राजस्थान SIR: मुस्लिम वोट कटौती का आरोप, BLO का बयान वायरल, क्या इसी लिए ज्ञानेश कुमार करा रहे हैं SIR?

एक तरफ एसआईआर यानी स्पेशल इंक्वायरी रिपोर्ट का शोर है, तो दूसरी तरफ एक बीएलए का वो वायरल बयान, जिसने सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। दरसअसल कहानी शुरू होती है राजस्थान के एक ब्लॉक से, जहां एक बूथ लेवल ऑफिसर यानि बीएलओ का वीडियो और बयान सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल जाता है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: देश में चल रही एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर बहुत बड़ा खेल सामने आया है। एक ओर जहां ज्ञानेश कुमार जी और उनका विभाग दावा करता है कि एसआईआर देश में मृत और फर्जी मतदाताओं को वोटर लिस्ट से निकालने की प्रक्रिया है तो वहीं दूसरी ओर बीजेपी इसका चुनावी लाभ लेने के लिए घुसपैठियों के खिलाफ होने वाली कार्रवाई बताती है जबकि अंदर का खेल कुछ और ही है।

इसकी एक बड़ी नजीर राजस्थान से सामने आई है, जिसने एसआईआर की पूरी कलई खोल दी है। कैसे एसआईआर प्रक्रिया में मुस्लिमों के नाम काटे जा रहे हैं , इसका एक जीता जागता सबूत सामने आया और इस सबूत के सामने आते ही हड़कंप मचा गया है। कैसे एसआईआर में बड़ा खेल पकड़ाया है और कैसे मुस्लिमों के नाम काटे जा रहे हैं,लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार क्या है? आपका वोट! लेकिन क्या हो अगर आपसे आपका यह हथियार ही छीन लिया जाए? राजस्थान में एक ऐसा खेल पकड़ा गया है जिसने चुनाव आयोग की साख और लोकतंत्र की जड़ों को हिलाकर रख दिया है।

एक तरफ एसआईआर यानी स्पेशल इंक्वायरी रिपोर्ट का शोर है, तो दूसरी तरफ एक बीएलए का वो वायरल बयान, जिसने सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। दरसअसल कहानी शुरू होती है राजस्थान के एक ब्लॉक से, जहां एक बूथ लेवल ऑफिसर यानि बीएलओ का वीडियो और बयान सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल जाता है। दोस्तों बीएलओ के बयान में साफ तौर पर सुना जा सकता है कि कैसे बीजेपी के लोगों की ओर से बीएलओ पर प्रेशर डाला जा रहा है कि मुस्लिम वोटों को किसी तरह से काट दिया जाए। सुना आपने कि बीएलओ से वोट काटने पर किस किस तरह की धमकी दी जा रही है और सबसे खास बात यह है कि बीएलओ कितनी मुस्तैदी से लोगों को न्याया दिलाने और इसके लिए सीधे सरकार से लड़ जाने तक का दावा कर रहा है। कर्मचारी दबी जबान से ही सही मगर दावा कर रहा है कि उपर से आर्डर है लेकिन सवाल यह है कि आखिर वो कौन लोग हैं जो इन अफसरों के सिर पर बंदूक रखकर लोकतंत्र का गला घोंटना चाहते हैं? क्या ये बात ज्ञानेश कुमार जी को नहीं दिखाई देती है।

