जंग से पहले ही पस्त America, क्या Iran बनेगा ‘सुपरपावर’ का काल?

ईरान के साथ बढ़ते तनाव में अमेरिका की समुद्री ताकत पर सवाल उठने लगे हैं

4पीएम न्यूज नेटवर्क: ईरान के साथ बढ़ते तनाव में अमेरिका की समुद्री ताकत पर सवाल उठने लगे हैं…कहा जा रहा है कि उसके बड़े-बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर भी चुनौती झेल रहे हैं…इससे ये बहस तेज हो गई है कि क्या अमेरिका की नौसैनिक ताकत सिर्फ दिखावे तक सीमित रह गई है…

दुनिया की ताकत का असली पैमाना अक्सर जमीन या आसमान नहीं, बल्कि समुद्र होता है…इतिहास गवाह है कि जिस देश की समुद्र पर पकड़ मजबूत होती है…वही वैश्विक राजनीति में सबसे प्रभावशाली बनकर उभरता है…लगभग सौ साल पहले ये ताकत ब्रिटेन के पास थी…

उसकी नौसेना इतनी शक्तिशाली थी कि कहा जाता था कि…ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता…लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद हालात बदले और ये समुद्री वर्चस्व अमेरिका के हाथों में चला गया…जिसके बाद अमेरिका की नौसेना दुनिया की सबसे ताकतवर बन गई और वो नया सुपरपावर बनकर उभरा…

शीत युद्ध के दौर में सोवियत यूनियन ही एकमात्र ऐसा देश था…जो समुद्र में अमेरिका को चुनौती दे सकता था…लेकिन सोवियत संघ के टूटने के बाद अमेरिका लगभग अकेला सुपरपावर बन गया…लंबे समय तक उसकी नौसेना की ताकत पर कोई सवाल नहीं उठा…लेकिन अब मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ चल रही जंग ने इस ताकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं…

मौजूदा हालात को देखते हुए ये कहा जा रहा है कि अमेरिका की नौसेना की असली क्षमता अब सामने आ रही है…जिस नेवी को दुनिया अजेय मानती थी…वही अब कई मोर्चों पर कमजोर नजर आ रही है…खासकर एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे उसके सबसे बड़े हथियार अब सवालों के घेरे में हैं…

अमेरिका के पास कुल 11 परमाणु ऊर्जा से चलने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर हैं…जिन्हें उसकी ताकत का प्रतीक माना जाता है…लेकिन हकीकत ये है कि इनमें से सभी एक साथ युद्ध के लिए तैयार नहीं रहते….रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय केवल तीन या चार कैरियर ही पूरी तरह ऑपरेशन के लिए तैयार हैं…बाकी या तो मरम्मत में हैं या किसी और मिशन में लगे हुए हैं…….

ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने अपने कई कैरियर मिडिल ईस्ट में तैनात किए…लेकिन जंग के दौरान समस्याएं सामने आने लगीं…एक प्रमुख कैरियर में आग लगने की खबर आई…जिसके बाद उसे वापस लौटना पड़ा…वहीं, कुछ और जहाज लंबे समय से मरम्मत का इंतजार कर रहे हैं…श्रमिकों की कमी और जरूरी पार्ट्स की availability न होने के कारण इनकी मरम्मत में देरी हो रही है….

एक और चिंता की बात ये सामने आई कि कुछ कैरियर…जो पहले ही पुराने हो चुके हैं…उन्हें भी मजबूरी में सेवा में बनाए रखा गया है…नए जहाज समय पर तैयार नहीं हो पाए…इसलिए पुराने प्लेटफॉर्म्स पर ही निर्भरता बढ़ गई है…इससे जोखिम और बढ़ गया है…क्योंकि आधुनिक युद्ध में तकनीकी रूप से उन्नत हथियारों के सामने पुराने जहाज ज्यादा सुरक्षित नहीं माने जाते………

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ईरान ने इस जंग में अपनी रणनीति से अमेरिका को चौंका दिया है….उसने सीधे-सीधे समुद्री रास्तों पर दबाव बनाया…खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मार्ग पर…….आपको बता दें कि ये दुनिया का एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है…जहां से बड़ी मात्रा में तेल की सप्लाई होती है…ईरान ने यहां अपनी पकड़ मजबूत करके अमेरिका को चुनौती दी…

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुरुआत में दावा किया था कि…अमेरिका अकेले ही ये जंग जीत सकता है..उन्होंने यूरोपीय देशों पर भी निशाना साधा…जब वो इस संघर्ष में खुलकर शामिल नहीं हुए…लेकिन जैसे-जैसे हालात बिगड़ते गए…ये साफ होता गया कि ये जंग उतनी आसान नहीं है…

जितनी शुरुआत में समझी गई थी…नाटो जैसे बड़े सैन्य गठबंधन का भी इस मामले में पूरा समर्थन नहीं मिला…इससे अमेरिका पर दबाव और बढ़ गया…अब उसे लगभग अकेले ही इस जंग का सामना करना पड़ रहा है………दूसरी तरफ, ईरान ने मिसाइल और समुद्री रणनीति के जरिए ये दिखा दिया कि वो किसी भी बड़ी ताकत को चुनौती देने की क्षमता रखता है…..

