LPG पर मोदी का दावा फेल? 300 कमाई, 400 गैस! सूरत से मजदूरों का पलायन
LPG गैस की बढ़ती कीमतों और कथित संकट ने गरीब और दिहाड़ी मजदूरों की जिंदगी पर गहरा असर डाला है...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः गुजरात के सूरत शहर में इन दिनों एक ऐसी तस्वीर देखने को मिल रही है.. जो दिल दहला देती है.. उधना रेलवे स्टेशन पर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा के मजदूरों की लंबी-लंबी कतारें लगी हुई हैं.. हर कोई अपना बोरिया-बिस्तर, बर्तन, चूल्हा, बाल्टी.. और छोटे-छोटे बच्चों को लेकर ट्रेन की ओर भाग रहा है.. कोई अनारक्षित कोच में जगह ढूंढ रहा है.. तो कोई प्लेटफॉर्म पर बैठा रो रहा है.. इन मजदूरों का कहना है कि जब तक गैस की समस्या ठीक नहीं होती, हम वापस नहीं आएंगे..
जानकारी के अनुसार ये मजदूर सूरत के टेक्सटाइल मिलों में काम करते हैं.. यहां पावरलूम पर कपड़े बुनते हैं.. डाइंग और प्रिंटिंग का काम करते हैं.. रोज की कमाई 300 से 500 रुपये तक होती है.. लेकिन अब घरेलू रसोई गैस की भारी कमी.. और ब्लैक मार्केट में 400-500 रुपये प्रति किलो कीमत ने उनकी कमर तोड़ दी है.. खाना बनाने के लिए गैस नहीं मिल रही.. होटल का खाना भी महंगा पड़ रहा है.. बच्चे भूखे सो रहे हैं.. इसलिए नौकरी छोड़कर गांव लौटने का फैसला कर लिया..
इसी कड़ी में एक ने बताया कि यहां गैस नहीं मिल रही है.. खाना नहीं बना पा रहे हैं.. हम लोग खाएंगे क्या.. ड्यूटी कैसे करेंगे.. कंपनी तो गैस भरवाकर नहीं देगी.. उसकी व्यवस्था तो हम लोगों को ही करनी होगी.. और गैस मिल नहीं रही है, इसलिए हम घर जा रहे हैं.. वहीं दूसरे मजदूर ने कहा कि पिछले 15 दिनों से गैस नहीं मिली.. ब्लैक में एक लीटर गैस के 400 से 500 रुपये मांगे जा रहे हैं.. जिसे खरीदना एक मजदूर के लिए नामुमकिन है.. पहले 100 रुपये किलो गैस खरीदते थे.. अब होटल में खाना भी महंगा हो गया है.. वहीं मजदूर आदमी इतना महंगा ईंधन खरीदकर कितने दिन रह सकेगा.. यही वजह है कि वह अब अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर ट्रेन के अनारक्षित कोचों की लंबी लाइनों में लगने को मजबूर है..
आपको बता दें कि ये कहानियां सिर्फ एक-दो नहीं, बल्कि सैकड़ों मजदूरों की हैं.. सूरत का टेक्सटाइल उद्योग देश का बड़ा हब है.. यहां लाखों प्रवासी मजदूर काम करते हैं.. ये लोग छोटे-छोटे किराए के कमरों में रहते हैं.. ज्यादातर के पास आधिकारिक LPG कनेक्शन नहीं होता.. वे छोटे सिलेंडर भरवाते थे या ब्लैक मार्केट से लेते थे.. लेकिन अब गैस एजेंसियां कह रही हैं कि स्टॉक खत्म है.. और ब्लैक में कीमतें आसमान छू रही हैं..
इस संकट की जड़ पश्चिम एशिया के तनाव में है.. फरवरी-मार्च 2026 में ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच बढ़े संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावित कर दिया.. यह रास्ता दुनिया का बड़ा एनर्जी कॉरिडोर है.. भारत अपनी जरूरत का करीब 60-70 प्रतिशत LPG विदेश से आयात करता है.. जब यह रूट बाधित हुआ तो सप्लाई चेन टूट गई.. भारत ने दो LPG कैरियर जहाज को सुरक्षित निकाला.. जो 92 हजार टन से ज्यादा LPG लेकर आए.. लेकिन कुल प्रभाव कम नहीं हुआ..
वहीं सरकार कह रही है कि देश में कुल LPG की कोई कमी नहीं है.. पीएम नरेंद्र मोदी ने 12 मार्च 2026 को कहा कि घबराहट फैलाने वाले लोग देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं.. उन्होंने राज्यों से कहा कि ब्लैक मार्केटिंग और होर्डिंग पर सख्त नजर रखें.. पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया कि घरेलू उत्पादन 38 प्रतिशत बढ़ाया गया है.. 12 हजार से ज्यादा छापे मारे गए.. और 15 हजार से ज्यादा सिलेंडर जब्त किए गए.. ऑनलाइन बुकिंग 94 प्रतिशत हो गई है.. घरेलू रिफिल का अंतर 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है.. ताकि होर्डिंग रुके..
