नई सरकार बनने के 24 घंटे के अंदर ही बड़ा एक्शन, GenZ आंदोलन से बदली तस्वीर

हिटलर से लेकर गद्दाफी तक, अत्याचार की बुनियाद पर बनी सत्ता का पतन ही नियति रहा है। के.पी. शर्मा ओली के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या हुआ जब तानाशाही से सरकार के चलाने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री को जाना पड़ गया जेल? कैसे नई सरकार के बनते ही अगले दिन पूर्व प्रधानमंत्री के घर पर पहुंची पुलिस और समर्थकों के सामने ही देनी पड़ी गिरफ्तारी?

आपको याद होगा आज से कुछ महीने पहले जब भारत से सटे पड़ोसी देश नेपाल में सरकार के खिलाफ वहां के युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा था तो कैसे जेन जी प्रदर्शन को दबाने के लिए सरकार ने कठोर कदम उठाए थे, जिसके बाद उग्र आंदोलन छिड़ गया था और वहां के युवाओं ने तानाशाह सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था। बवाल यहां तक पहुंच गया था कि सरकार के मंत्री भीड़ द्वारा दौड़ा दौड़ा कर मारे जा रहे थे।

अब नई सरकार के बनने के ठीक एक दिन बाद पुलिस ने गनहगारों के खिलाफ एक्शन लिया है और तानाशाह सरकार के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री को जेल में डाल दिया है। इसके साथ ही उनके गृहमंत्री भी लपेटे में आ गए हैं। तो आखिर किस मामले में दोनों को जेल जाना पड़ा है और कैसे नेपाल के जेन-ज़ी ने नेपाल की सूरत बदल कर रख दी है,

इतिहास गवाह रहा है कि तानाशाहों का अंत हमेशा दुखद, हिंसक और देर-सवेर निश्चित होता है, क्योंकि तानाशाही चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न लगे, वह आखिर में जनता के आक्रोश, तख्तापलट या क्रांतियों के सामने टिक नहीं पाती। हिटलर से लेकर गद्दाफी तक, अत्याचार की बुनियाद पर बनी सत्ता का पतन ही नियति रहा है। के.पी. शर्मा ओली के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

कभी नेपाल की सत्ता के सबसे ताकतवर चेहरे माने जाने वाले ओली अब जेल की सलाखों के पीछे हैं। सत्ता बदलते ही उनके खिलाफ कार्रवाई इतनी तेज हुई कि उनके समर्थकों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। बताया जा रहा है कि जैसे ही नई सरकार ने शपथ ली, उसके महज 24 घंटे के भीतर पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री के घर पर छापा मार दिया। जब पुलिस टीम वहां पहुंची तो माहौल अचानक गरमा गया। ओली के समर्थक सड़कों पर उतर आए और गिरफ्तारी का विरोध करने लगे।

कुछ देर तक हंगामा चलता रहा, लेकिन पुलिस ने सख्ती दिखाई और विरोध कर रहे लोगों को हटाकर ओली को हिरासत में ले लिया। यह पूरा घटनाक्रम कैमरों में कैद हुआ और देखते ही देखते पूरे नेपाल में चर्चा का विषय बन गया। यह गिरफ्तारी कोई साधारण मामला नहीं है, बल्कि सितंबर 2025 में हुए उस बड़े जन आंदोलन से जुड़ी है, जिसने नेपाल की राजनीति को हिला कर रख दिया था। इस आंदोलन को ‘जेन ज़ी क्रांति’ कहा गया। यह आंदोलन शुरुआत में डिजिटल स्वतंत्रता की मांग से शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह सरकार के खिलाफ एक बड़े जनविद्रोह में बदल गया। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से परेशान युवा सड़कों पर उतर आए थे।

सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए। पुलिस और सुरक्षाबलों को खुली छूट दी गई। इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे देश को हिला दिया। कई जगहों पर फायरिंग हुई, लाठीचार्ज हुआ और हिंसा भड़क उठी। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम में कम से कम 76 लोगों की जान चली गई और 2000 से ज्यादा लोग घायल हो गए। आंदोलन के पहले ही दिन घंटों तक चली गोलीबारी में 19 युवा प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी।

इसी हिंसा को लेकर जांच बैठाई गई। एक उच्च स्तरीय आयोग ने पूरे मामले की गहराई से जांच की और अपनी रिपोर्ट में सीधे तौर पर ओली को जिम्मेदार ठहराया। आयोग ने कहा कि जब आप सत्ता के शीर्ष पर होते हैं तो हर फैसले की जिम्मेदारी आपकी होती है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। इसी रिपोर्ट के आधार पर अब कार्रवाई शुरू हुई है। ओली के साथ-साथ उनके तत्कालीन गृह मंत्री रमेश लेखक को भी गिरफ्तार किया गया है। दोनों को उनके-अपने आवासों से हिरासत में लिया गया।

