भारत बंद, मजदूर रजामंद
सदन से लेकर सड़क तक घिर गयी सरकार

- राहुल गांधी की आंधी धुंआ-धुंआ सियासत
- नए लेबर कोड्स के जरिए मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। मजदूरों के हितों को नजरअंदाज करने का अरोप लगाते हुए 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने भारत बंद का आह्वान कर सरकार के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजा दिया है। ट्रेड युनियनों के भारत बंद को राजनीतिक दलों का भी तेजी से समर्थन मिल रहा है। यानि कि सरकार सदन से लेकर सड़क तक बेहाल है। सदन में राहुल गांधी की आंधी में सरकार के सभी नैरेटिव धराशाही हो गये तो सड़क पर अब मजदूर अपने हितों की आवाज उठाने के लिए इकटठा हो रहे हैं। हालांकि कहानी में थोड़ा सा टिवस्ट भी है और कई ट्रेड यूनियनों ने खुद को हड़ताल से अलग होने की बात कही है।
मजदूरों की आवाज नहीं दबाई जा सकती
भारत बंद का आह्वान करने वाली ट्रेड यूनियनों में देश के बड़े मजदूर संगठन शामिल हैं। उनका कहना है कि नई श्रम संहिताएं कर्मचारियों की सुरक्षा कम करती हैं हड़ताल के अधिकार को सीमित करती हैं और ठेका प्रथा को बढ़ावा देती हैं। यूनियन नेताओं का आरोप है कि मजदूरों की आवाज को दबाकर विकास की इमारत खड़ी नहीं की जा सकती। एक प्रमुख ट्रेड यूनियन नेता ने बयान दिया है कि हम सरकार से टकराव नहीं चाहते लेकिन अगर हमारी बात नहीं सुनी जाएगी तो सड़क ही आखिरी रास्ता है। उनका कहना है कि वेतन वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा और स्थायी रोजगार की गारंटी जैसे मुद्दों पर सरकार क्यों चुप है?
राजनीतिक दलों का भारत बंद को समर्थन
दूसरी ओर, विपक्ष ने इस आंदोलन को खुला समर्थन दिया है। कांग्रेस नेताओं ने कहा है कि यह सिर्फ मजदूरों का संघर्ष नहीं बल्कि आम जनता की आवाज है। राहुल गांधी ने हाल ही में संसद में कहा था कि सरकार कारपोरेट हितों की रक्षा कर रही है मजदूरों और युवाओं की नहीं। समाजवादी पार्टी और वाम दलों ने भी भारत बंद का समर्थन किया है। उनका कहना है कि निजीकरण और श्रम सुधारों के नाम पर सामाजिक सुरक्षा कमजोर की जा रही है। वामपंथी नेता ने कहा कि जब संसद में सवालों को दबाया जाता है तो सड़क जवाब देती है।
मजदूर हितों को कमजोर किया जा रहा है!
ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि नई श्रम संहिताओं के जरिए मजदूरों के अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है। स्थायी रोजगार घट रहे हैं ठेका प्रणाली बढ़ रही है और निजीकरण के नाम पर सरकारी संपत्तियां बेची जा रही हैं। ट्रेड यूनियनों का कहना है कि सरकार ने उद्योगों और कारपोरेट घरानों को राहत दी लेकिन मजदूरों की आवाज को हाशिये पर डाल दिया। हालांकि कहानी में ट्विस्ट भी है। कुछ ट्रेड यूनियनों ने खुद को इस भारत बंद से अलग रखने का फैसला किया है। उनका तर्क है कि आंदोलन का तरीका अलग हो सकता है लेकिन संवाद जरूरी है। यही दरार इस आंदोलन को दिलचस्प भी बनाती है। क्या यह व्यापक जनआंदोलन बनेगा या सीमित राजनीतिक विरोध बनकर रह जाएगा?
