अमेरिका-ईरान युद्ध: राष्ट्रपति का दावा, पेंटागन की सीक्रेट ब्रीफिंग ने बदली तस्वीर
अफसरों ने देश के सांसदों के साथ हुई ब्रीफिंग में जो कुछ बताया है, वह न सिर्फ लीक हो गया है, बल्कि इसको लेकर भयंकर हड़कंप भी मच गया है

4पीएम न्यूज नेटवर्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान से हो रही जंग में न सिर्फ अपनी जीत का ढोल बहुत तेज-तेज रहे हैं बल्कि खुद ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू’ बनने का स्वांग भी रच रहे हैं। , लेकिन अचानक उनके ही अफसरों ने एक गोपनीय ब्रीफिंग में ट्रंप के झूठे दावों पर तगड़ा वाला पलीता लगा दिया है।
अफसरों ने देश के सांसदों के साथ हुई ब्रीफिंग में जो कुछ बताया है, वह न सिर्फ लीक हो गया है, बल्कि इसको लेकर भयंकर हड़कंप भी मच गया है और पूरे मामले ने ट्रंप की पोल खोल दी है। अब हर ओर यह सवाल खड़ा होने लगा है कि आखिर ट्रंप ने यह जंग क्यों और किसके इशारे पर शुरू की गई? अमेरिकी सांसदों के साथ सीक्रेट ब्रीफिंग में कौन सी बात पेंटागन के अफसरों ने बताई है और क्यों इसके लीक होते ही हंगामा मचा है,
अमेरिकी राष्ट्रपति दो दिन पहले बड़ा दावा पेश कर चुके हैं कि ईरान के साथ वो जंग के ‘फाइनल राउंड’ में हैं, यानी कि जंग खत्म होने की ओर तेजी से आगे बढ़ रही है। लेकिन सच बिल्कुल इसके उलट है; ये हमारा दावा नहीं, ये पेंटागन का दावा है। पेंटागन पहले ही ये बात साफ कर चुका है कि जंग अभी शुरू हुई है और इसे मंजिल तक पहुँचाने में समय लगेगा। लेकिन जब पेंटागन के आला अफसरों ने अमेरिका के सांसदों के साथ सीक्रेट जानकारी साझा की, तो उसमें बहुत ही चौंकाने वाली बातें सामने आईं।
अमेरिकी अफसरों का मानना है कि ईरान पर अटैक करके अमेरिका बुरी तरह फंस गया है। गोपनीय ब्रीफिंग में खुद अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने सांसदों के सामने माना है कि युद्ध की प्लानिंग में इतनी गलतियां हैं कि इसे ‘डिजास्टर’ कहें तो कम है। 140 से ज्यादा अमेरिकी फौजी घायल, 6 की मौत! और ये सिर्फ शुरुआत है। ट्रंप प्रशासन का दावा था कि ईरान घुटने टेक देगा, लेकिन ईरान ने जो पलटवार किया है, उसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
वैसे भी दुनिया में कहीं भी जब कोई जंग लड़ी जाती है, तो सबसे पहले सेना के जनरल और खास रणनीतिकारों से पूरा सलाह-मशविरा किया जाता है। जंग से होने वाले सभी तरह के परिणामों पर चर्चा की जाती है। अमेरिका में तो कोई भी जंग लड़ने से पहले बाकायदा कांग्रेस यानी संसद से पास कराना जरूरी होता है, लेकिन ट्रंप ने इसे दरकिनार कर दिया और अपने वीटो पावर का प्रयोग करते हुए अमेरिका को जंग की आग में झोंक दिया।
हाँ, इतना जरूर है कि बाद में अमेरिकी सांसद इसके लिए प्रस्ताव लाए और ये प्रस्ताव ट्रंप के ही पक्ष में रहा, लेकिन फिर भी ईरान पर अटैक को लेकर अमेरिका के लोग बहुत खुश नहीं बताए जाते हैं। दावा है कि सर्वे रिपोर्ट में आया है कि जंग से सिर्फ 30 प्रतिशत लोग ही खुश हैं। इसके बाद भी ट्रंप साहब ने जंग छेड़ रखी है। दावा किया जा रहा है कि असल में इस पूरे गेम के दो मास्टरमाइंड हैं, जो ट्रंप के ईरान मामले में सुरक्षा सलाहकार हैं।
इसमें एक नाम जेरेड कुश्नर का है जो ट्रंप के दामाद हैं और दूसरे एक रियल एस्टेट डेवलपर स्टीवन विटकॉफ हैं। कहा जाता है कि इन्हीं की सलाह पर ट्रंप जंग के लिए तैयार हुए हैं और बाकी खेल नेतन्याहू का है। कहा जा रहा है कि इन लोगों ने ट्रंप को समझाया कि ईरान तो बस एक छोटा सा खिलाड़ी है। इन्होंने ईरान की प्रतिक्रिया को इतना हल्का आंका कि आज स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद पड़ा है, तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल को छू रही हैं और अमेरिका में महंगाई ने आम आदमी की सांसें रोक दी हैं।
सीक्रेट रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि खुद जनरल डैन केन ने ट्रंप को चेतावनी दी थी कि “साहब, यह जोखिम भरा है”, लेकिन ट्रंप को तो अपनी कुर्सी और नेतन्याहू का इशारा प्यारा था। नेतन्याहू ने ट्रंप को इस युद्ध में धकेला और ट्रंप बिना सोचे-समझे कूद पड़े। अब हालत ये है कि मार्को रुबियो और पीट हेगसेथ, जो कल तक ‘जंग-जंग’ चिल्ला रहे थे, अब एग्जिट प्लान ढूंढ रहे हैं।
