ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप की बेचैनी, विदेश मंत्री ने कहा-पूर्ण युद्ध विराम पर ही बनेगी बात
ट्रंप कल तक कह रहे थे कि ईरान को घुटनों पर ला देंगे, आज उनके खास दूत स्टीव विटकॉफ ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के सामने मिन्नतें कर रहे हैं।

4pm न्यूज नेटवर्क: कल तक जो डोनाल्ड ट्रंप ईरान को मिटा देने की धमकियाँ दे रहे थे, आज वही ट्रंप इस दलदल से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। व्हाइट हाउस से छनकर आ रही खबरें बता रही हैं कि ट्रंप अब सिर्फ 2 से 3 हफ्तों के भीतर इस जंग को किसी भी तरह खत्म करना चाहते हैं।
इसके लिए उन्होंने अपने खास दूत स्टीव विटकॉफ को एक बार फिर से एक्टिव कर दिया है और एक ऐसी चाल चल दी है जिससे मिडिल ईस्ट के देश आपस में उलझने को तैयार हो गए हैं। खबर है कि होर्मुज के मोर्चे से ट्रंप ने जैसे ही हाथ खींचे हैं, एक और मुस्लिम मुल्क ने अपने गोदामों से हथियार निकाल लिए हैं और जंग में कूदने का ऐलान कर दिया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि ‘सुपर पावर’ के तेवर अचानक ठंडे पड़ गए?
जो ट्रंप कल तक कह रहे थे कि ईरान को घुटनों पर ला देंगे, आज उनके खास दूत स्टीव विटकॉफ ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के सामने मिन्नतें कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने ईरान को शांति का प्रस्ताव भेजा है। ट्रंप चाहते हैं कि अगले 15-20 दिनों में ये खूनी खेल बंद हो जाए। लेकिन ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने दो-टूक कह दिया है कि— “हवा में बातें मत कीजिए, हमें सीज़फायर नहीं बल्कि पूर्ण युद्ध विराम और सुरक्षा की लिखित गारंटी चाहिए।”
ईरान का गुस्सा जायज़ है। तेहरान ने साफ़ कह दिया है कि अमेरिका पर भरोसा करना खुदकुशी जैसा है। याद कीजिए, ट्रंप ही वो शख्स थे जो पहले भी परमाणु समझौते (JCPOA) को रद्दी की टोकरी में फेंक चुके हैं। ईरान अब किसी खोखले वादे पर यकीन करने को तैयार नहीं है। क्योंकि पिछले दिनों बातचीत के बीच ही अमेरिका ने ईरान पर अटैक कर दिया था, इसलिए अब चाहे विटकॉफ का फोन आए या पाकिस्तान और तुर्किए सक्रिय हों, ईरान को अब भरोसा नहीं है।
इसकी वजह खुद ट्रंप ही हैं। वैसे तो ट्रंप पूरी जी-तोड़ कोशिश में हैं कि जंग से किसी तरह निकलकर भाग जाएं और शायद अब तक भाग भी चुके होते, लेकिन उन्हें ‘सुपर पावर’ वाले ढोल के फटने का खतरा सता रहा है। क्योंकि ये ढोल अगर पूरी तरह से फट गया, तो पूरी दुनिया में अमेरिका की पोल खुल जाएगी और खुद ट्रंप जो ‘अमेरिका ग्रेट’ का नारा ज़ोर-शोर से लगा रहे हैं, उनका भी अमेरिकी जनता के बीच बंटाधार होना तय है। ट्रंप चौतरफा फंस चुके हैं। एक तरफ जहाँ हर दिन अमेरिका के 8,400 करोड़ रुपए जंग में स्वाहा हो रहे हैं, तो वहीं अमेरिकी सैनिकों की जान भी जा रही है।
सिर्फ यही नहीं, जो अरब देश अमेरिका के साथ खड़े हुए हैं, उन्हें भी जंग का भारी नुकसान हो रहा है। मिसाइलों ने काफी कुछ तबाह कर दिया है। यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) के मुताबिक, मध्य पूर्व में चल रहा यह युद्ध पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, रीजन की जीडीपी 3.7 प्रतिशत से 6 प्रतिशत तक घट सकती है और करीब 18 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।
होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही 70 प्रतिशत से ज़्यादा घट गई है और तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई है। साथ ही 16 लाख से लेकर 36 लाख नौकरियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। क्योंकि मिडिल ईस्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर पर अमेरिकी कंपनियों का कब्ज़ा है, इसलिए अरब देशों के साथ अमेरिका को भी तगड़ा नुकसान हो रहा है। यही वजह है कि ट्रंप 33 दिनों में ही पूरी तरह हिल चुके हैं और सीज़फायर की गुहार लगाने लगे हैं।