दअरसल राजस्थान की विधान सभा हवा महल क्षेत्र के एक सरकारी स्कूल में अंग्रेजी शिक्षक और बीएलओ कीर्ति कुमार ने एक वीडियो जारी कर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन पर बीजेपी कार्यकर्ताओं और नेताओं की ओर से जबरदस्त मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। कीर्ति कुमार इतने परेशान हैं कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि वे कलेक्टर दफ्तर जाकर अपनी जान दे देंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कीर्ति कुमार जिस बूथ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, वहां बीजेपी एजेंटों ने लगभग 470 मतदाताओं के नामों पर आपत्ति जताई है और उन्हें हटाने की मांग की है। यह संख्या उस बूथ के कुल वोटों का लगभग 40 प्रतिशत है। बीएलओ का दावा है कि ये नाम मुख्य रूप से एक मुस्लिम समुदाय के हैं। उन्होंने हाल ही में एसआईआर के दौरान इन सभी नामों की बारीकी से जांच की थी और उन्हें सही पाया था। अब उन पर फिर से इन नामों को लिस्ट से बाहर करने का दबाव डाला जा रहा है। जैसा कि वायरल ऑडियो और बीजेपी पार्षद का नाम वायरल वीडियो में कीर्ति कुमार को कथित तौर पर बीजेपी पार्षद सुरेश सैनी से फोन पर बात करते सुना जा सकता है।

हताशा में वे कहते हैंकृ ष्शायद मुझे पूरी बस्ती के वोट ही काट देने चाहिए, इससे आपको और महाराज (बालमुकुंद आचार्य) को चुनाव जीतने में आसानी होगी। कीर्ति कुमार ने दावा किया है कि समय की कमी है। 470 फॉर्म्स की जांच और डिजिटल एंट्री के लिए उन्हें सिर्फ 2 दिन का समय दिया गया है। एक फॉर्म में कम से कम 10 मिनट लगते हैं, जिसका मतलब है 78 घंटे से ज्यादा का काम है। बीएलओ ड्यूटी के कारण वे स्कूल में बच्चों को ठीक से पढ़ा नहीं पा रहे हैं। ऐसे में कहीं न कहीं सारी बातें बीएलएओ के बयान से ये बातें साबित हो रही है बीएलओ पर प्रेशर जरुरत से ज्यादा है। हवा महल का सियासी समीकरण यह पूरा विवाद इसलिए भी बड़ा है क्योंकि 2023 के चुनाव में हवा महल सीट पर मुकाबला बेहद कड़ा था। बीजेपी के बालमुकुंद आचार्य ने कांग्रेस उम्मीदवार को केवल 974 वोटों के मामूली अंतर से हराया था। अब जबकि नगर निकाय चुनाव नजदीक हैं, इतनी बड़ी संख्या में एक खास वर्ग के वोट काटने की कोशिशों ने चुनावी पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ये कोई पहली बार नहीं हुआ है और इसका शिकार सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोग नहीं है। आपको याद होगा कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक बीएलओ ने काम के दवाब के चलते आत्महत्या कर ली थी। बाद में परिजन का बयान आया था कि उपर के अफसर और कुछ सरकारी लोग ये चाहते थे कि दलितों और पिछड़ों के वोट काट दिए जाएं लेकिन बीएलओ ने ऐसा करने से मना कर दिया था, जिसके चलते बीएलओ पर इतना प्रेशर बनाया गया कि उसको आत्महत्या कर करनी पड़ी। वैसे भी जब देश में पहली बार बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया शुरु हुई थी तो उसी दौरान विपक्ष का ये आरोप था कि दलित पिछड़ा और मुस्लिमों के वोट काटे जाएंगे। बिहार में भी दावा किया जाता है कि ये खेल खूब हुआ। अभी दो दिन पहले वोट फॉर डेमोक्रेसी नाम की एक संस्था है जिसने बिहार इलेक्शन की ऑडिट रिपोर्ट पेश की है। इसमें बड़ी संख्या में जानबूझकर वोट काटने और बढ़ाने का दावा किया गया है और जब राजस्थान में सरेआम मुस्लिमों के वोट काटने की बात वायरल हुई तो कहीं न कहीं वोट फॉर डेमोक्रेसी की ऑडिट रिपोर्ट सही दिखाई देने लगती है।

