जनसंख्या का चरम पार कर चुके 64 देश, भारत कब पहुंचेगा उस मुकाम पर?
दुनिया के 64 देश आबादी का पीक पार कर चुके हैं. भारत अभी ग्रोथ फेज में है. भारत की आबादी कब तक पीक पर पहुंच जाएगी. पीक पर जाने के बाद का क्या ट्रेंड होता है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: दुनिया के 64 देश आबादी का पीक पार कर चुके हैं. भारत अभी ग्रोथ फेज में है. भारत की आबादी कब तक पीक पर पहुंच जाएगी. पीक पर जाने के बाद का क्या ट्रेंड होता है.
दुनिया के 64 देश और क्षेत्र अपनी जनसंख्या का पीक पार कर चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों और मीडियम वेरिएंट प्रोजेक्शन के मुताबिक, साल 2026 तक इन देशों की आबादी अपने सबसे ऊंचे आंकड़े को छूकर अब नीचे जाने लगी है.
इनमें ज्यादातर यूरोप और पूर्वी एशिया के देश हैं, जहां फर्टिलिटी रेट तेजी से गिरी और फिर लंबे समय तक लो लेवल पर बनी रही. पूर्वी यूरोप के कई देशों में बड़े पैमाने पर हुए माइग्रेशन ने भी इस गिरावट को और तेज कर दिया.
भारत की तस्वीर फिलहाल इससे अलग है. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले इस देश का ग्राफ अभी भी ऊपर की ओर जा रहा है, लेकिन यह सिलसिला हमेशा नहीं चलने वाला.
रिसर्च प्लेटफॉर्म अवर वर्ल्ड इन डेटा की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के आधार पर 2060 के दशक तक भारत भी अपने जनसंख्या पीक तक पहुंच सकता है, और उसके बाद यहां भी आबादी घटनी शुरू हो जाएगी. सवाल अब यह नहीं रह गया कि यह होगा या नहीं, बल्कि यह है कि आखिर कब होगा.
जापान से लेकर थाईलैंड तक, कौन कब पहुंचा पीक पर
अवर वर्ल्ड इन डेटा के मुताबिक, इस लिस्ट में कुछ चौंकाने वाले नाम भी शामिल हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया का थाईलैंड, जहां 1990 के दशक की शुरुआत में ही फर्टिलिटी रेट दो बच्चों प्रति महिला से नीचे चली गई थी, अब वहां यह रेट 1.2 से भी कम रह गई है. दक्षिण अमेरिका के उरुग्वे में भी फर्टिलिटी रेट घटकर औसतन 1.4 बच्चे प्रति महिला रह गई है.
इनमें से कई देश हाल ही में अपनी आबादी के पीक को पार कर पाए हैं, लेकिन जापान और इटली जैसे देशों को अपने पीक को पीछे छोड़े एक दशक से भी ज्यादा समय हो चुका है. स्पेन, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में भी आबादी ने 2010 और 2020 के दशक के बीच अपना सबसे ऊंचा लेवल छू लिया, और अब यह ग्राफ नीचे की ओर मुड़ चुका है.
यूएन वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024 के डेटा पर आधारित इस एनालिसिस के मुताबिक, अगर इस सदी के अंत तक के अनुमानों को देखा जाए तो यह गिरावट काफी बड़ी नजर आती है.
दक्षिण कोरिया और चीन की आबादी 2100 तक आधे से भी कम रह सकती है. इटली की आबादी में 40 फीसदी से ज्यादा की कमी आ सकती है, जबकि स्पेन और थाईलैंड की आबादी करीब एक-तिहाई तक घट सकती है.
भारत सहित बाकी देशों का हाल
रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले दशकों में और भी कई देश इस लिस्ट में शामिल होने वाले हैं. अनुमान है कि 2050 के दशक तक दक्षिण अमेरिका के ज्यादातर देश अपनी अधिकतम आबादी पार कर चुके होंगे. इसके बाद 2060 के दशक तक दक्षिण एशिया के कई देशों की बारी आ सकती है और इसमें आज दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत भी शामिल है.