आरोप बेहद गंभीर हैं। उन पर ‘culpable homicide’ यानी गैर इरादतन हत्या जैसे आरोप लगाए गए हैं। अगर अदालत में ये आरोप साबित हो जाते हैं, तो दोनों नेताओं को 10 साल तक की जेल हो सकती है। हालांकि ओली ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि यह पूरी रिपोर्ट राजनीतिक बदले की भावना से तैयार की गई है। उन्होंने इसे चरित्र हनन और घृणा की राजनीति बताया है। लेकिन इस बार हालात बदल चुके हैं। सत्ता अब उनके हाथ में नहीं है और कानून का शिकंजा कसता जा रहा है।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब नेपाल में एक नई राजनीतिक कहानी लिखी जा रही है। बालेन्द्र शाह जिन्हें लोग बालेन शाह के नाम से जानते हैं, उन्होंने देश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है। खास बात यह है कि बालेन कोई पारंपरिक नेता नहीं हैं। वे इंजीनियर रहे हैं, रैपर रहे हैं और अब देश के प्रधानमंत्री हैं। बालेन शाह का उभार नेपाल की राजनीति में एक बड़ी क्रांति की तरह देखा जा रहा है। उन्होंने युवाओं के गुस्से को आवाज दी और उसे राजनीति की ताकत में बदल दिया।

उनके गाने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सिस्टम की नाकामी पर सीधे वार करते थे। उनका गाना “नेपाल हासेको” जेन ज़ी आंदोलन के दौरान युवाओं का एंथम बन गया था। बालेन ने 2022 में काठमांडू के मेयर का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीता था। उस समय भी उन्होंने बड़े-बड़े दलों को हराकर सबको चौंका दिया था। मेयर बनने के बाद उन्होंने कई सख्त फैसले लिए, जिनमें अवैध निर्माण हटाना, ट्रैफिक सुधार और शहर की सफाई जैसे मुद्दे शामिल थे। उनके काम को लेकर विवाद भी हुए, लेकिन उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। 2025 के जेन ज़ी आंदोलन के दौरान बालेन एक प्रतीक बनकर उभरे।

युवाओं ने उन्हें अपना नेता मान लिया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के साथ जुड़ गए। 2026 के चुनाव में उन्होंने बड़ी जीत हासिल की। सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने खुद ओली के गढ़ झापा-5 सीट से चुनाव लड़ा और उन्हें भारी मतों से हरा दिया। यह हार सिर्फ एक चुनावी हार नहीं थी, बल्कि एक युग के अंत का संकेत थी।

जनता ने साफ संदेश दिया कि अब पुरानी राजनीति नहीं चलेगी। अब जब बालेन शाह प्रधानमंत्री बन चुके हैं, तो उनकी सरकार ने आते ही सख्त रुख दिखाया है। सत्ता संभालने के अगले ही दिन पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी ने यह साफ कर दिया है कि नई सरकार पुराने मामलों को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है।

नेपाल में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक देश की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है। जब जनता सड़कों पर उतरती है और बदलाव की ठान लेती है, तो सबसे मजबूत दिखने वाली सरकार भी गिर जाती है। ओली सरकार के दौरान जो फैसले लिए गए, जो दमन हुआ, उसी का परिणाम आज उनके सामने है। केपी ओली का जिस तरीके से लंबे तानाशाही शासन से बाद अंत हुआ है उसको देखकर दुनिया के तमाम तानाशाहों को जागना चाहिए।

भारत के रंगा बिल्ला को भी आज थर-थर कांपना चाहिए क्योंकि ओली सरकार भी जनता के मुद्दों को नजरअंदाज किया था, अमीरों के लिए काम किया था और जनता के आंदोलनों को ये कुचल देेते थे। और आज इन्हीं गुनाहों की सज़ा इनको भुगतनी पड़ रही है। वहीं आज नेपाल की सड़कों पर एक नई उम्मीद दिख रही है। युवा यह मान रहे हैं कि अब उनकी आवाज सुनी जाएगी। लेकिन साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा है कि क्या नई सरकार उन उम्मीदों पर खरी उतर पाएगी या नहीं।

फिलहाल इतना जरूर है कि नेपाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आ चुका है। एक तरफ पुरानी सत्ता के प्रतीक नेता जेल में हैं और दूसरी तरफ एक नया चेहरा देश की कमान संभाल रहा है। यह टकराव सिर्फ दो नेताओं का नहीं, बल्कि दो सोच का है। और यही कारण है कि आज दुनिया भर में इस घटनाक्रम पर नजरें टिकी हुई हैं। क्योंकि यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह उस गुस्से का नतीजा है जो लंबे समय से दबा हुआ था और अब फूट पड़ा है।

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