UGC के विरोध में भयंकर बवाल, सामूहिक इस्तीफे, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बढ़ी सरकार की मुश्किलें

बीजेपी दावा करती है कि वो दुनिया की सबसे मजबूत पार्टी है। उलके पास सबसे मजबूत संगठन है जो हर वक्त ग्राउंड पप रहकर पार्टी के लिए काम करता रहता है। लेकिन यूजीसी के नए नियमों को लेकर जो विरोध प्रदर्शन हो रहा है उसने एक झटके में पार्टी को पूरी तरह से तहस नहस करके रख दिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इन दिनों बीजेपी  की हालत बेहद खराब स्थिति में। कल तक जो नारे विपक्षी पार्टियों की रैलियों में लगते थे आज वही नारों के साथ बीजेपी के समर्थक सड़कों पर हैं।

कल तक जो विरोध प्रदर्शन हमें जेएनयू जैसी युनिवर्सिटीज में देखने को मिलते थे आज वही आवाज देश के लगभग हर युनिवर्सिटी से उठ रही है। मोदी और अमित शाह के पुतले जलाए जा रहे हैं। डबल इंजन वाले राज्यों में तो स्थिति और खराब है। एक तरफ जहां सड़कों पर ये हाल है तो वहीं बीजेपी के भीतर के हालात तो बद से बदतर होते जा रहे हैं। कल तक जो नेता मोदी शाह के आगे चूं भी नहीं करते थे उन्होंने आज बगावती सुर छेड़ दिए हैं। पार्टी में इस्तीफों की झड़ी लग गई है।

बीजेपी दावा करती है कि वो दुनिया की सबसे मजबूत पार्टी है। उसके पास सबसे मजबूत संगठन है जो हर वक्त ग्राउंड पप रहकर पार्टी के लिए काम करता रहता है। लेकिन यूजीसी के नए नियमों को लेकर जो विरोध प्रदर्शन हो रहा है उसने एक झटके में पार्टी को पूरी तरह से तहस नहस करके रख दिया है। अब तो ऐसा लगा रहा जैसे कोई कंपटीशन चल रहा हो कि कौन कितना ज्यादा बीजेपी से इस्तीफा दे सकता है।  UGC के विरोध में BJP नेताओं का इस्तीफे का दौर शुरू, मऊ में 20 कार्यकर्ताओं का सामूहिक इस्तीफा।” वहीं  “UGC मुद्दे पर BJP को झटका! बुलंदशहर में 10 बूथ अध्यक्षों ने दिया इस्तीफा” मैनपुरी जिले में भाजपा के मंडल महामंत्री समेत 10 लोगों ने पार्टी के पद से दिया इस्तीफा।

वहीं एक और रिपोर्ट के मुताबिक, “UGC कानून के विरोध में लखनऊ में एक साथ 11 भाजपा पदाधिकारियों ने दिया इस्तीफा।” अब देखिए जिस तरीके से ये खबरें सामने आ रही हैं उससे ये साफ पता चलता है कि बीजेपी की जो मजबूत कड़ी थी वो अब कमजोर पड़ने लगी है। यूपी में तो संगठन पूरी तरह से खत्म होता जा रहा है। और सबकी नाराजगी की ए ही वजह है और वो है यूजीसी के नए नियम। इन सभी का मानना है कि वर्तमान समय में बीजेपी अपनी मूल विचारधारा से भटकती नजर आ रही है। इनका आरोप है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यूजीसी के नियमों में संशोधन कर युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है, जिसे वो किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं कर सकते हैं।

जिन नियमें को लेकर पार्टी में भारी असंतोष फैला है उन नियमों के खिलाफ आम जनता में कितना आक्रोश होगा। “रंगा-बिल्ला की सरकार..नही चलेगी, नही चलेगी” यहां रंगा बिल्ला मोदी और शाह को कहा जा रहा है। ये युवा ठाकुर चौबीसी के राजपूत हैं। ठाकुर चौबीसी राजपूतों के 40 गांवों का गढ़ है. यह BJP की बड़ी ताकत है. West UP में BJP के जनादेश की पटकथा यहीं से लिखी जाती है।

जहां सवर्ण समाज के लोग मोदी जी की कब्र खोदने का नारा लगा रहे है। अब जरा सोचिए अगर किसी विपक्ष के नेता या कार्यकर्ता ने ये नारा लगाया होता तो योगी सरकार अब तक FIR दर्ज कर लेती। गोदी मीडिया डिबेट में चिल्लाते चिल्लाते गला फाड़ देता लेकिन यहां पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। क्या बीजेपी अपने खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों से सहम गई है या उसके लिए अब आम बात हो गई है?

