ईवीएम बाय-बाय वेलकम बैलेट पेपर

- कर्नाटक से उठी चिंगारी क्या दिल्ली तक आग लगाएगी?
- तकनीकी भारत की राजधानी माने जाने वाले शहर बैंगलुरू में होंगे मतपत्र से चुनाव
- बैलेट पेपेर से चुनाव सफल हुए तो यह देशव्यापी राजनीतिक दबाव में बदल सकते हैं।
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। कर्नाटक की राजनीति ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने न सिर्फ दक्षिण भारत बल्कि पूरे देश की चुनावी व्यवस्था पर बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। बेंगलुरु के नगर निकाय चुनाव जो तकनीकी भारत की राजधानी माने जाने वाले शहर में होने जा रहे हैं अब ईवीएम से नहीं बल्कि बैलेट पेपर से कराए जाएंगे।
यह फैसला केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है बल्कि यह उस गहरे राजनीतिक अविश्वास का प्रमाण है जो बीते एक दशक से भारतीय चुनावी व्यवस्था के भीतर सुलग रहा है। ईवीएम के दौर में पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसी बड़े महानगर में स्थानीय निकाय चुनाव पूरी तरह मतपत्र से होंगे। सवाल सिर्फ मतदान प्रक्रिया का नहीं है सवाल सत्ता साख और सियासी भविष्य का है।
बीजेपी का गेम प्लान, चुप्पी और इंतज़ार
बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को बेहद शांति से देख रही है। यह चुप्पी बीजेपी की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी राजनीतिक रणनीति है। बीजेपी जानती है कि बैलेट पेपर में स्थानीय स्तर पर पैसे दबाव और जातीय समीकरण ज्यादा काम करते हैं कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान चुनावी मशीनरी को कमजोर कर सकती है और अगर कांग्रेस हारती है तो नैरेटिव तैयार है देखो बैलेट पेपर भी कांग्रेस को नहीं जिता पाया। बीजेपी का लक्ष्य साफ है कर्नाटक में सरकार गिराना नहीं कांग्रेस को अंदर से खोखला करना। कर्नाटक सिर्फ एक राज्य नहीं है। यह दक्षिण भारत की राजनीतिक प्रयोगशाला है यहां जो होता है उसका असर तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और दिल्ली तक जाता है। अगर बैलेट पेपर माडल सफल रहा तो विपक्ष को 2029 से पहले एक नया हथियार मिल जाएगा। अगर असफल रहा तो बीजेपी को ईवीएम पर चल रही बहस को हमेशा के लिए दबाने का मौका।
कर्नाटक की सत्ता के भविष्य का लिटमस टेस्ट
369 वार्ड 88 लाख से अधिक मतदाता पांच नए नगर निगम और जिला तालुक ग्राम पंचायत चुनाव। यह सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं हैं। यह चुनाव कर्नाटक की सत्ता के भविष्य का लिटमस टेस्ट साबित होने वाले चुनाव हैं। कांग्रेस सरकार जानती है कि नगर निकाय चुनाव जीतना केवल प्रशासनिक मजबूती नहीं दिखाता बल्कि यह साबित करता है कि सरकार की जड़ें जमीन में कितनी गहरी हैं। यही वजह है कि इन चुनावों को एक साथ कराने की रणनीति सामने आयी है ताकि सत्ता की लय टूटने न पाए।
बैलेट पेपर से होंगे चुनाव
कर्नाटक राज्य निर्वाचन आयोग ने घोषणा की है कि बेंगलुरु के नगर निकाय चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की बजाय बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाएगा। यह चुनाव 25 मई के बाद कराए जाएंगे। कर्नाटक राज्य निर्वाचन आयुक्त जी.एस. संग्रेशी ने ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी क्षेत्र के लिए मतदाता सूची का प्रारूप जारी करने के बाद आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जीबीए के अंतर्गत नवगठित पांच नगर निगमों के चुनाव 25 मई के बाद कराए जाएंगे और इनमें ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से मतदान होगा। संग्रेशी ने बताया कि आगामी जीबीए चुनावों के साथ साथ जिला पंचायत, तालुक पंचायत और ग्राम पंचायत चुनाव भी बैलेट पेपर के जरिए कराए जाएंगे। उन्होंने कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के अनुसार सभी 369 वार्डों की वार्ड वार प्रारूप मतदाता सूची सार्वजनिक निरीक्षण के लिए प्रकाशित कर दी गयी है। अंतिम मतदाता सूची 16 मार्च को जारी की जाएगी।
आर या पार सिद्धरमैया बनाम डीके शिवकुमार
कर्नाटक की सत्ता के भीतर असली लड़ाई विपक्ष से नहीं बल्कि अपनों में चल रही है। एक तरफ मुख्यमंत्री सिद्धरमैया अनुभवी सामाजिक न्याय के प्रतीक और पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के भरोसेमंद चेहरा बने हुए हैं तो दूसरी तरफ डीके शिवकुमार संगठन के मास्टर स्ट्रेटजिस्ट वोक्कालिगा राजनीति के मजबूत स्तंभ और दिल्ली दरबार में असरदार नेता है। नगर निकाय चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि कांग्रेस संगठन पर किसका वर्चस्व रहेगा 2028 में मुख्यमंत्री पद का असली दावेदार कौन होगा? और क्या सिद्धरमैया का यह कार्यकाल अंतिम राजनीतिक शिखर साबित होगा? यही वजह है कि बैलेट पेपर का फैसला सिर्फ लोकतांत्रिक नहीं बल्कि सत्ता संतुलन का हथियार भी है। सभी स्थानीय निकाय चुनाव एक साथ कराना यह जितना सरल दिखता है उतना ही खतरनाक भी साबित हो सकता है। यह रणनीति बताती है कि डीके शिवकुमार चुनावों को राजनीतिक मोमेंटम में बदलना चाहते हैं। एक साथ चुनाव का मतलब संगठन की ताकत का परीक्षण फंड, कैडर और प्रचार का केंद्रीकरण और सबसे अहम मुख्यमंत्री पर सामूहिक दबाव अगर कांग्रेस शानदार जीत दर्ज करती है तो इसका श्रेय किसे मिलेगा सरकार को या संगठन को और यहीं से असली लड़ाई शुरू होगी।
बैलेट पर भरोसा
ईवीएम पर आरोप कोई नयी बात नहीं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, राजद, वाम दल लगभग पूरा विपक्ष वर्षों से कहता आ रहा है कि मशीनों से लोकतंत्र कमजोर हुआ है। सभी दल लंबे समय से सरकार से मांग कर रहे हैं कि देश में बैलट पेपर से चुनाव कराये जाएं। विपक्ष का कहना है कि पूरी दुनिया के सशक्त लोकतांत्रिक देशें में बैलेट पेपर से ही चुनाव होते हैं चाहे वह अमरीका ही क्यों न हो। सरकार हो या चुनाव आयोग अभी तक किसी ने भी विपक्ष की यह मांग नहीं मानी। चुनाव आयोग पर जब उंगली उठी तो उसने मशीन को हैक करने को साबित करने के लिए कहा जो कोई नहीं कर पाया। अब सवाल उठता है कि बैलेट पेपर से चुनाव की मांग क्या सिर्फ विपक्ष की खीज का नीतजा है। हालांकि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और चुनाव आयोग ने भी एलान कर दिया है? कि इस बार के निकाय चुनाव मतपत्रों से होंगे। कर्नाटक से उठा यह प्रयोग अगर सफल हुआ, तो यह देशव्यापी राजनीतिक दबाव में बदल सकता है।




