UAE ने राफेल डील से खींचे हाथ! डिफेंस सेक्टर में बड़ा फैसला, फ्रांस पर उठे सवाल

4पीएम न्यूज नेटवर्कः संयुक्त अरब अमीरात ने फ्रांस के अगली पीढ़ी के राफेल F-5 लड़ाकू विमान प्रोग्राम से बाहर निकलने का फैसला कर लिया है.. यह खबर फ्रांस के लिए बड़ा झटका है.. फ्रांस अब इस विशालकाय करीब ₹45,000 करोड़ के प्रोजेक्ट का पूरा खर्च अकेले उठाने को मजबूर हो गया है.. UAE ने दिसंबर 2025 में ही बातचीत रोक दी थी.. लेकिन अब अप्रैल 2026 में इसकी आधिकारिक पुष्टि हो गई है..

आपको बता दें कि दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद संवेदनशील सोर्स कोड और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर था.. खासतौर पर ऑप्ट्रॉनिक्स यानी प्रकाश को पहचानने.. और नियंत्रित करने वाली उन्नत प्रणाली पर.. फ्रांस ने कोई जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया.. UAE चाहता था कि इतना बड़ा निवेश करने के बदले उसे प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी.. लोकल कंपनियों की भागीदारी और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मिले.. लेकिन फ्रांस ने साफ मना कर दिया.. वहीं अब फ्रांस को अपना Military Programming Law अपडेट करके पूरा बोझ खुद उठाना पड़ेगा.. इससे प्रोजेक्ट में देरी का खतरा मंडराने लगा है..

जानकारी के अनुसार राफेल फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन कंपनी का राफेल लड़ाकू विमान का अगला और सबसे उन्नत वर्जन है.. वर्तमान राफेल F-4 का अपग्रेडेड रूप है.. इसमें बेहतर रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, नई ऑप्ट्रॉनिक्स, लंबी रेंज की मिसाइलें.. और AI आधारित सिस्टम होंगे.. फ्रांस की वायुसेना के लिए यह 2030 के बाद का मुख्य विमान होगा.. कुल लागत करीब 5 बिलियन यूरो बताई जा रही है..

बता दें कि UAE को दिसंबर 2025 में फ्रांस ने प्रोजेक्ट में शामिल होने का ऑफर दिया.. बदले में UAE को 3.5 बिलियन यूरो करीब 31,500 करोड़ का निवेश करना था.. यह फ्रांस के लिए बड़ी राहत होती.. क्योंकि यूरोप में रक्षा खर्च बढ़ रहा है.. और कई प्रोजेक्ट्स पर दबाव है.. लेकिन बातचीत फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों.. और UAE के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात के बाद बिगड़ गई.. जिसकी मुख्य वजह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर है.. UAE मिडिल ईस्ट का सबसे आधुनिक रक्षा खरीदार है.. वह सिर्फ विमान खरीदना नहीं चाहता.. बल्कि अपनी लोकल इंडस्ट्री को मजबूत करना चाहता है.. UAE ने मांग की कि F-5 प्रोजेक्ट में उसकी कंपनियां शामिल हों.. सोर्स कोड (विमान के मुख्य कंप्यूटर कोड) का कुछ हिस्सा मिले.. और खासतौर पर ऑप्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी साझा की जाए..

वहीं ऑप्ट्रॉनिक्स में लक्ष्य को पहचानने, ट्रैक करने.. और हमला करने वाली उन्नत सेंसर सिस्टम आते हैं.. यह बहुत संवेदनशील टेक्नोलॉजी है.. फ्रांस ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताकर इनकार कर दिया.. फ्रांस का तर्क था कि यह टेक्नोलॉजी उसके परमाणु हथियार कार्यक्रम.. और भविष्य के लड़ाकू विमानों से जुड़ी है.. इसे किसी दूसरे देश को देने से उसकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है.. UAE को लगा कि इतना पैसा लगाने के बाद भी उसे सिर्फ खरीदार बनकर रहना पड़ेगा.. कोई टेक्नोलॉजी हासिल नहीं होगी.. इसलिए उसने सौदा छोड़ दिया.. पहले UAE का 3.5 बिलियन यूरो का योगदान प्रोजेक्ट को आसान बनाता.. अब फ्रांस को पूरा 5 बिलियन यूरो अकेले देना होगा.. फ्रांस का रक्षा मंत्रालय इसे अपडेटेड Military Programming Law में शामिल करेगा.. यह कानून अप्रैल 2026 में कैबिनेट के सामने आने वाला है..

लेकिन यूरोप में रूस-यूक्रेन जंग के बाद रक्षा खर्च पहले से ही बढ़ा हुआ है.. फ्रांस को कई अन्य प्रोजेक्ट्स.. जैसे FCAS (Future Combat Air System), पर भी खर्च करना है.. जिसके चलते F-5 में देरी हो सकती है.. जानकारी के मुताबिक मूल प्लान 2030 तक F-5 को तैयार करना था.. लेकिन अब इसमें 2–3 साल की देरी का खतरा है.. इससे लागत और बढ़ सकती है.. फ्रांस के रक्षा विशेषज्ञ इसे स्ट्रेटेजिक सेटबैक बता रहे हैं.. दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी पुरानी है.. UAE ने पहले ही 80 राफेल विमान खरीदे थे.. और 2021 में 16 बिलियन यूरो का सौदा हुआ था.. F-5 में निवेश UAE की महत्वाकांक्षा को दिखाता था.. UAE अब अपनी लोकल डिफेंस इंडस्ट्री बना रहा है.. EDGE ग्रुप जैसी कंपनियां उभर रही हैं.. वह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर वाले सौदे चाहता है..

वहीं फ्रांस के इनकार ने UAE को निराश किया.. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि मैक्रों और मोहम्मद बिन जायद की मुलाकात दुर्भाग्यपूर्ण रही.. इससे गल्फ देशों में फ्रांस की छवि प्रभावित हो सकती है.. UAE अब अमेरिका, ब्रिटेन या चीन जैसे देशों से बेहतर सौदे तलाश सकता है.. फ्रांस राफेल को दुनिया भर में बेचने की कोशिश कर रहा है.. भारत, मिस्र, इंडोनेशिया, ग्रीस आदि देशों ने राफेल खरीदे हैं.. F-5 का अपग्रेड इन देशों के लिए भी महत्वपूर्ण होता.. लेकिन UAE के निकलने से F-5 की कीमत बढ़ सकती है..

 

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