मुंबई में बड़ा खेला, कैबिनेट बैठक से गायब हुए पवार-शिंदे, जादुई आंकड़े के करीब पहुंचे उद्धव?
मुंबई बीएमसी चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। लेकिन असली खेला तो अब शुरू हुआ है। जीत का जश्न मनाने के बजाय महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे अपने पार्षदों को बचाने की जुगत में लग गए हैं। खबर है कि शिंदे गुट के पार्षदों को बांद्रा के एक फाइव स्टार होटल में शिफ्ट कर दिया गया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बीएमसी चुनाव के नतीजों के बाद मुंबई में बड़ा खेला हो गया है। एक ओर जहां शिंदे के पार्षद होटल में कैद हो गए तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री की बैठक से उनके दोनों डिप्टी सीएम गायब हो गए।
महाराष्ट्र निकाय चुनाव में भाजपा और शिवसेना शिंदे गुट ने जबरदस्त जीत हासिल की है. इसमें सबसे अहम मुंबई बीएमसी का चुनाव था, जहां 25 साल से काबिज ठाकरे परिवार को सत्ता से बेदखल कर महायुति ने इतिहास रचा, लेकिन अब मेयर पद को लेकर जो खींचतान मची है उसने मुम्बई लेकर दिल्ली तक की पॉलिटिक्स को हिला कर रख दिया है। क्योंकि जो आंकड़ों का खेल है उसने बीजेपी और शिवसेना शिंदे गुट के बीच असमंजस पैदा कर दिया है। तो आखिर क्या वजह हुई कि शिंदे को अपने पार्षदों को होटल में कैद करना पड़ा और क्यों मुंबई में होने के बावजूद शिंदे और पवार मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की कैबिनेट मीटिंग में नहीं पहुंच?
मुंबई बीएमसी चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। लेकिन असली खेला तो अब शुरू हुआ है। जीत का जश्न मनाने के बजाय महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे अपने पार्षदों को बचाने की जुगत में लग गए हैं। खबर है कि शिंदे गुट के पार्षदों को बांद्रा के एक फाइव स्टार होटल में शिफ्ट कर दिया गया है। यानि मुंबई की सियासत में रिसोर्ट पॉलिटिक्स की वापसी हो गई है। बीएमसी चुनाव के नतीजे आते ही एकनाथ शिंदे ने अपनी शिवसेना के सभी नव-निर्वाचित पार्षदों को बांद्रा के एक होटल में कैद कर दिया है। वजह है नंबर गेम का डर। दरअसल, मुंबई के 227 वार्डों में से भाजपा ने 89, शिवसेना (यूबीटी) ने 65, शिवशेना (शिंदे) ने 29, कांग्रेस ने 24, मनसे ने 6, एनसीपी (अजित पवार) ने 3 और एनसीपी (शरद पवार) ने 1 में जीत हासिल की है. यानी टीम बीजेपी और शिंदे ने मिलाकर 227 वार्डों वाली बीएमसी में कुल 118 सीटें हासिल की हैं, जो बहुमत से सिर्फ 4 ज्यादा हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बहुमत का जादुई आंकड़ा छूने के बाद भी शिंदे को किसका डर सता रहा है ? तो इसका जवाब साफ है कि शिंदे को डर है कि कहीं अगर विपक्ष एकजुट होता है तो वह बहुमत से 8 पार्षद कम रह जाता है. ऐसे में अगर एकनाथ शिंदे की शिवसेना से 8 पार्षद टूटकर अलग हो गए तो मुंबई का पूरा खेल पलट सकता है। असली लड़ाई कहां अटकी है? अब 227 वार्डों वाली बीएमसी में बहुमत के लिए 114 सीटों की जरूरत है। बीजेपी और शिवसेना (शिंदे) के पार्षदों को मिलाकर कुल 118 पार्षद होते हैं जो कि जादुई आंकड़े से महज 4 सीटें ज्यादा है। लेकिन अगर दूसरी तरफ देखें तो शिवसेना (UBT), कांग्रेस, मनसे, एनसीपी (SP) सपा और AIMIM अगर एकजुट होते हैं तो ये आंकड़ा 106 तक पहुंच जाता है।