बीएमसी लॉटरी आरक्षण: फडणवीस सरकार का नया नियम उद्धव ठाकरे पर भारी

जिसकी लाठी उसकी की भैंस वाली कहावत तो आपने सुनी ही होगी लेकिन अगर इसका जीता जागता सबूत देखना है तो मुंबई महापालिका के मेयर का चुनाव देख लीजिए। महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने अपना मेयर बनाने के लिए ऐसा तगड़ा गेम खेला है कि एसटी वर्ग की मर्यादा को ही तार तार कर दिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: जिसकी लाठी उसकी की भैंस वाली कहावत तो आपने सुनी ही होगी लेकिन अगर इसका जीता जागता सबूत देखना है तो मुंबई महापालिका के मेयर का चुनाव देख लीजिए। महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने अपना मेयर बनाने के लिए ऐसा तगड़ा गेम खेला है कि एसटी वर्ग की मर्यादा को ही तार तार कर दिया है।

सरकार ने अचानक ऐसा नियम बना दिया कि गेम उद्धव ठाकरे के पाले से निकलता हुआ सीधे बीजेपी और महायुति के पाले में जा गिरा है। कैसे एक नियम ने बीएमसी में उद्धव ठाकरे के गेम को खत्म कर दिया है और कैसे लॉटरी में एक वर्ग को सिर्फ और सिर्फ इस वजह से आरक्षण लिस्ट से हटा दिया गया क्योंकि उनके पार्षदों की संख्या कम थी।

महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने महापालिका के चुनाव में आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिए लॉटरी सिस्टम कर दिया है, इससे कई जगहों पर अजब-गजब फैसले हो गए है। खासतौर से जिस बीएमसी के मेयर चुनाव पर पूरे देश की नजर टिकी थी, वहां उद्धव ठाकरे के साथ बड़ा खेला हो गया है। दरसअल बीएमसी चुनाव में बीजेपी और एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना के पास कोई भी एसटी पार्षद नहीं था। ऐसे में तय था कि लॉटरी सिस्टम से जो आरक्षण लिस्ट आएगी, अगर इसमें एसटी वर्ग की लॉटरी खुल गई तो बीजेपी और महायुति का खेल खत्म हो जाएगा और 65 सीटे जीतने वाले उद्धव ठाकरे की पार्टी फाइट में आ जाएगी और बीएमसी के मेयर पद पर उनका दावा हो जाएगा लेकिन महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार लॉटरी सिस्टम के लिए रातों रात एक नियम ले आई।

नियम ये था कि जिस वर्ग के तीन से कम पार्षद होंगे उसको आरक्षण कर लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे में क्योंकि उद्धव ठाकरे गुट के पास एसटी के सिर्फ दो पार्षद थे तो उनको लॉटरी सिस्टम में शामिल ही नहीं किया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नियम देश में मौजूद आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ नहीं है। क्या सरकार अपनी मनमानी से यह तय कर सकती है कि किस वर्ग को कहां आरक्षण देना है और कैसे सरकार किसी को आरक्षण के लाभ से वंचित कर सकती है। हालांकि ये मामला संवैधानिक है लेकिन पहली नजर में ये साफ दिखता है कि सिर्फ इस वजह से किसी वर्ग को आरक्षण की कटेगरी से हटा देना कि उनकी संख्या तीन के बजाय दो है, ये पूरी तरह से न सिर्फ अन्याय संगत है बल्कि एक बड़े खेल की ओर भी ईशारा करता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उद्धव ठाकरे का मेयर हो जाए, इसके लिए ये बड़ा खेल किया गया है।

