निशिकांत दुबे की SC पर टिप्पणी से सियासी विवाद, ट्रोलिंग तेज
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी टिप्पणी ने राजनीतिक और सोशल मीडिया हलकों में नया विवाद खड़ा कर दिया है…

4पीएम न्यूज नेटवर्कः सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए UGC पर रोक लगा दिया है.. जानकारी के मुताबिक यह कानून मोदी सरकार द्वारा दलित ओबीसी को अपने पाले में लाने के लिए लाया गया.. शायद मोदी को नहीं पता था कि इस UGC कानून का देश भर में विरोध होगा.. वहीं भारी विरोध के बाद जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो.. वहां पर सरकार के वकील ने अपना पक्ष ही नहीं रखा.. न ही सरकार द्वारा कोई दलील दी.. और कोर्ट ने UGC पर रोक लगा दिया.. जिससे पता चलता है कि मोदी सरकार की यह सोंची समझी रणनीति का हिस्सा था.. और देश की जनता को भ्रमित करना और दलित, ओबीसी का वोट अपने पाले में लाने का सबसे सटीक तरीका था.. लेकिन सरकार इस मामले पर सफल नहीं हुई..
शायद सरकार यहीं चाहती थी कि UGC कानून का पूरे देश में विरोध हो और दलित ओबीसी वोट हमारे साथ आ जाए.. सामान्य वोट तो हमारे साथ है ही वो कहां जाएगा.. और जब मामला कोर्ट में जाएगा.. तो इस कानून पर रोक लगा दी जाएगी और सरकार का काम हो जाएगा.. आखिर हुआ भी वहीं जो सरकार चाहती थी.. इससे पहले जितने भी मामले सुप्रीम कोर्ट में गए हैं.. उन सभी पर सरकार ने तमाम दलीलें दी हैं.. और उन सभी रोक न लगाने के लिए तमाम प्रयास किए गए.. लेकिन UGC पर रोक न लगाने के लिए सरकार द्वारा कोई भी दलील नहीं दी गई है.. जो आम जनता को हजम नहीं हो रही है..
आपको बता दें कि 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया.. कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन द्वारा 13 जनवरी 2026 को जारी किए गए उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियमावली.. 2026 पर फिलहाल रोक लगा दी.. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि.. इन नियमों की भाषा अस्पष्ट है.. और इनके दुरुपयोग की संभावना है.. अगर ये नियम लागू हो जाते तो समाज में गहरा विभाजन पैदा हो सकता था.. कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया है.. और अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को तय की है.. तब तक 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे..
वहीं ये नियम उच्च शिक्षा में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए थे.. UGC ने इन्हें 13 जनवरी को अधिसूचित किया था.. नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में “इक्विटी कमिटी” बनानी अनिवार्य थी.. इस कमिटी में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व जरूरी था.. कमिटी छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के भेदभाव की शिकायतों की जांच करती.. और समानता सुनिश्चित करती है.. नियमों में “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा दी गई थी.. जो केवल SC/ST/OBC के खिलाफ होने वाले भेदभाव पर केंद्रित थी.. सामान्य वर्ग के लोगों के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं था.. UGC का कहना था कि ये नियम रोहित वेमुला.. और पायल तड़वी जैसे मामलों के बाद जरूरी हो गए थे.. क्योंकि 2019 से 2025 तक जाति-आधारित भेदभाव के मामले दोगुने हो गए थे..
आपको बता दें कि नियमों के खिलाफ देशभर में विरोध हुआ.. सामान्य वर्ग के छात्रों ने कहा कि ये नियम उनके खिलाफ भेदभाव पैदा करते हैं.. कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुईं.. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि नियम असंवैधानिक हैं.. क्योंकि ये संविधान की धारा 14 (समानता) और 15 (भेदभाव निषेध) का उल्लंघन करते हैं.. कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि धारा 3(सी) और 3(ई) में विरोधाभास है.. धारा 3(सी) में जाति-आधारित भेदभाव की सीमित परिभाषा है… जबकि 3(ई) में भेदभाव की व्यापक परिभाषा है.. कोर्ट ने पूछा कि जब पहले से भेदभाव की परिभाषा है तो नई सीमित परिभाषा क्यों लाई गई.. कोर्ट ने कहा कि अगर हस्तक्षेप नहीं होता तो खतरनाक परिणाम हो सकते थे..
वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं.. भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इसे अपनी जीत बताया.. और उन्होंने X पर लिखा कि UGC पर गाली देने वाले अब चुप हैं.. संसद में कोई इस पर चर्चा नहीं कर रहा.. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में EWS को 10% आरक्षण दिया गया.. जो गरीबों की मदद है… दुबे ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो मैंने कहा था.. मोदी जी पर भरोसा रखिए.. इससे पहले 25 जनवरी को भी दुबे ने कहा था कि मोदी हैं तो मुमकिन है.. और नियमों से जुड़ी भ्रांतियां दूर होंगी.. उन्होंने इसे सामान्य वर्ग को ऐतिहासिक न्याय बताया था..
राजद प्रवक्ता प्रियंका भारती ने दुबे पर तंज कसा.. और उन्होंने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला भाजपा निर्धारित करती है.. क्या भाजपा ने अदालतों पर कब्जा कर लिया है.. वहीं पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने फैसले को न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम कहा.. और उन्होंने कहा कि कोर्ट ने माना है कि नियमों से भेदभाव हो सकता था.. संविधान, समानता और छात्रों के अधिकार सर्वोपरि हैं..
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने फैसले का स्वागत किया.. उन्होंने कहा कि सच्चा न्याय किसी के साथ अन्याय नहीं करता.. माननीय न्यायालय यही सुनिश्चित करता है.. बात सिर्फ नियमों की नहीं, नीयत की भी होती है.. न किसी का उत्पीड़न हो, न अन्याय.. तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा कि UGC के दिशानिर्देश असंवैधानिक थे.. अदालत ने समय रहते हस्तक्षेप किया..