यानी बहुमत से सिर्फ 8 कम। यही ‘8’ अब महाराष्ट्र की राजनीति की सबसे बड़ी कहानी बन गये हैं।
इसी संभावना को लेकर राजनीतिक गलियारे में चर्चा गरम है. अगर विपक्ष एकजुट होकर दावा पेश करता है और शिंदे गुट में सेंध लगती है, तो तस्वीर बदल सकती है. इसी आशंका को देखते हुए एकनाथ शिंदे ने अपने सभी निर्वाचित पार्षदों को होटल में शिफ्ट करने की योजना बनाई है। इससे साफ होता है कि महायुति की जीत के बावजूद हीजेपी और शिंदे गुट असुरक्षा महसूस कर रहा है. उसे डर है कि कहीं विपक्ष एकजुट होकर उसका सारा खेल ने बिगाड़ दे। बीएमसी की सत्ता सिर्फ अन्यतम बहुमत की कहानी नहीं है. यह भरोसे, टूट‑फूट, रणनीति और होटल पॉलिटिक्स का नया अध्याय भी है. आने वाले दिन तय करेंगे कि यह बहुमत वास्तव में स्थिर है या 8 पार्षदों का आंकड़ा मुंबई की राजनीति को फिर करवट दिला देगा.
एक तरफ जहां बहुमत के आंकड़े को सुरक्षित रखने की कवायद की जा रही है तो वहीं मेयर पद को लेकर खींचतान तेज हो गई है। ये खींचतान इस हद तक बढ़ गई है कि इसका असर अब राज्य की पॉलिटिक्स पर पड़ने लगा है। दरअसल,खबर है कि बीएमसी चुनाव के नतीजों के बाद महाराष्ट्र सरकार की कैबिनेट बैठक में शनिवार को दोनों उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और अजित पवार नहीं पहुंचे. मुख्यमंत्री मे कैबिनेट मीटिंग बुलाई गई जिसमें बड़े नेता मंत्री पहुंचे लेकिन दो प्रमुख चेहरे डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे और दूसरे डिप्टी सीएम अजीत पवार ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने जाने से उनके साथ बैठने से ही इनकार कर दिया।
ऐसा नहीं है कि ये दोनों किसी काम के बहाने से बाहर गए हों। नहीं, बताया जा रहा है कि शिंदे मुंबई में ही हैं, वहीं अजित पवार पुणे में हैं, लेकिन फिर भी दोनों कैबिनेट बैठक में नहीं पहुंचे. कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र नगर निकायों के चुनाव नतीजों के बाद से दोनों डिप्टी सीएम नाराज चल रहे हैं. जहां, शिवसेना की ओर से बताया गया है कि एकनाथ शिंदे बीमार हैं, वहीं, अजित पवार बारामती में अपने चाचा शरद पवार से मिलने उनके घर पहुंचे हैं. वहीं इस बीच खबर आती है कि शिवसेना के नगरसेवकों और नेताओं का कहना है कि मुंबई में ढाई–ढाई साल के लिए महापौर पद दिया जाए. शिंदे गुट की मांग है कि बालासाहेब ठाकरे की जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर शिवसेना का महापौर बैठे. इस मुद्दे पर भाजपा और शिवसेना के नेताओं के बीच चर्चा जारी.