लेकिन सूरत की जमीनी हकीकत कुछ और ही बता रही है.. यहां 55 शहर और 20 ग्रामीण LPG एजेंसियां हैं.. प्रशासन ने सभी पर अधिकारी तैनात किए हैं.. ताकि ब्लैक मार्केटिंग न हो.. फिर भी मजदूरों को छोटे सिलेंडर 500 रुपये से बढ़कर 2500 रुपये में भरवाना पड़ रहा है.. या फिर ढीली गैस 400-500 रुपये किलो मिल रही है.. मजदूर बताते हैं कि मेरे पास गैस रजिस्ट्रेशन बुक नहीं है.. पांडेसरा के रिफिलिंग सेंटर पर 500 रुपये में भरवाते थे.. अब 2500 रुपये मांग रहे हैं.. बच्चे छोटे हैं.. इसलिए टिकट बुक कर गांव लौट रहा हूं..
इस संकट ने सूरत के टेक्सटाइल उद्योग को भी झकझोर दिया है.. साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष जितुभाई वखारिया कहते हैं कि मजदूरों के लिए बहुत मुश्किल समय है.. कई मिलें हफ्ते में एक-दो दिन बंद कर रही हैं.. शादी का सीजन आने वाला है.. फिर भी मजदूरों की कमी हो रही है.. कुछ मिल मालिक, जैसे राहुल अग्रवाल, कहते हैं कि.. उनके मिल में उत्पादन अभी ठीक है.. लेकिन कुल मिलाकर लेबर शॉर्टेज की चिंता बनी हुई है.. मजदूरों को बचाने के लिए पांडेसरा में कम्युनिटी किचन शुरू किया गया है.. यहां रोज 5000 से ज्यादा लोगों को 40-45 रुपये में अच्छा खाना दिया जा रहा है.. मिल मालिक खाना खरीदकर मजदूरों को दे रहे हैं.. ताकि वे काम पर लौटें.. कुछ ठेकेदार मंडवी से लकड़ी के लट्ठे मंगवा रहे हैं.. ताकि मजदूर चूल्हा जलाकर खाना बना सकें.. लेकिन ये उपाय लंबे समय तक नहीं चल सकते..
सूरत में यह समस्या सिर्फ घरेलू LPG तक सीमित नहीं है.. फैक्टरियों में भी गैस और LNG की कमी से कुछ यूनिट्स धीमी पड़ गई हैं.. टेक्सटाइल प्रोसेसिंग में गैस का इस्तेमाल होता है.. कुल मिलाकर उद्योग को करोड़ों का नुकसान हो रहा है.. मजदूरों के पलायन से उत्पादन प्रभावित हो रहा है.. सरकार का दावा है कि पूरे देश में LPG सप्लाई सामान्य है.. कोई ड्राई आउट नहीं हुआ है.. और घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दी जा रही है.. लेकिन विपक्ष इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की नाकामी बता रहा है.. राहुल गांधी और ममता बनर्जी जैसे नेता कह रहे हैं कि सरकार ने पहले से तैयारी नहीं की और आयात पर निर्भरता बढ़ गई..
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी लंबी कतारें और ब्लैक मार्केटिंग की खबरें आई हैं.. केरल में होटल और रेस्टोरेंट बंद होने से वहां भी मजदूरों का पलायन शुरू हुआ है.. लेकिन सूरत सबसे ज्यादा चर्चा में है.. क्योंकि यहां टेक्सटाइल इंडस्ट्री है और लाखों मजदूर काम करते हैं.. वेस्टर्न रेलवे ने एक बयान में कहा कि उधना स्टेशन पर भीड़ सामान्य है.. लेकिन मीडिया और जमीनी रिपोर्ट्स में मजदूरों की कतारें साफ दिखाई दे रही हैं.. शायद पूरा पलायन नहीं.. लेकिन सैकड़ों परिवार प्रभावित जरूर हैं..
मजदूरों का दर्द समझने के लिए उनके परिवार की स्थिति सोचिए. एक छोटा कमरा, पत्नी और दो-तीन बच्चे.. सुबह मिल में काम, शाम को घर लौटकर खाना बनाना.. गैस नहीं तो बच्चे रोते हैं.. पत्नी परेशान होती है.. ऐसे में मजदूर सोचता है कि गांव में कम से कम लकड़ी से चूल्हा जलाकर खाना बना सकते हैं.. और यही सोचकर ट्रेन पकड़ लेता है.. सूरत का इतिहास देखें तो यहां हमेशा से प्रवासी मजदूरों का आना-जाना रहा है.. कोविड काल में भी लाखों मजदूर लौटे थे.. और फिर वापस आए.. अब फिर वही तस्वीर है.. लेकिन इस बार वजह गैस संकट और वैश्विक तनाव है..