जानकार पूछ रहे हैं कि क्या यह एसआईआर केवल उन इलाकों को टारगेट करने के लिए है जहां एक विशेष विचारधारा को वोट नहीं मिलते? क्या इस रिपोर्ट के जरिए उन पॉकेट्स की पहचान की जा रही है जहां से अल्पसंख्यक वोट एकजुट होकर गिरते हैं? अगर नियत साफ है, तो फिर मुस्लिम बहुल इलाकों में ही वोटर लिस्ट में इतनी कटौती क्यों देखी जा रही है? ज्ञानेश कुमार जी, जवाब तो देना होगा कि इस जांच की आड़ में किसका एजेंडा चलाया जा रहा है?आज भी महराष्ट्र में रिजल्ट आया है और वहां बीजेपी को बंपर जीत मिली है लेकिन यहां भी पूरे चुनाव में न सिर्फ गलत तरीके से वोट काटने का मामला सामने आया है कि बल्कि यहां पर स्याही विवाद गहरा गया है। दअरसल एक ओर रिजल्ट आ रहा था तो दूसरी ओर राहुल गांधी ने वोट देने के बाद हाथों पर लगाई जाने वाली स्याही का मुद्दा उठााया है।

राहुल ने जो कटिंग शेयर की है उसमें भी वाघमारे का बयान प्रकाशित हुआ है। वह कहते हैं, हम उन केमिकल्स खासतौर से सिल्वर नाइट्रेट की मात्रा की जांच करेंगे, जो 15 दिन तक स्याही का निशान उंगलियों पर बने रहने के लिए जरूरी है। ऐसे में सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या वह नियमों के तहत था? यह विवाद उस समय बढ़ने लगा जब कथित वोटरों ने सोशल मीडिया पर लिखना और वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया हालाकि अभी पूरे मामले में स्याही की फाइनल जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है लेकिन विपक्ष का दाव है कि जानबूझ कर ऐसा स्याही लगाई गई जिससे एक बार नहीं कई बार एक ही मतदाता की ओर से वोट डाला जा सके।

ऐसे में साफ है कि बिहार हो या फिर राजस्थान या फिर मुुंबई तीनों जगहों पर चुनाव अयोग बुरी तरह से घिरा हुआ है लेकिन राजस्थान में जिस तरह से मुस्लिमों को वोट डालने के अधिकार से वंचित करने का प्लान बनाया जा रहा है, ये एसआईआर का सबसे बड़ा खेल माना जा रहा है। क्योंकि ये अधिकारी तो सिर्फ मोहरे हैं। असली खिलाड़ी तो वो हैं जो परदे के पीछे बैठकर प्रेशर बना रहे हैं। राजस्थान की गलियों में चर्चा है कि सत्ता के करीब रहने वाले कुछ संगठन और रसूखदार नेता बीएलओ को धमका रहे हैं। उनसे कहा जा रहा है कि लिस्ट छोटी करो, नहीं तो ट्रांसफर के लिए तैयार रहो।

भारत का संविधान कहता है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था है। लेकिन जब सरेआम राजस्थान की घटनाएं सामने आती है तो कहीं न कहीं ऐसे नेताओं की भूमिका से न सिर्फ मुस्लिम समुदाय में डर पैदा होता है बल्कि ये बात भी सामने आती है कि क्या चुनाव आयोग इन दबाव बनाने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करेगा? क्या उन बीएलओ को सुरक्षा दी जाएगी जो सच बोलना चाहते हैं? राजस्थान में पकड़ा गया यह खेल एक बड़ी चेतावनी है। बीएलओ का वायरल बयान सिर्फ एक चिंगारी है, जो बता रही है कि लोकतंत्र के मंदिर में सेंधमारी की कोशिश हो रही है। ऐसे में ज्ञानेश कुमार पर बड़ी जिम्मेदारी है कि बीएलओ को सुरक्षा दें और बीजेपी नेता पर कड़ी कार्रवाई करें, जिससे की पूरी देश में एक संदेश जाए कि चुनाव आयोग पूरी तरह से निष्पक्ष है और वो किसी के नहीं बल्कि देश के साथ खड़ा हुआ है।

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