हालांकि अब बीएमसी के मेयर की आरक्षण लिस्ट सामने आ गई है। बीएमसी में आरक्षण कटेगरी महिला को मेयर पद मिला है। ऐसे में जीत की गुणागणित शुरु हो चुकी है।  इस बार बृहन्मुंबई नगर निगम चुनावों में कुल 121 महिला उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। बीएमसी के इतिहास में यह पहली बार है कि महिला पार्षदों की संख्या 50 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर गई है। इसमें बीजेपी के पास 47 पार्षद, शिवसेना उद्धव के पास 34 महिला पार्षद, शिवसेना एकनाथ शिंदे के पास 17 महिला पार्षद, कांग्रेस के पास 13 महिला पार्षद और अन्य पार्टियों में एआईएमआईएम के पास चार, मनसे के पास चार और एनसीपी और समाजवादी पार्टी के पास एक-एक महिला पार्षद मौजूद है। कुल 227 वार्डों में से 114 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित थे, लेकिन आरक्षित सीटों के अलावा सामान्य सीटों पर भी जीत हासिल करने के कारण यह संख्या 121 तक पहुँच गई है।

बीएमसी में इस बार 14 मुस्लिम और एक ईसाई महिला पार्षद शामिल हैं। ऐसे में आरक्षण का ऐलान होते ही जीत हार जोड़तोड़ का खेल शुरु हो गया है। आपको बता दें कि वैसे भी उद्धव गुट ने किशोरी पेडेणकर को अपना नेता चुना लिय है लेकिन महायुति की ओर से प्रत्याशी कौन होगा, अभी ये फाइनल नहीं है, बीजेपी की ओर से कुछ नाम चर्चा में हैं लेकिन एकनाथ शिंद बीजेपी के साथ खड़े होंगे या नहीं इसको लेकर अभी पूरी तरह से सस्पेंस बना हुआ है। पिछले दिनों कुछ दावे इस तरह के भी सामने आए हैं कि पूरी शिवसेना बीएमसी में एक हो सकती है। पिछले दिनों जिस तरह से जिस तरह से जीत के बाद अचानक एकनाथ शिंदे ने अपने सारे पार्षदों को तीन दिनों तक होटल ताज में बंद रखा और फिर मीडिया रिपोर्ट से आई खबरों की मुताबिक शपथ पत्र और डॉक्यूमेंट लेकर उनको रिहा किया गया कि वो पार्टी के फैसले को ही मानेंगे, इससे पूरा मामला संश्य में चला गया है।

सवाल यह खड़ा हुआ कि एकनाथ शिंदे किससे अपने पार्षदों को बचाना चाह रहे थे, बीजेपी या फिर उद्धव गुट से। क्योंकि अगर शिंदे के 29 पार्षद जिसके साथ जुड़ेंगे मेयर उसी का बनेगा और ये बात पहले से तय है कि बीजपी ओर शिंदे ने मिलकर चुनाव लड़ा है तो छुपा छिपाई का खेल क्यों चल रहा है। कल कल्याण डोबिंवली में जो खेल हुआ है, उससे मामला गरमा गया है। क्योंकि यहां भी बीजेपी और शिंदे एक साथ लड़े थे और दोनों के पास मेयर बनाने के लिए पर्याप्त बहुत थे लेकिन अचानक शिंदे गुट पलटी मारते हुए राज ठाकरे की मनेस के साथ हो गए और बीजेपी से अलग अपना मेयर बनाने का दावा ठोंक दिया है। ऐसे में कहा जा रहा है कि कल्याण डोबिंवली में अगर ऐसा हो सकता है तो फिर बीएमसी में क्यों नहीं।

क्या यहां भी सत्ता के लिए राज ठाकरे, एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे एक साथ नहीं आ सकते हैं। क्योंकि बीजेपी ने बीएमसी के लिए पहले ही साफ कर दिया है कि वह न तो मेयर की कुर्सी छोड़ेगी और न ही स्टैंडिंग कमेटी की चेयरमैनशिप किसी को देगी। यानी बीजेपी का संदेश साफ है कि हम बड़े भाई हैं और सब कुछ हमारा ही होगा। और शायद यही बात शिंदे साहब को यह बात चुभ गई है। कल्याण-डोंबिवली में जो हुआ, वह इस बात का ट्रेलर है कि बीएमसी में भी बड़ा धमाका हो सकता है।

