अमेरिका खुद कराएगा लेबनान-इजराइल वार्ता, 14 अप्रैल को अहम बैठक
ईरान ने मेज़ पर बैठते ही पहला पत्ता ये फेंका है कि जब तक इज़राइल लेबनान पर बमबारी पूरी तरह नहीं रोकता, तब तक कोई भी डील फाइनल नहीं होगी।

4pm न्यूज नेटवर्क: इस वक्त पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से आ रही है। जो ट्रंप कल तक दहाड़ रहे थे कि वे ईरान को घुटनों पर ले आएंगे, आज उन्हें ईरान की सख्त शर्तों के आगे झुकना पड़ा है। बड़ी खबर ये है कि ईरान का 71 सदस्यीय भारी-भरकम डेलिगेशन एक खास विमान ‘मिनाब-168’ से पाकिस्तान की सरज़मीं पर उतर चुका है।
ईरान ने दो-टूक लफ्जों में साफ कर दिया है कि बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब लेबनान पर मुकम्मल सीज़फायर की बात मानी जाएगी। ईरान के इस कड़े रुख के आगे सुपरपावर अमेरिका को सरेंडर करना पड़ा है। आलम ये है कि अब खुद अमेरिका 14 अप्रैल को लेबनान और इज़राइल के बीच सीधे तौर पर बातचीत कराने जा रहा है। लेकिन ईरान ने दुनिया को आगाह कर दिया है कि उन्हें शांति की उम्मीद तो है, पर ‘मक्कार’ अमेरिका पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है।
कूटनीति के मैदान में ईरान ने वो चाल चली है कि ट्रंप के रणनीतिकार दंग रह गए हैं। ईरान का डेलिगेशन किसी आम विमान से नहीं, बल्कि ‘मिनाब-168’ नाम के खास प्लेन से पाकिस्तान पहुँचा है। यह सिर्फ एक डेलिगेशन नहीं, बल्कि ईरान की बढ़ती ताकत का मुज़ाहिरा है। जेडी वांस, जो अमेरिकी उप-राष्ट्रपति हैं, वे पहले ही इस्लामाबाद पहुँच चुके थे और बड़ी बेसब्री से ईरान के नुमाइंदों का इंतज़ार कर रहे थे।
ईरान ने मेज़ पर बैठते ही पहला पत्ता ये फेंका है कि जब तक इज़राइल लेबनान पर बमबारी पूरी तरह नहीं रोकता, तब तक कोई भी डील फाइनल नहीं होगी। अमेरिका, जो कल तक नेतन्याहू को बेगुनाहों के कत्लेआम की खुली छूट दे रहा था, आज गिड़गिड़ाने पर मजबूर है क्योंकि ‘होर्मुज’ का रास्ता ईरान के अंगूठे के नीचे है। ट्रंप की हेकड़ी अब सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गई है क्योंकि ज़मीन पर ईरान ने अपनी शर्तों की अभेद्य दीवार खड़ी कर दी है। ऐसे में ट्रंप और नेतन्याहू की हालत यह है कि रातों-रात लेबनान से बातचीत का नया प्लान तैयार करना पड़ा है।
इससे पहले कि पाकिस्तान में बातचीत का दौर शुरू हो, इज़राइल के रक्षा गलियारों से खबर पुख्ता है कि अमेरिका ने खुद 14 अप्रैल की तारीख मुकर्रर की है, जब लेबनान और इज़राइल के बीच औपचारिक बातचीत शुरू कराई जाएगी। यह वही इज़राइल है जो कल तक लेबनान को कब्रिस्तान बनाने की धमकियां दे रहा था, और ये वही ट्रंप हैं जो नेतन्याहू की पीठ ठोककर उसे उकसा रहे थे। लेकिन ईरान के ‘होर्मुज ब्लॉक’ ने अमेरिका की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है।
इज़राइल 14 अप्रैल को वॉशिंगटन में लेबनान के साथ शांति के लिए मेज़ पर बैठने को तैयार हो गया है और अमेरिका इस बातचीत में ‘बिचौलिए’ यानी मध्यस्थ का रोल निभाएगा। यह जानकारी खुद अमेरिका में इज़राइली राजदूत ने शुक्रवार को सार्वजनिक की है। हालांकि, इज़राइल का कहना है कि इन बातचीत में हिज़बुल्लाह शामिल नहीं है। अमेरिका में इज़राइल के राजदूत माइकल लीटर ने कहा कि इज़राइल हिज़बुल्लाह के साथ किसी भी सीज़फायर पर सीधे बात करने को तैयार नहीं है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका में लेबनान और इज़राइल के