रील से घबराई सत्ता

- 4PM की पत्रकार फिजा की रील देश में प्रतिबंधित
- सोचिए सरकार कितनी डरी हुई!
- सवालों के घेरे में आई अभिव्यक्ति की आजादी
- 2.2 मिलियन रीच वाली इंस्टा रील पर रोक, यूट्यूब के बाद सोशल मीडिया पर भी शिकंजा
- 4PM चैनल को बंद करने के बाद इंस्टा रील पर सरकारी कार्रवाई
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। डर का चेहरा कैसा होता है? शायद वैसा ही जैसा इन दिनों सत्ता के फैसलों में दिखाई दे रहा है। एक इंस्टाग्राम रील महज कुछ मिनटों में 2.2 मिलियन लोगों तक पहुंचती है और अचानक उस पर रोक लगा दी जाती है। सवाल उठता है कि क्या अब एक रील भी इतनी खतरनाक हो गई है कि उसे देश के भीतर दिखाना मंजूर नहीं? ताजा मामला 4पीएम न्यूज नेटवर्क की धाकड़ पत्रकार फिजा से जुड़ा है जिनकी एक इंस्टाग्राम रील को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह वही रील थी जिसमें उन्होंने 4पीएम के यूट्यूब चैनल पर हुई कार्रवाई को लेकर अपनी बात रखी थी। महज कुछ ही समय में यह रील वायरल हो गई और इसकी पहुंच 2.2 मिलियन से अधिक लोगों तक पहुंच गई। लेकिन इसी तेजी ने शायद इसे सत्ता की नजर में खटकने वाला बना दिया। दिलचस्प यह है कि कुछ दिन पहले ही 4पीएम के नेशनल यूट्यूब चैनल को भी सरकार ने बैन कर दिया था। यानी एक प्लेटफार्म के बाद दूसरे प्लेटफार्म पर शिकंजा कसता नजर आ रहा है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब 4पीएम सरकार के निशाने पर आया हो। अपने तीखे और बेबाक अंदाज के लिए पहचाना जाने वाला यह चैनल लंबे समय से सत्ता के लिए असहज सवाल खड़े करता रहा है।
संजय सर की परछाई
फिजा का कहना है कि उनका इंस्टाग्राम पेज निजी है जहां उनके करीब 89 हजार फालोअर्स हैं। वह अक्सर अपने काम से जुड़े वीडियो वहां साझा करती रही हैं। इस बार भी उन्होंने वही किया लेकिन नतीजा कुछ और ही निकला। उनका कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक रील पर भी इस तरह की कार्रवाई हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल प्लेटफार्मस पर बढ़ते नियंत्रण को लेकर बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ एक पत्रकार या एक चैनल का नहीं बल्कि उस स्पेस का है जहां आम लोग अपनी बात रखते हैं। फिजा यह भी कहती हैं कि उनके काम में संपादक संजय सर की छाया स्वाभाविक है और शायद यही तेवर उनके कंटेंट में भी दिखाई देता है। अब यह मामला सिर्फ एक रील का नहीं रह गया है। यह उस माहौल की तस्वीर बन चुका है जहां सवाल पूछना और उसे लाखों लोगों तक पहुंचाना दोनों ही जोखिम भरे काम बनते जा रहे हैं।
न्यायालय से न्याय की उम्मीद
इस पूरे विवाद के बीच अब नजरें न्यायालय की ओर टिक गई हैं। 4पीएम न्यूज नेटवर्क को उम्मीद है कि उसे एक बार फिर अदालत से राहत मिलेगी जैसा कि पहले भी हो चुका है। इससे पहले जब चैनल पर कार्रवाई हुई थी तब अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए उसे राहत दी थी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में संतुलन बनाने की कोशिश की थी। संपादक संजय शर्मा कहते है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की कार्रवाई कई संवैधानिक सवाल खड़े करती है। खासतौर पर जब मामला किसी पत्रकार के निजी प्लेटफार्म और उसके कंटेंट से जुड़ा हो।
4PM के एक और वीडियो की धूम किस-किस को बंद करोगे?
सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर 39 सेकंड के एक और वीडियो ने गर्दा काट दिया है। यह वीडियो गैस एजेंसी में कवरेज करने पहुंची 4पीएम की जाबांज पत्रकार आकांक्षा का है। इस वीडियो में एक युवक पत्रकार को कवरेज करने से यह कहकर रोक रहा है कि वह भी इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़ा है और आप वीडियो मत बनाओ। इसके बाद आकांक्षा उस युवक को बताती नजर आ रही है कि वह रिपोर्टिंग क्यों न करे। गौरतलब है कि सरकार जनता को मिलने वाली छोटी छोटी रहतें और जरूरतों को तो पूरा नहीं कर पा रही उल्टे उन लोगों को रोकने की जरूर कोशिश करती है जो लोग इन मुददों को उठाते हैं।
राजनीतिक दलों ने लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। कांग्रेस नेता शैलेन्द्र तिवारी ने इस कार्रवाई को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि सरकार आलोचना से बचने के लिए डिजिटल प्लेटफार्मस तक को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता अकील का मानना है कि यह कदम सरकार के भीतर के असुरक्षा भाव को दर्शाता है। उनके मुताबिक अगर एक रील से इतना खतरा महसूस हो रहा है तो यह स्थिति अपने आप में बहुत कुछ कहती है। समाजशास्त्री डीके त्रिपाठी इसे एक व्यापक सामाजिक संकेत के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि जब सत्ता अभिव्यक्ति के छोटे छोटे माध्यमों से भी असहज होने लगे तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन जाता है। अब सबकी उम्मीद न्यायालय की ओर है और भरोसा है कि न्यायालय इस मामले में न सिर्फ हस्तक्षेप करेगा बल्कि पूर्व की भांति सरकार को फटकार लगाते हुए राहत भी प्रदान करेगा। क्योंकि इससे पहले की निर्णयों में माननीय न्यायालय ने प्रतिबंध को लेकर अपने फैसलों में कड़ी टिप्पड़ी भी की थी। लेकिन सरकार बार बार भूल जाती है। सरकार के प्रतिबंध और फैसले लगातार उपहास का केन्द्र बन रहे हैं। सोनम वांगचुक की बेवाजह की गिरफ्तारी और उन्हें 6 महीने जेल में बिना सबूतों के रखना भी सवाल खड़े कर रहा है।
डिजिटल आजादी की बड़ी बहस का हिस्सा
4पीएम और उससे जुड़े लोग अदालत से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन यह मामला सिर्फ उनके लिए नहीं बल्कि उन सभी के लिए अहम है जो सोशल मीडिया को अपनी आवाज का मंच मानते हैं। डिजिटल दौर में अभिव्यक्ति के मायने बदल चुके हैं। अब अखबारों और टीवी स्टूडियो से निकलकर आवाज सीधे मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचती है। लेकिन जैसे जैसे यह आवाज मजबूत हुई है वैसे-वैसे उस पर नियंत्रण की कोशिशें भी तेज हुई हैं। हालिया घटनाक्रम ने इस बहस को और गहरा कर दिया है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म सच में आजाद हैं या फिर यहां भी अदृश्य सीमाएं तय की जा रही हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और एक्स ने आम लोगों को अपनी बात रखने का ऐसा मंच दिया है जो पहले कभी संभव नहीं था। एक साधारण रील या वीडियो कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। यही ताकत अब विवाद का कारण भी बनती जा रही है। भारत में आईटी नियमों और डिजिटल कंटेंट से जुड़े कानूनों को लेकर पहले भी बहस होती रही है। कई बार कंटेंट हटाने, अकाउंट ब्लाक करने या रीच सीमित करने जैसे कदमों ने यह सवाल खड़ा किया है कि फैसले कितने पारदर्शी हैं और उनके पीछे की प्रक्रिया क्या है।




