मोदी-शाह ने मिलकर नीतीश कुमार के साथ किया बड़ा खेला, चुनाव से पहले अखिलेश ने क्या कहा था?

नीतीश कुमार जो पलटी मारकर दूसरों को मुख्यमंत्री की कुर्सी से गिराकर खुद उसपर बैठ जाते थे और उसको छोड़ने का नाम तक नहीं लेते थे।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: नीतीश कुमार जो पलटी मारकर दूसरों को मुख्यमंत्री की कुर्सी से गिराकर खुद उसपर बैठ जाते थे और उसको छोड़ने का नाम तक नहीं लेते थे। लेकिन अब मोदी शाह ने नीतीश कुमार की सारी राजनीति को पलट कर रख दिया है।

कल तक जो मोजी शाह चुनाव जीतने के लिए बिहार चुनामव जीतने के लिए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाकर गए थे  आज उन्हीं मोदी शाह ने बिहार में एक बड़ा खेला करते हुए नीतीश चाचा को मुख्यमंत्री पद से मुक्त करके उन्हें राज्यसभा भेजने की तैयारी कर ली है ताकि अपना मुख्यमंत्री बना कर बिहार पर टोटल कंट्रोल मिल जाए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस उलटफेर की भविष्यवाणी चुनाव के दौरान ही कर दी थी।

  सपा प्रमुख अखिलेश यादव का एक पुराना बयान सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है जिसमें वो नीतीश कुमार को चुनावी दूल्हा बता रहे हैं। तो कैसे मोदी शाह ने मिलकर नीतीश कुमार के साथ बड़ा खेला कर दिया और आखिर अखिलेश यादव ने नीतीश कुमार को लेकर पहले से बीजेपी के इरादे साफ सर दिये थे।

राज्यसभा के लिए नामांकन करते ही नीतीश कुमार की राजनीतिक 360 डिग्री पर घूम गई है। नीतीश कुमार ने 2005 में लोकसभा सदस्य रहते बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इसके बाद से बिहार की सत्ता नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द सिमटी रही, लेकिन अब 21 साल के बाद सीएम रहते हुए नीतीश कुमार को राज्यसभा जाने वाले हैं। लेकिन मोदी शाह ने ये ऐसे ही नहीं हवा में कर दिया है।

इसके पीछे बहुत लंबी चौड़ी प्लानिंग की गई। अब याद कीजिये पिछले साल बिहार में चुनावी माहौल बना हुआ था उस वक्त एनडीए की तरफ से सीएम फेस घोषित न करने को लेकर सियासी बवैल मचा हुआ था। बीजेपी के नेता नीतीश कुमार को अपना सीएम फेस बताने से बचते नजर आ रहे थे।

अमित शाह ने तो अंजना ओम कश्यप के साथ एक इंटरव्यू में तो साफ कह दिया था कि बिहार का अगला सीएम एनडीए से होगा लेकिन उन्होंने नीतीश कुमार के नाम पर मुहर लगाने से साफ इनकार दिया था। उनके इसी इंटरव्यू के बाद  बिहार में सियासी भूचाल आ गया। जेडीयू के नेताओं ने बगावत की चिंगारी छोड़ दी। नीतीश के करीबी नेताओं के बयान आने लगे, मंच से नारे लगने लगे। यहां तक की एनडीए के सहयोगी भी नीतीश के साथ और बीजेपी के खिलाफ खड़े होने लगे। जीतन राम मांझी खुलकर नीतीश कुमार के साथ खड़े हो गए थे। स्थिति बिगड़ती देख मोदी शाह को अकल आई कि उन्होंने नीतीश को सीएम फेस न घोषित करके बहुत बड़ी भूल कर दी है।

वहीं बीजेपी के पास उस वक्त कोई ऐसा चेहरा भी नहीं था जिसे बिहार की जनता स्वीकार कर सके। ऐसे में मजबूरन बीजेपी नेताओं ने बोलना शुरू किया कि वो नीतीश कुमार से ही सीएम पद की शपथ दिलवाएंगे। फिर धीरे धीरे अमित शाह भी कहने लगे कि नीतीश कुमार को ही सत्ता सौंपी जाएगी। लेकिन मोदी जी ने एक बार नहीं कहा कि नीतीश कुमार ही अगले मुख्यमंत्री बनेंगे।