राजदूतों के बीच, और बेरुत में अमेरिकी राजदूत के साथ एक महत्वपूर्ण कॉल हुई है। ऐसे में साफ़ है कि अमेरिका चाहता है कि किसी भी तरह से होर्मुज और सीज़फायर पर ‘फाइनल डील’ हो जाए और यही वजह है कि वह बार-बार ईरान की शर्तों के आगे घुटने टेक रहा है। उधर ईरान ने साफ कह दिया है कि हमें अमेरिका की मीठी बातों पर कोई यकीन नहीं है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने हर समझौते की पीठ में छुरा घोंपा है, इसीलिए ईरान इस बार कागज़ी वादों के बजाय ठोस गारंटी मांग रहा है। सवाल यही है कि क्या 14 अप्रैल को वाकई शांति की सुबह होगी या ये ट्रंप का एक और चुनावी स्टंट है? फिलहाल पूरी दुनिया की नज़रें इस्लामाबाद और बेरुत पर टिकी हैं।
ट्रंप ने सोचा था कि जंग के बाद वे ईरान को हथियारों की सप्लाई रोककर उसे कमज़ोर कर देंगे। इसके लिए जैसे ही ट्रंप ने सीज़फायर की बात छेड़ी थी, उसी दिन उन्होंने धमकी दी थी कि अगर किसी मुल्क ने ईरान को हथियार दिए, तो अमेरिका उन पर 50 प्रतिशत का भारी-भरकम टैरिफ ठोंक देगा। लेकिन ट्रंप साहब शायद ये भूल गए कि अब दुनिया ‘एकध्रुवीय’ (Unipolar) नहीं रही जहाँ सिर्फ अमेरिका का हुक्म चलता हो। चीन ने ट्रंप की धमकियों को कचरे के डिब्बे में डालते हुए ईरान को अपना सबसे एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम देने का ऐलान कर दिया है।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, चीन आने वाले कुछ ही हफ्तों में ईरान को नए ‘एयर डिफेंस सिस्टम’ देने की मुकम्मल तैयारी कर रहा है। यह सनसनीखेज दावा सीएनएन (CNN) ने अपनी रिपोर्ट में तीन पुख्ता सूत्रों के हवाले से किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान मौजूदा ‘शांति के माहौल’ का पूरा फायदा उठाकर अपने हथियारों का ज़खीरा फिर से भरने की जुगत में है। दो सूत्रों के मुताबिक, चीन इन हथियारों को सीधे नहीं भेजेगा, बल्कि एक ‘थर्ड पार्टी’ यानी किसी तीसरे देश के ज़रिए सप्लाई की योजना है ताकि सप्लाई की लोकेशन को छिपाया जा सके। हालांकि, इस खबर पर चीन या ईरान ने अभी तक कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है।
चीन का ये कदम ट्रंप के गाल पर एक ज़ोरदार कूटनीतिक तमाचा है। चीन ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका के ‘आर्थिक आतंकवाद’ और धमकियों से डरने वाला नहीं है। यह नया डिफेंस सिस्टम मिलने के बाद ईरान की सरहदें किसी भी इज़राइली मिसाइल के लिए अभेद्य हो जाएंगी। ट्रंप टैरिफ की बात करके खुद को बहला रहे हैं और उधर ड्रैगन ने ईरान के साथ रक्षा सौदे को अंतिम रूप दे दिया है। ये बदलती हुई दुनिया की वो तस्वीर है जिसे देखकर व्हाइट हाउस के गलियारों में मातम छाया हुआ है।
लेकिन ट्रंप की फितरत है कि वे हर दिन एक नया ऐलान करके खुद को ‘सुपरहीरो’ साबित करने की कोशिश करते हैं, पर हकीकत में उन्हें हर दिन एक नया झटका लग रहा है। आज फिर डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया बयान जारी किया है। उन्होंने कहा है कि वे ईरान को ‘होर्मुज’ से टोल वसूलने की इजाज़त नहीं देंगे। हालांकि, हकीकत ये है कि जब सीज़फायर की बातें शुरू हुई थीं, तभी ट्रंप साहब को आईना दिखा दिया गया था। होर्मुज में ईरान की माइंस बिछी हुई हैं और वहाँ से गुज़रने वाले हर जहाज़ पर ईरान की पैनी नज़र है। ट्रंप साहब, आप इसे कैसे रोकेंगे? क्या आप एक और जंग शुरू करने की कूवत रखते हैं?