अब कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या बीएमसी में ठाकरे बंधु (उद्धव और राज) और एकनाथ शिंदे एक साथ आ सकते हैं? अगर शिंदे को लगा कि बीजेपी उन्हें बीएमसी में कुछ नहीं देने वाली, तो वे अपनी पार्टी बचाने और वजूद बनाए रखने के लिए उद्धव और राज के साथ खड़े हो सकते हैं। अगर ये तीनों मिल गए, तो मुंबई की सत्ता से बीजेपी का पत्ता साफ होना निश्चित है। लेकिन सवाल यह है कि क्या देवेंद्र फडणवीस इतनी आसानी से हार मान लेंगे? बिल्कुल नहीं। फडणवीस को राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी माना जाता है और वे अब अपनी नई गुणा-गणित में जुट गए हैं। बीजेपी को बहुमत के जादूई आंकड़े तक पहुंचने के लिए कम से कम 25 पार्षदों की और जरूरत है।

सूत्रों की मानें तो कि अगर शिंदे ज्यादा इधर उधर करते हैं तो बीजेपी अपना मेयर बनाने के लिए एक बार फिर से ऑपरेशन लोटस चला सकती है। बीजेपी निर्दलीय पार्षदों और अन्य छोटे दलों के संपर्क में हैं। शिंदे के बगावती तेवरों को देखते हुए फडणवीस अब उन रास्तों की तलाश कर रहे हैं जहाँ से वे शिंदे के बिना भी अपना मेयर बना सकें। मुंबई बीजेपी के दफ्तर में रातों को लाइटें जल रही हैं और बैठकों का दौर जारी है। फडणवीस जानते हैं कि अगर बीएमसी हाथ से गई, तो 2029 की राह मुश्किल हो जाएगी।

हालांकि इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच एक और बड़ी खबर आई है। एआईएमआईएम की पार्षद सहर शेख की मुश्किलें बढ़ गई हैं। बीजेपी के फायरब्रांड नेता किरीट सोमैया ने पुलिस स्टेशन पहुँचकर सहर शेख के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। पुलिस ने सहर शेख को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और सेहर ने थाने पहुंच कर अपना स्पष्टीकरण दाखिल किया है।कल सोशल मीडिया पर एक वीडियो सहर शेख का जारी हुआ था, जिसमें वो मुंबई को ग्रीन बनाने का दावा कर रही थी। सहर का तर्क है कि इसका मतलब ग्रीनटी से था जबकि किरीट सौमैया का दावा है कि ये सांप्रदायिकता का जन्म दे रहा है।

हालांकि यह मामला कानूनी नजर आ रहा है, लेकिन राजनीति में कुछ भी अकारण नहीं होता। सहर शेख पर एक्शन को बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए वे विपक्षी खेमे पर दबाव बनाना चाहती है। सोमैया के इस कदम से मुंबई की सियासत में हड़कंप मच गया है। विपक्षी दल इसे बदले की राजनीति कह रहे हैं, जबकि बीजेपी इसे सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई बता रही है।

बीएमसी का ये रण अब बहुत दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। एक तरफ नियमों के जाल में उद्धव ठाकरे को फंसाने की कोशिश की जा रही है, तो दूसरी तरफ शिंदे ने बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। क्या उद्धव, राज और शिंदे का मिलन होगा? क्या फडणवीस 25 पार्षदों का जुगाड़ कर पाएंगे? और सबसे बड़ा सवा कि क्या एसटी वर्ग के साथ हुआ ये भेदभाव जनता भूल पाएगी? बीएमसी की सत्ता किसके पास जाएगी, ये तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले कुछ दिन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए सबसे ज्यादा ऐतिहासिक होने वाले हैं।

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