मजदूरों-किसानों की आवाज़ नजऱअंदाज़ हुई : राहुल
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नई श्रम संहिताओं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के कारण देश के मजदूरों और किसानों का भविष्य अंधकार में है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया कि क्या वे जनता की आवाज सुनेंगे या उन पर किसी बाहरी ग्रिप (पकड़) का प्रभाव बहुत मजबूत है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने चार श्रम संहिताओं का हवाला देते हुए बृहस्पतिवार को आरोप लगाया कि मजदूरों और किसानों के भविष्य को नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मजदूरों और किसानों की सुनेंगे या उन पर किसी ग्रिप की पकड़ बहुत मजबूत है? राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट किया, ”आज देश भर में लाखों मजदूर और किसान अपने हक़ की आवाज बुलंद करने के लिए सड़कों पर हैं। मजदूरों को डर है कि चार श्रम संहिताएं उनके अधिकारों को कमजोर कर देंगी। उनके मुताबिक, किसानों को आशंका है कि (अमेरिका के साथ किया गया) व्यापार समझौता उनकी आजीविका पर चोट करेगा। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने कहा, ”मनरेगा को कमजोर या खत्म करने से गांवों का आखिरी सहारा भी छिन सकता है। जब उनके (मजदूरों और किसानों के) भविष्य से जुड़े फैसले लिए गए, तब उनकी आवाज को नजरअंदाज कर दिया गया।
आम आदमी पार्टी भी हड़ताल में शामिल
आम आदमी पार्टी ने 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों द्वारा गुरुवार को बुलाए गए राष्ट्रव्यापी भारत बंद का समर्थन करने का ऐलान किया है। पार्टी ने पंजाब सहित पूरे देश के मजदूरों, किसानों, दुकानदारों, छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों से शांतिपूर्ण तरीके से भारत बंद को सफल बनाने की अपील की है। आप ने स्पष्ट किया है कि यह बंद किसी एक राजनीतिक दल का कार्यक्रम नहीं है बल्कि करोड़ों मेहनतकश लोगों के स्वाभिमान न्याय और अधिकारों की लड़ाई है। पार्टी ने कहा कि वह इस संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़ी है और पंजाब सहित देशभर में उसके कार्यकर्ता मजदूरों और किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बंद में शामिल होंगे। पार्टी ने भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नीतियों पर हमला बोलते हुए उन्हें मजदूर विरोधी और किसान विरोधी करार दिया। आप प्रवक्ताओं ने कहा कि केंद्र द्वारा लागू किए गए नए लेबर कोड्स के जरिए मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला किया गया है। इन नए कानूनों से नौकरी की सुरक्षा कमजोर हुई है, कानूनी संरक्षण घटा है और नियुक्ति एवं छंटनी के मामलों में नियोक्ताओं को खुली छूट दे दी गई है। इससे करोड़ों मेहनतकश लोगों के अधिकार और हित गंभीर खतरे में पड़ गए हैं।
तीखी बहस अब सड़कों पर उतरी
संसद के भीतर चल रही तीखी बहस अब सड़कों पर उतर आयी है। सदन में विपक्ष के हमलों से जूझ रही सरकार के सामने अब एक और चुनौती भारत बंद के रूप में खड़ी हो गई है। ट्रेड यूनियनों ने मजदूरों के अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए हड़ताल का बिगुल फूंक दिया है। और इस बार मामला सिर्फ वेतन, श्रम कानून या ठेका प्रथा तक सीमित नहीं है बल्कि यह सीधा राजनीतिक टकराव बनता जा रहा है। बेरोजगारी, निजीकरण, श्रम संहिताओं और महंगाई जैसे मुद्दों पर उठे सवालों का असर अभी थमा भी नहीं था कि सड़कों पर मजदूर संगठनों ने मोर्चा खोल दिया। यह संयोग है या सियासी रणनीति यह बहस अलग है लेकिन तस्वीर साफ है कि सरकार पर दबाव बढ़ रहा है।
राज्यों को सर्तक रहने के निर्देश
केन्द्र सरकार ने भी अपनी तैयारी कर ली है। गृह मंत्रालय ने राज्यों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। सत्ता पक्ष का कहना है कि भारत बंद राजनीति से प्रेरित है और देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की कोशिश है। केन्द्र सरकार के मुताबिक सुधारों का विरोध विकास का विरोध है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह टकराव सिर्फ श्रम कानूनों का नहीं है। यह उस व्यापक असंतोष का संकेत भी हो सकता है जो बेरोजगारी, महंगाई और असुरक्षा की भावना से जुड़ा है। अगर यह आंदोलन लंबा चला और जनसमर्थन बढ़ा, तो सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
तेजी से बदल रही है सियासत की दशा
सरकार का रुख भी सख्त है। सरकार का कहना है कि सुधारों के बिना अर्थव्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। सरकार का दावा है कि श्रम सुधार रोजगार सृजन के लिए जरूरी हैं और विपक्ष सिर्फ भ्रम फैला रहा है। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक है तो सड़कों पर गुस्सा क्यों है? लोकतंत्र में जब संसद और सड़क दोनों एक साथ गरम हो जाएं तो सियासत की दिशा बदल सकती है।




