ईरान-अमेरिका के बीच शांत होने की कहानी: तुर्की, पाकिस्तान और चीन की बड़ी भूमिका

तारीख थी 7 अप्रैल और घड़ी की सुइयां जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थीं, पूरी दुनिया की सांसें अटक रही थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 48 घंटे का जो अल्टीमेटम दिया था, उसका आखिरी वक्त करीब आ रहा था।

4pm न्यूज नेटवर्क: तारीख थी 7 अप्रैल और घड़ी की सुइयां जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थीं, पूरी दुनिया की सांसें अटक रही थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 48 घंटे का जो अल्टीमेटम दिया था, उसका आखिरी वक्त करीब आ रहा था।

ऐसा लग रहा था कि अब ईरान के आसमान से सिर्फ मिसाइलें बरसेंगी और दुनिया एक बहुत ही भयानक युद्ध की चपेट में आ जाएगी, क्योंकि ईरान ने भी मुंहतोड़ जवाब की भयंकर तैयारी कर रखी थी। वहीं दूसरी ओर, पेंटागन के अधिकारी बटन पर उंगली रखे हुए थे, लेकिन फिर अचानक बाजी पलट गई! वो कयामत की रात जो तबाही लाने वाली थी, वो सीज़फायर के ऐलान में बदल गई। जहाँ बम बरसने थे, वहां खुशियां मनाई जाने लगीं।

पूरी दुनिया के हर मुल्क ने आगे आकर इस सीज़फायर का खैर-मकदम किया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर उन आखिरी घंटों में ऐसा क्या हुआ कि सुपरपावर अमेरिका को अपने कदम पीछे खींचने पड़े? वो कौन से 6 मुल्क थे जिन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और कैसे ईरान ने अपनी शर्तों पर दुनिया को झुकने पर मजबूर कर दिया?

40 दिन से चल रहे इस महायुद्ध को रोकना नामुमकिन सा लग रहा था। ट्रंप व्हाइट हाउस के ईस्टर उत्सव में मसरूफ थे और वहां से ईरान को ‘पूर्ण विनाश’ की धमकियां दे रहे थे। लेकिन उसी वक्त, पर्दे के पीछे कुछ ऐसा हो रहा था जिसकी भनक इज़राइल को भी नहीं थी। अमेरिका को ईरान की तरफ से पहला ‘पॉजिटिव मैसेज’ मिला।

ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के वार्ताकारों ने साफ कर दिया कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अपनी गरिमा और सम्मान के साथ। ट्रंप पिछले 15 दिनों से पूरी कोशिश में लगे थे कि किसी तरह से सुलह हो जाए। उन्होंने अपनी 15 डिमांड भी भिजवाईं और पाकिस्तान समेत कई देशों को सुलह के लिए मैदान में भी उतारा, लेकिन एक पेंच था जो फंसा हुआ था।

वह यह कि ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई किसी भी कीमत पर सीज़फायर या ट्रंप की शर्तों को मानने को तैयार नहीं थे। उसकी एक सबसे बड़ी वजह यह थी कि ट्रंप कब क्या कहते हैं और कब क्या करते हैं, उस पर भरोसा कर पाना किसी के लिए भी मुश्किल था। यही वजह है कि ईरान के सुप्रीम लीडर और वहां के लोग उन पर यकीन नहीं कर पा रहे थे। अभी भी बहुत से दावे इस तरह के हैं कि ट्रंप की बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन ट्रंप की डेडलाइन से 48 घंटे पहले अचानक तब्दीली आनी शुरू हो गई। पहली बार ईरान के सुप्रीम लीडर की ओर से बातचीत की बात सामने आई, जिसके बाद अंदाज़ा लगा कि शायद अब जंग रुक जाए; क्योंकि यह पहला मौका था जब ईरान के सुप्रीम लीडर ने सुलह-समझौते पर बात की थी।

इससे पहले मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान अपनी पूरी ताकत लगाए हुए थे कि किसी तरह से जंग रुक जाए और मिडिल ईस्ट में अमन की बहाली हो। 6 मुस्लिम मुल्क लगातार यह कोशिश कर रहे थे कि आखिरी समय पर ही सही, लेकिन किसी तरह से ईरान और अमेरिका में समझौता हो जाए। जब ईरान के सुप्रीम लीडर की ओर से कुछ संदेश मिले, तो फिर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी एक्टिव हुए और उन्होंने सेना और सुप्रीम लीडर को बहुत हद तक मनाने की कोशिश की।

हलाँकि, इस दरमियान आनन-फानन में पाकिस्तानी-अमेरिकी दूतों और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची के बीच नए ड्राफ्ट तैयार हुए। रिपोर्ट के मुताबिक, मिस्र और तुर्की के विदेश मंत्री भी इस ‘गैप’ को पाटने की जद्दोजहद में लगे थे। देर रात तक मध्यस्थों ने दो हफ्ते के सीज़फायर का अपडेटेड प्रस्ताव तैयार कर लिया और अमेरिका ने उसे अपनी मंज़ूरी दे दी। अब गेंद मोजतबा खामेनेई के पाले में थी।

