NEET PG 2025: कट-ऑफ घटाने पर सुप्रीम कोर्ट हैरान, केंद्र से मांगा जवाब

नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंस (NBEMS) ने बीते दिनों मेडिकल की पोस्ट ग्रेजुएट्स सीटों में एडमिशन के लिए एक अहम फैसला लिया था, जिसके तहत नेशनल एंट्रेंस कम एलिजिबिलिटी टेस्ट (NEET) PG 2025 क्वालिफाइंग कट-ऑफ में कमी की गई थी.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंस (NBEMS) ने बीते दिनों मेडिकल की पोस्ट ग्रेजुएट्स सीटों में एडमिशन के लिए एक अहम फैसला लिया था, जिसके तहत नेशनल एंट्रेंस कम एलिजिबिलिटी टेस्ट (NEET) PG 2025 क्वालिफाइंग कट-ऑफ में कमी की गई थी.

इस फैसले के बाद NEET PG 2025 में माइनस 40 स्कोर हासिल करने वाले कैंडिडेट्स भी मेडिकल की पीजी सीटों में एडमिशन ले सकते है. इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एग्जाम में डॉक्टर्स के प्रदर्शन पर हैरानी जताई है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब तलब किया है.

क्या मानकों से समझौता किया जा रहा है?
NEET PG 2025 में माइनस 40 स्कोर हासिल करने वाले कैंडिडेट्स को भी एडमिशन के फैसले को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी की है. हरिशरण देवगन बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत की जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि NEET-PG 2025 कट-ऑफ में कमी से वह हैरान हैं. बेंच ने PG एग्जाम में डॉक्टरों के प्रदर्शन पर हैरानी जताते हुए कहा कि वह कट-ऑफ कम करने के फैसले से भी वह हैरान हैं.

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ये मामला मानकों से जुड़ा है. कोर्ट ने कहा कि यह मानकों के बारे में है. सवाल यह है कि क्या उन मानकों से समझौता किया जा रहा है? कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि यह मामला पोस्टग्रेजुएट सीटों से जुड़ा हुआ है, जिसके लिए सभी उम्मीदवार डॉक्टर हैं. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हम यह देखकर हैरान थे कि यह तरीका क्यों अपनाया गया. ये सभी रेगुलर डॉक्टर हैं. जवाब में, वकील ने कहा कि इरादा यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी सीट खाली न रहे.

केंद्र सरकार से जवाब तलब
इस मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस मामले में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करे. असल में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि लागू रेगुलेशन में साफ तौर पर कहा गया है कि न्यूनतम क्वालिफाइंग स्टैंडर्ड 50वां परसेंटाइल है, जिसे सबसे ज्यादा मार्क्स के आधार पर तय किया जाएगा. इससे माइनस 40 परसेंटाइल तक एडमिशन मिलेंगे.

वहीं ASG भाटी ने तर्क दिया कि अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट सीटों में फर्क होता है, तो याचिकाकर्ता के वकील शंकरनारायणन ने कहा कि प्रीति श्रीवास्तव वाले फैसले में कहा गया है कि शिक्षा के ऊंचे लेवल पर ऊंचे स्टैंडर्ड लागू होने चाहिए, जिसके बाद कोर्ट ने केंद्र को इस मामले में एक डिटेल में एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है.

याचिकाकर्ता के क्या हैं तर्क?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में इस फैसले को मनमानी, असंवैधानिक और जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है. याचिका में दिया गया है कि यह कमी मेडिकल शिक्षा के सर्वोच्च स्तर पर योग्यता को खत्म करती है, निम्न-स्तरीय क्षमता को संस्थागत बनाती है, और रोगी की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सीधा और अनुमानित खतरा पैदा करती है. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि पोस्टग्रेजुएट एडमिशन में, खास वजहों को छोड़कर, मार्क्स में छूट नहीं दी जा सकती, और अगर दी भी जाती है, तो सिर्फ 5-6 परसेंटाइल तक ही सही है.

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