सीनेटर रिचर्ड ब्लुमेंथल का बाकायदा मीडिया में बयान आया है और उन्होंने खुलकर ट्रंप सरकार की मुखालफत करते हुए कहा है कि ईरान जंग को लेकर कोई ‘एंडगेम’ नहीं दिखता और हालात परेशान करने वाले हैं। सीनेटर का दावा है कि ट्रंप कहते हैं कि युद्ध लगभग पूरा हो गया है, लेकिन पेंटागन कहता है कि यह “अभी शुरू हुआ है।” ऐसे में डेमोक्रेट्स ने चेतावनी दी है कि यह मध्य पूर्व में एक और लंबा युद्ध बन सकता है, जिसमें अमेरिकी सैनिकों की जान जाएगी और अरबों डॉलर खर्च होंगे।
अब तक 150 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक घायल हो चुके हैं और 6 की मौत हुई है। अमेरिका ईरान के परमाणु स्टॉकपाइल को सुरक्षित करने के लिए स्पेशल फोर्सेस भेजने पर विचार कर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह बहुत जोखिम भरा है। ईरान के पास कम से कम 10 परमाणु हथियार बनाने लायक सामग्री है। डेमोक्रेट्स का मानना है कि तेल की कीमतें 120 डॉलर तक पहुँच गई हैं और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद है, ऐसे में गल्फ देशों पर हमले बढ़ सकते हैं।
गोपनीय ब्रीफिंग से जो सबसे बड़ा संकेत निकलकर आया है, वो ये है कि युद्ध की कोई समयसीमा नहीं है। ट्रंप प्रशासन के मिले-जुले संदेशों से असमंजस बढ़ रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्जियन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, सांसदों ने कहा कि हालात सोच से भी ज्यादा बदतर हैं। वहीं दूसरी ओर सीनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने पूरी जंग को अवैध करार दिया है और कहा है कि “यह युद्ध झूठ की बुनियाद पर खड़ा है।” सीनेटर का दावा है कि ट्रंप ने अपनी तानाशाही से एक ऐसा युद्ध शुरू किया, जिसके लिए आने वाली पीढ़ियां उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी।
ट्रंप को लग रहा था कि वो अकेले ईरान को खत्म कर देंगे, पर हुआ क्या? दुनिया पूरी तरह से अस्थिर हो गई है। रूस, जो इस जंग को और जटिल बना रहा है, वो तो किनारे से बैठकर देख रहा है कि कैसे अमेरिका अपनी साख और अपना पैसा पानी में बहा रहा है। ईरान का परमाणु स्टॉकपाइल आज भी एक पहेली है। स्पेशल फोर्सेस भेजने की बात हो रही है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि यह आत्मघाती हमला होगा।
ट्रंप प्रशासन को अपनी गलतियों का एहसास तब हो रहा है, जब तेल 120 डॉलर पहुँच गया है। ईरान की ओर से हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की आशंका के बीच सऊदी अरब ने तेल भेजने का दूसरा रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी ‘अरामको’ ने कुछ खरीदारों से कहा है कि वे अब लाल सागर के यनबू बंदरगाह से तेल की खेप उठाएं। आम तौर पर सऊदी अरब अपना करीब 90 प्रतिशत तेल रास तनुरा बंदरगाह से निर्यात करता है, लेकिन यह बंदरगाह हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से जुड़ा है, इसलिए जोखिम बढ़ने पर दूसरा रास्ता चुना जा रहा है।
रास तनुरा से तेल पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन के जरिए यनबू बंदरगाह तक पहुँचाया जाता है। यह पाइपलाइन हर दिन करीब 50 लाख बैरल तेल भेज सकती है, जबकि यनबू बंदरगाह की क्षमता लगभग 45 लाख बैरल प्रतिदिन है। इस बीच मिस्र ने भी मदद की पेशकश की है। उसने कहा है कि उसकी ‘सुमेड पाइपलाइन’ के जरिए सऊदी तेल को भूमध्य सागर तक पहुँचाया जा सकता है, लेकिन अभी भी संकट पूरी दुनिया पर बना हुआ है क्योंकि ईरान दुनिया की कुल खपत का लगभग 5 प्रतिशत तेल अकेले ही निर्यात करता है।
ऐसे में ‘अमेरिका फर्स्ट’ का वादा करने वाले ट्रंप आज अपनी ही नीतियों के जाल में फंस गए हैं। न कोई एंडगेम है, न कोई स्पष्ट रणनीति। बस एक हठ है और इस हठ का खामियाजा अमेरिकी फौजी अपनी जान देकर और अमेरिकी अवाम अपनी जेब खाली करके चुका रही है। वैसे भी ट्रंप और नेतन्याहू की ये जोड़ी इतिहास में इंसानियत के गुनहगारों के तौर पर दर्ज होगी। अगर ये युद्ध जल्द नहीं थमा, तो ट्रंप का दूसरा कार्यकाल उनके लिए राजनीतिक कब्रिस्तान साबित होगा।
डेमोक्रेट्स अब सड़कों पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं, पब्लिक हियरिंग्स की मांग तेज हो गई है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका सच में ईरान के साथ कभी न खत्म होने वाली जंग के लिए तैयार है? ट्रंप को ये समझना होगा कि दुनिया उनके बागीचे में लगी घास नहीं है, जिसे वो जब चाहें काट दें। अगर आज भी ये नहीं रुके, तो आने वाला वक्त इनका नामो-निशान मिटा देगा.