लेकिन फिलहाल यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि ईरान अब रुकने के मूड में नहीं दिख रहा। ट्रंप की रातों की नींद हराम करने वाली सबसे बड़ी खबर आईआरजीसी (IRGC) की तरफ से आई है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने अमेरिका की एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और टेस्ला जैसी 18 बड़ी कंपनियों को ‘वैध सैन्य लक्ष्य’ घोषित कर दिया है। धमकी दी गई है कि अगर ईरान पर एक भी हमला हुआ, तो मिडिल ईस्ट में मौजूद इन कंपनियों के दफ्तरों को मटियामेट कर दिया जाएगा।
इस धमकी के बाद वॉल स्ट्रीट और न्यूयॉर्क के बाज़ारों में हाहाकार मच गया है। अमेरिका के रईस कारोबारी अब ट्रंप के कान खींच रहे हैं। ट्रंप साहब, तेल और ज़मीन की जंग तो आप झेल लेते, लेकिन जब बात डॉलर की और सिलिकॉन वैली की कंपनियों की बर्बादी पर आई, तो आपके हाथ-पांव फूलने लगे हैं।
इस स्क्रिप्ट का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ज़बरन खोलने की ज़िद छोड़ दी। उन्हें समझ आ गया कि यहाँ ईरान से टकराना मतलब अपनी पूरी नौसेना को समंदर में दफन करना है। लेकिन खबर है कि जैसे ही अमेरिका ने यहाँ से हाथ खींचे, दुबई और कुछ अन्य मुस्लिम देशों ने अपने गोदामों से वो हथियार निकाल लिए हैं जो उन्होंने बरसों से महाजंग के लिए संभाल कर रखे थे। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अब इस संघर्ष में सीधे शामिल होने पर विचार शुरू कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूएई अमेरिका के साथ मिलकर होर्मुज को दोबारा खोलने के लिए सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।
बताया जा रहा है कि ईरान की ओर से लगातार यूएई और अन्य खाड़ी देशों पर हमलों के बाद अब अबू धाबी का रुख बदल गया है। अगर यूएई इस युद्ध में शामिल होता है, तो वह ऐसा करने वाला पहला खाड़ी देश होगा। यूएई अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव लाने की कोशिश कर रहा है ताकि ईरान के खिलाफ कार्रवाई को मंजूरी मिल सके। हालांकि रूस और चीन इस प्रस्ताव को रोक सकते हैं। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी ईरान के खिलाफ सख्त हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक अपनी सेना सीधे युद्ध में नहीं उतारी है। वहीं बहरीन, जहाँ अमेरिकी नौसेना का फिफ्थ फ्लीट मौजूद है, इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है। यूएई के इस युद्ध में उतरने से अमेरिका को काफी फायदा होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर संयुक्त राष्ट्र से मंजूरी नहीं भी मिलती, तब भी यूएई सैन्य सहयोग, बारूदी सुरंगें हटाने और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए तैयार है।
यूएई ने यह भी सुझाव दिया है कि अगर अमेरिका होर्मुज के कुछ द्वीपों पर नियंत्रण कर ले, जिनमें अबू मूसा द्वीप शामिल है (जो ईरान के कब्ज़े में है लेकिन यूएई उस पर दावा करता है), तो परिस्थितियां सुधर सकती हैं। यह रुख यूएई की पुरानी नीति में बड़ा बदलाव है। इससे पहले यूएई मध्यस्थता की कोशिश कर रहा था, लेकिन अब वह डोनाल्ड ट्रंप की उस अपील के साथ खड़ा नज़र आ रहा है जिसमें सहयोगियों से ज़्यादा ज़िम्मेदारी लेने को कहा गया था। यूएई के पास मज़बूत सैन्य क्षमता और जेबेल अली जैसे बड़े बंदरगाह हैं। अगर यूएई खुलकर उतरता है, तो संघर्ष और बढ़ सकता है। यूएई अपने सर्विलांस ड्रोन, अमेरिकी बम और शॉर्ट रेंज मिसाइलों की सप्लाई इज़राइल को भी कर सकता है। नाटो देशों द्वारा साथ छोड़ दिए जाने के बाद, सऊदी और यूएई का यह रुख ट्रंप के लिए बड़ा सपोर्ट होगा।
अभी दो दिन पहले व्हाइट हाउस से बयान आया था कि जंग का खर्चा अब अमेरिका नहीं, बल्कि अरब देश उठाएंगे। लेकिन रातों-रात पूरा गेम प्लान पलटने की तैयारी है। अमेरिका अब अरब देशों को आगे करके खुद पीछे हटने की फिराक में है और यूएई-बहरीन का अचानक आगे आना इसी बात का सबूत माना जा रहा है।
ऐसे में साफ़ है कि जहाँ ट्रंप भागने की तैयारी में हैं, वहीं जंग में यूएई और बहरीन होर्मुज के लिए आगे आ सकते हैं। यानी जंग अब अमेरिका बनाम ईरान से हटकर ईरान बनाम यूएई की शक्ल ले सकती है। क्या आपको लगता है कि ईरान को अमेरिका के इस शांति प्रस्ताव पर यकीन करना चाहिए? क्या ट्रंप वाकई 2 हफ्तों में जंग खत्म कर पाएंगे या यह कोई नई चाल है?