हमने देखा भी कि कैसे एक ओर डोनाल्ड ट्रंप ईरान को धमकी देते हैं कि 48 घंटे में स्टेट ऑफ होमुर्ज का रास्ता खोल दो…वरना हम तुम्हारे पावर प्लानंट्स तबाह कर देंगे…तो वहीं दूसरी ओर ईरान, इरजराइल के न्यूक्लियर सिटी पर हमला कर देता है.ईरान का जबरदस्त पलटवार, इजरायल की न्यूक्लियर सिटी ‘डिमोना’ पर किया मिसाइल अटैक, दर्जनों लोग घायल…….

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बीच इजरायल के दक्षिणी शहर डिमोना पर ईरानी मिसाइल हमले की खबर सामने आई है…इजरायल के अनुसार, ये मिसाइल उस इलाके में गिरी जहां देश का परमाणु संयंत्र स्थित है…हमले में कई लोग घायल हुए हैं………..यानी ईरान सीधे तौर पर कहना चाहता है कि वो हार मानना तो दूर पीछे हटने को भी तैयार नहीं है….

इसे लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी सीमित संख्या में उपलब्ध युद्ध के लिए तैयार जहाज हैं…अगर इन जहाजों पर लगातार दबाव बना रहता है…तो उनके खराब होने का खतरा भी बढ़ जाता है….और अगर जंग के दौरान एक भी बड़ा कैरियर नुकसान झेलता है…तो ये अमेरिका के लिए सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि उसकी वैश्विक छवि के लिए भी बहुत बड़ा झटका होगा……

दरअसल, ईरान के पास एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल जैसी आधुनिक तकनीक है…जो बड़े-बड़े जहाजों को निशाना बना सकती है…ऐसे में अमेरिका के महंगे और सीमित कैरियर उसके लिए आसान लक्ष्य बन सकते हैं…यही वजह है कि अमेरिकी सेना के भीतर भी इस जंग को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है…हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि…अमेरिका के रक्षा तंत्र ने भी कुछ आक्रामक योजनाओं पर पीछे हटने की सलाह दी है….खासकर होर्मुज क्षेत्र में सीधे सैन्य कार्रवाई को लेकर ये कहा गया कि…वहां जोखिम बहुत ज्यादा है…यानी जमीन पर जो बयान दिए जा रहे हैं….हकीकत उससे अलग दिखाई दे रही है…

ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि अगर अमेरिका को ईरान जैसे देश से इतनी चुनौती मिल रही है…तो अगर उसका सामना चीन या रूस जैसी बड़ी ताकतों से होता है तो क्या होगा?…..चीन पहले ही अपनी नौसेना को तेजी से मजबूत कर चुका है और जहाजों की संख्या के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ने की बात कही जा रही है…

वहीं रूस भी समुद्री और मिसाइल ताकत के मामले में कमजोर नहीं है….इसके साथ ही एक और बड़ी चिंता ये है कि अमेरिका के कई युद्धपोत इस समय अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात हैं…यानी वो अपनी पूरी ताकत किसी एक जगह पर केंद्रित नहीं कर सकता….इससे उसकी रणनीतिक क्षमता सीमित हो जाती है….अगर एक साथ कई मोर्चे खुल जाते हैं….तो अमेरिका के लिए स्थिति और भी मुश्किल हो सकती है…

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौजूदा जंग लंबी खिंचती है…तो अमेरिका को अपने संसाधनों पर और ज्यादा दबाव झेलना पड़ेगा…जहाजों की मरम्मत, नए निर्माण और सैनिकों की तैनाती….इन सबमें समय और पैसा दोनों लगता है…..और अगर इसी दौरान कोई दूसरा बड़ा संघर्ष शुरू हो जाता है…तो अमेरिका की स्थिति कमजोर पड़ सकती है…

कुल मिलाकर, मिडिल ईस्ट की ये जंग सिर्फ एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गई है…बल्कि, इसने वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं…अमेरिका, जो दशकों से समुद्र का निर्विवाद शासक माना जाता था…अब पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है…

ये कहना अभी जल्दबाजी होगा कि अमेरिका अपनी सुपरपावर की स्थिति खो चुका है…लेकिन इतना जरूर है कि इस जंग ने उसकी कमजोरियों को उजागर कर दिया है…और दुनिया अब ये देख रही है कि क्या अमेरिका इन चुनौतियों से उबरकर अपनी ताकत को फिर से साबित कर पाएगा या नहीं…फिलहाल, एक बात साफ है कि…समुद्र की ये लड़ाई सिर्फ जहाजों की नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, रणनीति और वैश्विक नेतृत्व की भी है और इस मुकाबले में जो देश टिकेगा, वही आने वाले समय में दुनिया की दिशा तय करेगा…

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