म्यूजिक लवर्स का क्रेज़, हर गाने पर गुनगुनाया लखनऊ

- बावरा मन.. से लेकर हवा सा था वो.. तक पर जाग उठें लखनवीं होंठ
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। दयाल लॉन में इकटठा यह भीड़ स्वानंद किरकिरे को सिर्फ सुनने नहीं आयी थी बल्कि वह वहां जीने आयी थी। बावरा मन.. के साथ किसी की पुरानी मोहब्बत जाग उठी आओगे जब तुम.. ने किसी को इंतजार याद दिला दिया और बहती हवा सा था वो.. ने हर किसी को अपने कॉलेज के दिन लौटा दिए। हर गाना एक कहानी था और हर श्रोता उस कहानी का किरदार। तालियां सिर्फ परफार्मेंस के लिए नहीं बज रही थीं बल्कि वह उन एहसासों के लिए बज रही थीं जो सालों से दिल में कहीं दबे थे। इस भीड़ की सबसे खास बात यह थी कि यहां कोई अजनबी नहीं था। हर श्रोता दूसरे के एहसास को समझ रहा था। कोई आंखें बंद कर गुनगुना रहा था कोई मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर उस पल को कैद करने की कोशिश कर रहा था तो कोई बस चुपचाप बैठकर हर शब्द को अपने भीतर उतार रहा था। यहां संगीत सुनने का नहीं उसे जीने का माहौल था।
मौसम बना महफिल का हीरो, बूंदों ने लिखी कहानी
दयाल बाग लॉन में सजी महफिल कोई एक मंच नहीं था बल्कि पूरी कायनात जैसे उसी महफिल का हिस्सा बन गई हो। 4पीएम कन्सर्ट का सबसे अनदेखा लेकिन सबसे असरदार किरदार था मौसम। वह मौसम जो आम दिनों में लोगों को घरों में कैद कर देता है लेकिन शनिवार की शाम वह खुद बाहर निकलकर सुरों का हमसफर बन गया। बूंदा-बांदी की हल्की चादर जैसे आसमान से उतरकर हर सुर के साथ लिपट रही थी। स्वानंद किरकिरे की आवाज जब हवा में घुलती तो लगता जैसे हर बूंद उसी के साथ झूम रही है। यह कोई साधारण बारिश नहीं थी यह वह बारिश थी जो हर शब्द को और गहरा हर एहसास को और नम बना रही थी।
बिजली की कड़क भी कोरस बनी
बिजली की कड़क भी उस रात डराने नहीं बल्कि सजाने आयी थी। हर बार जब आसमान चमकता था तो लगता जैसे किसी हाई नोट पर खुद प्रकृति तालियां बजा रही हो। मंच पर गूंजती आवाज और आसमान में गूंजती गर्जना दोनों के बीच एक अजीब सी जुगलबंदी बन गयी थी। यह दृश्य ऐसा था जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं बस महसूस किया जा सकता था। और सच कहूं तो वह पूरा माहौल किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। कुछ कुछ बेताब की उस यादगार बारिश जैसा जहां बिजली बारिश और दिल की धड़कनें एक ही लय में बहती हैं। वहां भी मोहब्बत थी यहां भी मोहब्बत थी बस फर्क इतना था कि वहां पर्दे पर कहानी चल रही थी और यहां हर शख्स अपनी कहानी खुद जी रहा था।
नेचर ने की मेहमानों की मेजबानी
भीगी कुर्सियां हल्की ठंडी हवा और उन सबके बीच बैठे लोग कोई छाता थामे कोई बूंदों को अपने चेहरे पर गिरने देता हुआ हर कोई इस मौसम को अपने तरीके से जी रहा था। कोई भी उठकर जाने को तैयार नहीं था क्योंकि उस रात का हर पल जैसे एक नई याद लिख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे नेचर खुद इस महफिल की मेजबान बन गई हो। वह कह रही हो कि जब हम जवां होंगे जाने कहां होंगे। मगर यह पल यह एहसास यहीं कहीं हमेशा जिंदा रहेगा। बारिश ने सिर्फ जमीन को नहीं भिगोया उसने दिलों को भी छू लिया। उसने यह साबित कर दिया कि जब संगीत सच्चा हो तो मौसम रुकावट नहीं बनता बल्कि वह खुद उस कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन जाता है। और आखिर में यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर स्वानंद किरकिरे की आवाज ने महफिल को रूह दी तो मौसम ने उसे जादू बना दिया। एक ऐसा जादू जिसे लखनऊ लंबे समय तक भूल नहीं पाएगा।