अब सबकी नजर इस पर है कि इस बातचीत का नतीजा क्या निकलता है. शिंदे की 29 सीटें ही हैं जो बीजेपी को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा सकती हैं. यानि शिंदे अब किंगमेकर की भूमिका में आ चुके हैं। शिंदे के पास अब वह ताकत है जिससे वह बीजेपी से अपनी शर्तें मनवा सकते हैं। शिंदे गुट के प्रवक्ता और अन्य नेताओं ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि मुंबई का मेयर शिवसेना (शिंदे) का होना चाहिए क्योंकि यह बालासाहेब की विरासत है।
वहीं ऐसे में सवाल उठता है कि इन चुनावों रिकॉर्ड तोड़ जीत दर्ज करने के बावजूद भी क्या बीजेपी नाखुश है? तो इसका सीधा जवाब है कि नहीं, बीएमसी चुनाव में रिकॉर्ड 89 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा नतीजे से उतनी खुश नहीं है। अंदरूनी सूत्रों ने इसे उम्मीदों से कम बताया है। खबर है कि बीजेपी ने कम से कम 110 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था ताकि वह बहुमत के आधे निशान के करीब पहुंच सके, लेकिन वह इससे काफी पीछे रह गई। अब चुनावी कैंपेन में क्या गलत हुआ, इसकी आंतरिक समीक्षा शुरू हो गई है। पार्टी नेताओं ने मुंबई इकाई में समन्वय की कमी, उम्मीदवार चयन में खामी और राज-उद्धव ठाकरे की ओर से उठाए गए ‘मराठी अस्मिता और मुंबई गौरव’ के मुद्दे का प्रभावी ढंग से मुकाबला न कर पाने को मुख्य कारण बताया है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ सीट-बंटवारे की बातचीत से पहले, भाजपा ने 155 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी और लगभग 120-125 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था। लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप से शिंदे ने कड़ी मोलभाव की और अपनी पार्टी के लिए 91 सीटें हासिल कीं, जिससे भाजपा को 137 सीटें मिलीं। कम सीटों के बंटवारे के कारण भाजपा ने अपना टारगेट 110 सीटों तक घटा दिया, लेकिन वह केवल 89 सीटें ही जीत पाई। एक भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ‘पार्टी ने अन्य पार्टियों से 11 मौजूदा पार्षदों को शामिल किया था, जिससे चुनाव से पहले मौजूदा पार्षदों की संख्या 93 हो गई थी। हम उस संख्या को भी बरकरार नहीं रख पाए।’ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कथित तौर पर मुंबई इकाई को पार्टी की इस असफलता पर नाराजगी जताई है कि उसने अपनी गति को बड़ी जीत में नहीं बदल पाया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्य नेतृत्व का मानना है कि रविवार को शिवाजी पार्क में राज और उद्धव ठाकरे की संयुक्त रैली ने मराठी मतदाताओं से मुंबई और मराठी पहचान बचाओ की अपील की, जिसका असर पड़ा है।
कुल मिलाकर मुंबई की सियासत इस वक्त जीत के जश्न से ज़्यादा डर, सौदेबाज़ी और रणनीति के दौर से गुजर रही है। बीएमसी चुनाव में महायुति की ऐतिहासिक जीत ने ठाकरे परिवार के 25 साल के किले को ढहा जरूर दिया, लेकिन सत्ता की असली चाबी अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। सिर्फ 4 सीटों के नाज़ुक बहुमत ने बीजेपी और शिंदे गुट दोनों को चौकन्ना कर दिया है। यही वजह है कि पार्षदों को होटल में शिफ्ट करना पड़ा और सत्ता के शिखर पर बैठे नेताओं की नाराज़गी कैबिनेट मीटिंग तक में दिखाई दी। मेयर पद को लेकर शिंदे की सख्त मांग और “ढाई-ढाई साल” वाला फॉर्मूला साफ दिखाता है कि अब वो सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि किंगमेकर की भूमिका में हैं। दूसरी ओर, रिकॉर्ड सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी अंदर से असंतुष्ट है, क्योंकि उसका सपना पूर्ण बहुमत का था। विपक्ष भी “8 पार्षदों” की संभावना के सहारे नई चालें चलने की तैयारी में है। साफ है कि मुंबई की राजनीति में असली मुकाबला चुनावी नतीजों के बाद शुरू हुआ है, और आने वाले दिन तय करेंगे कि सत्ता स्थिर रहेगी या फिर एक बार फिर बड़ा खेला होगा।