यानी भारत की जनसंख्या का ग्राफ फिलहाल ऊपर की ओर ही जा रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक यह हमेशा ऐसा नहीं रहने वाला. अगले तीन-चार दशकों में भारत की आबादी भी अपने पीक पर पहुंचकर नीचे की तरफ मुड़ सकती है.
तीन बड़े फैक्टर्स पर टिका है भविष्य
ये सभी अनुमान संयुक्त राष्ट्र के ‘मीडियम वेरिएंट’ प्रोजेक्शन पर आधारित हैं और ये तीन प्रमुख फैक्टर्स फर्टिलिटी रेट, लाइफ एक्सपेक्टेंसी और माइग्रेशन के बारे में लगाए गए अनुमानों पर काफी निर्भर हैं. पचास साल बाद इन तीनों की सटीक भविष्यवाणी करना आसान नहीं है.
इनमें माइग्रेशन एक ऐसा फैक्टर है, जो इन नक्शों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकता है. दुनिया के कई हाई-इनकम देशों की आबादी आज सिर्फ इसलिए स्थिर या बढ़ती हुई दिख रही है, क्योंकि वहां लगातार इमिग्रेशन हो रहा है. अगर यह न हो तो इनकी आबादी भी घटने लगे.
अमेरिका इसका सबसे साफ उदाहरण है. अवर वर्ल्ड इन डेटा के एनालिसिस के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों में सदी के अंत तक भी अमेरिका की आबादी अपने पीक पर नहीं पहुंचती, क्योंकि यह माना गया है कि वहां कम बर्थ रेट की भरपाई के लिए पर्याप्त इमिग्रेशन होता रहेगा,
लेकिन अगर अमेरिका में माइग्रेशन को जीरो मान लिया जाए, तो जल्द ही उसकी आबादी भी पीक पर पहुंच जाएगी और 2100 तक करीब 6 करोड़ की कमी आ सकती है. माइग्रेशन वाले और बिना माइग्रेशन वाले सिनेरियो में अमेरिका की आबादी में करीब 13 करोड़ का अंतर आ सकता है.
दक्षिण कोरिया जैसी गिरावट को रोकना लगभग नामुमकिन
यही वजह है कि कुछ देशों के लिए जनसंख्या पीक का समय, फर्टिलिटी रेट, माइग्रेशन और लाइफ एक्सपेक्टेंसी से जुड़े भविष्य के अनुमानों पर बहुत हद तक निर्भर करता है. लेकिन कुछ अन्य देशों के लिए घटती आबादी अब लगभग तय मानी जा रही है. दक्षिण कोरिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
अवर वर्ल्ड इन डेटा के एक लेखक ने संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या टूल की मदद से यह जांचने की कोशिश की कि आखिर किन बदलावों से दक्षिण कोरिया की आबादी में गिरावट को रोका जा सकता है. इस कोशिश से यही निष्कर्ष निकला कि फर्टिलिटी रेट में जरूरी उछाल, लाइफ एक्सपेक्टेंसी में बड़ी बढ़ोतरी या इमिग्रेशन में भारी इजाफा इनमें से कोई भी बदलाव प्रैक्टिकली संभव नहीं दिखता.
कुल मिलाकर, दुनिया एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है जहां ‘ज्यादा आबादी’ की चिंता की जगह धीरे-धीरे ‘घटती आबादी’ की चुनौती ले रही है. भारत के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि उसका ग्राफ अभी ऊपर की ओर है, लेकिन आने वाले दशकों में यह भी नीचे की तरफ मुड़ सकता है. बशर्ते फर्टिलिटी रेट, लाइफ एक्सपेक्टेंसी और माइग्रेशन के मौजूदा ट्रेंड इसी तरह बने रहें.



