्चे पर देश के साथ खड़े होकर लड़ना पडेगा। इजरायल जो आग लगाना चाहता था, उस पर मुस्लिम एकता का पानी पड़ चुका है। अब दुनिया देख रही है कि कैसे ईरान एक क्षेत्रीय महाशक्ति बनकर उभर रहा है, जिसे नजरअंदाज करना अब वाशिंगटन के लिए मुमकिन नहीं है।

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