रिपोर्ट में बताया कि सोमवार और मंगलवार को खामेनेई ने इस पूरी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। हालांकि, बातचीत के इस अमल में वे सीधे तौर पर शामिल नहीं हुए थे, बल्कि उनकी हिदायतें पर्चियों के ज़रिए आ रही थीं, लेकिन वे मुसलसल आ रही थीं। नए सुप्रीम लीडर पर इज़राइल की तरफ से ‘टारगेट किलिंग’ की धमकी मंडरा रही थी, इसी वजह से वे मुख्य रूप से दूतों के ज़रिए ‘नोट्स’ भेजकर संवाद कर रहे थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के विदेश मंत्री अरागची ने न सिर्फ कूटनीतिक मोर्चा संभाला, बल्कि रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडरों को भी इस डील के लिए राज़ी किया। इसी बीच चीन ने सरगर्म भूमिका निभाते हुए ईरान को ‘सुरक्षित रास्ता’ (Off-ramp) लेने का मशविरा दिया, पर आखिरी फैसला खामेनेई का ही था। फिर आया वो दिन, जो ईरान की तबाही के लिए मुकर्रर किया गया था, लेकिन कयामत से महज़ 20 घंटे पहले तक माहौल पूरी तरह बदल चुका था।

कुछ अमेरिकी मीडिया ने खबर फैला दी कि ईरान ने बातचीत तोड़ दी है, लेकिन वार्ताकारों (Negotiators) ने एक्सिओस को बताया कि हकीकत में बातचीत की रफ्तार और तेज़ हो रही थी। उप-राष्ट्रपति जेडी वांस, हंगरी से पाकिस्तानियों के साथ फोन पर मुस्तैद थे। इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ट्रंप की टीम से लगातार राब्ते में थे, लेकिन इज़राइल को लग रहा था कि बाजी उनके हाथ से निकल रही है। दोपहर तक दोनों पक्ष दो हफ्ते के सीज़फायर पर रज़ामंद होते दिख रहे थे।

तीन घंटे बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ‘एक्स’ पर शर्तें जारी कर दोनों पक्षों से इसे कुबूल करने की अपील की। ट्रंप को फौरन उनके ‘हॉकिश’ (कट्टरपंथी) साथियों के फोन और मैसेज आने लगे कि इसे ठुकरा दिया जाए। ट्रंप के सबसे करीबी लोग भी आखिरी लम्हे तक यकीन नहीं कर पा रहे थे कि वे सीज़फायर मान लेंगे। आखिरकार ट्रंप ने नेतन्याहू से फोन पर बात की और सीज़फायर पर अमल करने की गारंटी ली। आखिर में फोन पाकिस्तानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को गया और डील फाइनल हो गई। ट्रंप के पोस्ट के 15 मिनट बाद अमेरिकी फौज को ‘स्टैंड डाउन’ का हुक्म मिल गया।

ईरानी विदेश मंत्री अरागची ने ऐलान किया कि ईरान सीज़फायर का एहतराम (सम्मान) करेगा और होर्मुज को उन जहाज़ों के लिए खोल देगा जो ईरानी मुसल्लह फौजों (Armed Forces) के साथ मिलकर काम करेंगे। अभी यह देखना बाकी है कि ईरान जहाजों की आवाजाही को कितना आसान बनाएगा और नेतन्याहू सीज़फायर का कितनी सख्ती से पालन करेंगे।

अमेरिका ने अमन वार्ता में ईरान से परमाणु सामग्री छोड़ने, संवर्धन (Enrichment) रोकने और बैलिस्टिक मिसाइल के खतरे को खत्म करने की गारंटी मांगी है। उप-राष्ट्रपति वांस शुक्रवार को पाकिस्तान में होने वाली बातचीत की कयादत (नेतृत्व) करेंगे।

यह उनके सियासी करियर की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच अभी भी बड़े मतभेद कायम हैं। ईरान मुसलसल अपनी जीत का जश्न मना रहा है, जो अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है। सीज़फायर की कहानी आखिरी घंटों में इस तरह पलट गई और ईरान की 10 शर्तें बहुत हद तक मान भी ली गई हैं।

ईरान अब अपनी जीत का जश्न मना रहा है। तेहरान की सड़कों पर ‘लब्बैक या खामेनेई’ के नारे गूंज रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि यह इज़राइल के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। वे चाहते थे कि अमेरिका ईरान की परमाणु सामग्री और मिसाइल प्रोग्राम को खत्म कर दे, लेकिन अभी सिर्फ दो हफ्ते का वक्त मिला है। असली परीक्षा शुक्रवार को पाकिस्तान में होने वाली वार्ता में होगी, जिसका नेतृत्व जेडी वांस करेंगे।

यह पिछले 48 घंटों का सबसे बड़ा ‘डिप्लोमैटिक थ्रिलर’ था। एक तरफ पूरी सभ्यता को मिटाने की धमकी थी और दूसरी तरफ आखिरी मिनट में ईरान की कूटनीति का मोजिज़ा! ईरान ने साबित कर दिया कि वह न तो धमकियों से डरता है और न ही सरेंडर करता है। ट्रंप का पीछे हटना दरअसल ईरान के अडिग हौसले की जीत है।

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