चुनाव हुआ, एनडीए भारी मतों से जीती। बीजेपी की अच्छी खासी सीटें आई। जेडीयू ने भी कमाल कर दिया। इसी के बल पर नीतीश कुमार ने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ के बाद तो नीतीश कुमार मोदी के चरणों में पड़ गए थे लेकिन लगता है कि मोदी शाह ने पहले से ही नीतीश कुमार को साइडलाइन करने का फैसला कर दिया था।

विपक्ष की बात सच निकली। चुनावों में नीतीश के नाम का इस्तेमाल करके मोदी शाह ने उनको राज्यसभा भेजने का फैसला कर लिया। इस बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का एक पुराना बयान बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वो नीतीश कुमार को आगाह करते हुए बीजेपी की चालों का खुसाला कर रहे हैं। उनके इन बयानों को नीतीश चाचा अगर सुन लेते तो उनका कुछ भला हो जाता। इस बयान में अखिलेश साफ तौर पर बता रहे हैं कि नीतीश कुमार केवल चुनावी दूल्हा हैं। चुनाव के बाद दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया जाएगा। देखिए उन्होंने और क्या कुछ कहा था।

सवाल उठता है कि आखिर बीजेपी ने नीतीश कुमार का ही क्यों फायदा उठाया? आखिर क्यों नीतीश कुमार को ही बीजेपी को अपना चेहरा बताना पड़ा था? बिहार में नीतीश कुमार का कद कितना बड़ा है जिसे समाप्त करने के लिए मोदी शाह को इतनी मेहनत करनी पड़ी? और कैसे मोदी शाह ने उनकी लेगेसी को खत्म कर दिया है? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के साथ ही राजनीति का एक अध्याय ख़त्म हो रहा है। वो मुख्यमंत्री का पद अगले कुछ दिनों में छोड़ देंगे और एक नया मुख्यमंत्री आ जाएगा। बिहार के लिए ये एक सामान्य घटना नहीं है। ये सिर्फ़ नीतीश कुमार के क़रीब 19 साल पुराने शासन का अंत नहीं है, बल्कि इसके साथ ही राज्य से 1974 के छात्र आंदोलन से उपजे नेताओं का दबदबा ख़त्म हो जाएगा।

1974 के नेताओं में सिर्फ़ दो- लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच पाए लेकिन 1990 के बाद क़रीब 35 सालों तक सरकार पर इस आंदोलन से निकले नेताओं का दबदबा रहा।बिहार आंदोलन से निकले ज्यादातर नेता, जेपी, लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी विचारों से प्रभावित थे। बीजेपी के साथ सरकार में रहने के बावजूद नीतीश को समाजवादियों का आख़िरी कड़ी कहा जाता है। जयप्रकाश नारायण उर्फ़ जेपी, डॉ. राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर का समाजवादी सोच भी अब बिहार की राजनीति में आख़िरी सांस ले रहा है। नीतीश कुमार ने 2005 में ‘सुशासन’ के नारे के साथ मुख्यमंत्री की दूसरी पारी शुरू की थी।

इसलिए लंबे समय तक वो प्यार से ‘सुशासन बाबू’ भी पुकारे जाते थे। 1990 से 2005 तक लालू यादव के शासन को नीतीश और बीजेपी ने ‘जंगल राज’ का नाम दिया था। इसके मुक़ाबले नीतीश के राज को साफ़-सुथरा और व्यवस्थित कहा जाता रहा है। लालू और नीतीश दोनों ने बिहार में सांप्रदायिक सदभाव क़ायम रखा। लेकिन अब बिहार संप्रदायिकता का जहर घोलने के लिए मोदी शाह ने ऐसा जाल बिछाया जिसमें नीतीश कुमार अब बुरी तरह से फंस गए हैं। मोदी शाह ने बिहार में अपना मुख्यमंत्री बिठाने के लिए नीतीश कुमार की इतनी बड़ी लेगेसी एक ही झटके में समाप्त कर दिया है।

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