यूजीसी के खिलाफ सिर्फ यूपी से ही नहीं बल्कि बिहार से भी विरोध के खतरनाक नजारे सामने आए हैं। अब आप इन तस्वीरों को देखिए। तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि कैसे रात के अंधेरे में हजारों युवा हाथ में मशाल लेकर सड़कों पर उतरे हुए हैं। ये वो तस्वीरें है जो गोदी मीडिया आपको कभी नहीं दिखा पाएगा लेकिन सोशल मीडिया पर विरोध प्रदर्शन की तस्वीरों की बाढ़ आ रखी है। भाजपा के वही कट्टर समर्थक हैं जो कल तक मोदी मोदी किया करते थे। हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना देखा करते थे। लेकिन यूजीसी के एक फैसले ने मोदी जी के 18-18 घंटे काम करने की मेहनत पर पानी फेर दिया है।

लेकिन अब हो सकता है कि इन प्रदर्शनों पर थोड़ी रोक लग जाए क्योंकि जिन नियमों को लेकर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था उनको लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुना दिया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने UGC के 23 जनवरी को जारी किए गए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ वाले नियमों पर रोक लगा दी है। कई याचिकाकर्ताओं ने इन नियमों को मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान व यूजीसी एक्ट, 1956 के खिलाफ बताया था। यह फैसला उन लोगों के लिए राहत की खबर है जिन्होंने इन नियमों को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ये नियम समानता के सिद्धांत के खिलाफ हैं और कुछ समूहों को बाहर कर सकते हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ये नियम यूजीसी एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से फिलहाल इन नियमों को लागू होने से रोक दिया गया है। अब इस मामले पर आगे सुनवाई होगी और कोर्ट तय करेगा कि ये नियम मान्य हैं या नहीं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि ये नए नियम साफ नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए, कोर्ट ने इन नियमों पर तुरंत रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि 2012 में जो नियम थे, वही अब फिर से लागू होंगे। इस मामले में अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है।

तो कुल मिलाकर तस्वीर साफ है कि जिस मुद्दे को शायद सत्ता पक्ष ने एक सामान्य प्रशासनिक फैसला समझा होगा, वही अब उसके लिए राजनीतिक भूचाल बनता दिख रहा है। सड़क से लेकर संगठन तक जो नाराज़गी दिखाई दे रही है, वह किसी एक जिले, एक वर्ग या एक राज्य तक सीमित नहीं लगती। जब पार्टी के अपने कार्यकर्ता, पदाधिकारी और परंपरागत समर्थक ही खुलकर विरोध में खड़े होने लगें, इस्तीफे देने लगें और सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने लगें, तो यह सिर्फ विरोध नहीं बल्कि भीतर की गहरी बेचैनी का संकेत होता है। बीजेपी जिस मजबूत संगठन और अटूट कैडर की बात करती रही है, वहीं पर दरारें दिखना किसी भी राजनीतिक दल के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है.

यूजीसी के नियमों को लेकर उठा यह विवाद अब सिर्फ शिक्षा नीति का मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह भरोसे, विचारधारा और नेतृत्व पर सवाल का रूप लेता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की रोक ने भले ही फिलहाल हालात को थोड़ा ठंडा किया हो, लेकिन जिस तरह का गुस्सा सड़कों पर फूटा है, उसने यह संदेश जरूर दे दिया है कि युवाओं और समाज के बड़े वर्ग की आवाज को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि बीजेपी इसे चेतावनी की तरह लेकर संवाद और सुधार का रास्ता चुनती है या फिर इसे भी सामान्य राजनीतिक शोर समझकर आगे बढ़ जाती है। क्योंकि इतिहास गवाह है, जब जनता और कार्यकर्ता दोनों एक साथ नाराज़ हो जाएं, तो सबसे मजबूत किले भी हिल जाते हैं।

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