पीएम मोदी का इजरायल दौरा : गाजा पर खामोशी कूटनीति या फिर आत्मसमर्पण!

  • अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था इजरायल को अरबों की जमीन खाली करनी होगी ड़ 
  • आज दुनिया देख रही है भारत अपने सबसे कठिन नैतिक इम्तिहान में क्या कर रहा है
  • कभी-कभी एक शब्द बोलना साहस बन जाता है और न बोलना समर्पण
  • अन्याय के खिलाफ खड़े होने से विश्वगुरु की पहचान बनती है या फिर आर्थिक साझेदारी से

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। पीएम मोदी इजरायल में हैं और भारत के भीतर से आवाज उठ रही है कि उन्हें वहां गाजा में शांति के लिए नेतन्याहूं के सामने कम से कम बयान जारी करना चाहिए । कांग्रेस ने मांग की है कि पीएम मोदी इजरायल में गाजा के मुद्दे को उठाएं। सोशल मीडिया पर पूर्व पीएम अटल बिहारी बाजपेई का पुराना वीडियो भी तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें वह खुलकर कह रहे है कि हम गुण और अवगुण के आधार पर देखेंगे, मध्यपूर्व के बारे में स्थिति साफ हो कि अरबो की जिस जमीन पर इजरायल कब्जा करके बैठा है उसे वह जमीन खाली करनी होगी। यह वही भारत है जिसने कभी फिलिस्तीन की आजादी को नैतिक समर्थन देकर वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने का दावा किया था। लेकिन आज वही भारत अपने सबसे शक्तिशाली नेता की चुप्पी के कारण सवालों के कटघरे में खड़ा है। क्या यह चुप्पी कूटनीति की मजबूरी है या नैतिकता की कीमत पर बनाई जा रही नई वैश्विक दोस्ती? बेंजामिन नेतन्याहू के साथ खड़े होकर गाजा का नाम तक न लेना केवल एक शब्द की कमी नहीं बल्कि उस ऐतिहासिक भूमिका से पीछे हटना है जिस पर भारत ने दशकों तक गर्व किया। अब सवाल केवल विपक्ष या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आरोपों का नहीं है बल्कि उस नैतिक पहचान का है जिसे भारत दुनिया के सामने प्रस्तुत करता रहा है। क्या भारत अब केवल रणनीतिक साझेदारियों का देश बनकर रह गया है या फिर वह अभी भी मानवता की आवाज बनने का साहस रखता है? पीएम मोदी की यह खामोशी केवल एक कूटनीतिक क्षण नहीं है बल्कि इतिहास का वह पन्ना बन सकती है जहां भारत की आत्मा और उसकी राजनीति आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही है।

राष्ट्र की छवि पर असर डालती है चुप्पी

यह चुप्पी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस राष्ट्र की छवि पर असर डालती है, जिसने हमेशा खुद को न्याय और संतुलन का प्रतीक बताया है। भारत की ताकत केवल उसकी सेना या उसकी अर्थव्यवस्था नहीं रही बल्कि उसकी नैतिक स्थिति रही है। जब भारत बोलता था तो दुनिया सुनती थी। लेकिन जब भारत खामोश हो जाता है तो दुनिया सवाल पूछती है। आज वही सवाल भारत के सामने खड़ा है कि क्या यह चुप्पी कूटनीति की मजबूरी है या नैतिकता की हार? क्या यह नया भारत है जहां रणनीतिक हित इंसानियत की आवाज से बड़े हो गए हैं? या फिर यह केवल एक क्षणिक खामोशी है जो आने वाले समय में टूटेगी? इतिहास इस यात्रा को केवल एक राजनयिक दौरे के रूप में याद नहीं रखेगा। इतिहास इसे उस पल के रूप में दर्ज करेगा जब दुनिया जल रही थी और भारत की आवाज जो कभी आग बुझाने के लिए जानी जाती थी खुद राख के नीचे दब गई थी।

मानवता की पीड़ा पर चिंता जताने वाले प्रधानमंत्री

जब पूरी दुनिया गाजा की जलती हुई गलियों मलबे में दबे बच्चों और खामोश होती सांसों की गिनती कर रही है तब विश्व की सशक्त आवाज का दम्भ भरने वाले पीएम नरेंद्र मोदी की चुप्पी सबसे ज्यादा गूंज रही है। सार्वजनिक मंचों से गाजा के हालात को देखकर मानवता की पीड़ा पर चिंता जताने वाले प्रधानमंत्री ने जैसे ही इजरायल की धरती पर कदम रखा गाजा का जिक्र उनकी जुबान से गायब हो गया। न कोई अपील न कोई सवाल न कोई चेतावनी बस कूटनीतिक मुस्कान और रणनीतिक खामोशी की चादर ओढ़ ली इजरायल की धरती पर उनके शब्द जैसे कूटनीतिक बंकर में छिप गए। यह चुप्पी साधारण नहीं है। यह चुप्पी उस भारत की परंपरा के खिलाफ है जिसने कभी दमन के खिलाफ खड़े होने को अपनी पहचान बनाया था। यह वही भारत था जिसने फिलिस्तीन के अधिकारों के समर्थन को केवल कूटनीति नहीं बल्कि नैतिक कर्तव्य माना था। लेकिन आज जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ खड़े हैं तब गाजा का दर्द उनकी जुबान तक पहुंच ही नहीं पा रहा। सवाल यह नहीं कि मोदी ने क्या कहा सवाल यह है कि उन्होंने क्या नहीं कहा। क्योंकि कभी कभी एक शब्द बोलना साहस होता है और एक शब्द न बोलना समर्पण। यह वही प्रधानमंत्री हैं जो वैश्विक मंचों पर भारत को विश्वगुरु बताते हैं। लेकिन क्या विश्वगुरु की पहचान केवल आर्थिक साझेदारी से बनती है या फिर अन्याय के खिलाफ खड़े होने के साहस से भी बनती है? अगर विश्वगुरु की आवाज ही खामोश हो जाए तो फिर यह गुरु किसे रास्ता दिखाएगा? आज दुनिया देख रही है कि भारत अपने सबसे कठिन नैतिक इम्तिहान में क्या कर रहा है। सत्ता के साथ खड़ा है या सच के साथ।

कांग्रेस ने उठाए हैं तीखे सवाल

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस चुप्पी को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर प्रधानमंत्री इजरायल की धरती पर खड़े हैं तो उन्हें वहीं से गाजा के पीडि़तों की आवाज भी उठानी चाहिए। क्योंकि कूटनीति केवल दोस्ती निभाने का नाम नहीं है बल्कि सच बोलने का साहस भी है। लेकिन अभी तक पीएम मोदी की यात्रा से जो तस्वीर सामने आई है उसमें रणनीति दिखती है संवेदना नहीं साझेदारी दिखती है लेकिन सवाल नहीं।

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