ईरान ने पहले ही साफ़ कर दिया है कि वह हर मुल्क से टोल नहीं लेगा, लेकिन यूरोप के कई देश अभी भी इसका विरोध कर रहे हैं। ट्रंप भले ही ऊंची आवाज़ में बयान दे रहे हों, लेकिन उनकी मजबूरी ये है कि उन्हें ईरान को टोल वसूलने देना ही पड़ेगा। ईरान पहले से ही ये डिमांड कर रहा है कि चूंकि हमला अमेरिका की तरफ से शुरू हुआ था, इसलिए ईरान में जो भयंकर माली नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई अमेरिका को करनी होगी। अमेरिका सीधे तौर पर हर्जाना देना नहीं चाहता, इसलिए उसकी मंशा ये है कि होर्मुज टैक्स के ज़रिए ही ये ‘मुआवजे’ का मामला सुलझ जाए।
ईरान ने होर्मुज में अपनी मुकम्मल संप्रभुता साबित कर दी है। वहाँ से गुज़रे पिछले 6 जहाज़ों ने ईरान की शर्तों को मानकर ही अपना रास्ता तय किया है। ट्रंप की ये धमकियां महज़ मीडिया की सुर्खियां बटोरने का ज़रिया हैं, क्योंकि अगर उन्होंने होर्मुज में ज़रा भी सैन्य हरकत की, तो तेल की कीमतें दुनिया को जलाकर रख देंगी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।
इस पूरी साज़िश के पीछे नेतन्याहू की वो ‘खूनी ज़िद’ है जो अपनी कुर्सी बचाने के लिए मासूमों का कत्लेआम कर रही है। नेतन्याहू जानते हैं कि जिस दिन जंग रुकी, उनके लिए जेल के दरवाज़े खुल जाएंगे। इसीलिए वे ट्रंप का इस्तेमाल ढाल की तरह कर रहे हैं। लेकिन अब इज़राइल के अंदर भी ये आवाज़ें बुलंद होने लगी हैं कि नेतन्याहू मुल्क को तबाही की अंधी खाई की तरफ ले जा रहे हैं।
ट्रंप का ‘दोगलापन’ देखिए—एक तरफ वे शांति दूत बनकर जेडी वांस को पाकिस्तान भेजते हैं और दूसरी तरफ गुपचुप तरीके से इज़राइल को हथियार सप्लाई कर रहे हैं। लेकिन ईरान ने इस बार इस ‘डबल गेम’ को रंगे हाथों पकड़ लिया है। 71 सदस्यीय भारी-भरकम डेलिगेशन का पाकिस्तान पहुँचना इस बात का साफ सबूत है कि ईरान अब ‘आर-पार’ के मूड में है और वह बिना अपनी शर्तें मनवाए पीछे नहीं हटने वाला।
साफ है कि ट्रंप की ‘डीलममेकिंग’ की हवा निकल चुकी है। वे न तो इज़राइल के बेलगाम घोड़े नेतन्याहू को रोक पा रहे हैं और न ही ईरान के हौसले पस्त कर पा रहे हैं। ईरान ने चीन के सपोर्ट और पाकिस्तान की मध्यस्थता के बीच अमेरिका को उसकी असली औकात दिखा दी है। 14 अप्रैल की ये बातचीत अब अमेरिका के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति बन गई है।



